विपक्षी सांसदों को रोकने का दुस्साहस

देश की आत्मा यानी लोकतंत्र को गुलाम बनाने की कई साज़िशें इस समय रची जा रही हैं,;

By :  DB Desk
Update: 2026-10-06 21:48 GMT

देश की आत्मा यानी लोकतंत्र को गुलाम बनाने की कई साज़िशें इस समय रची जा रही हैं, लेकिन यह देखकर आजाद रहने की उम्मीद बंधी हुई है कि विपक्ष पूरी ताकत से इन साज़िशों का मुकाबला कर रहा है और इनका सच जनता के सामने भी रख रहा है। इन साजिशों में ही एक है मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर। जिसके तहत 13 करोड़ से ज्यादा नाम मतदाता सूची से बाहर हो चुके हैं। परेशानी और चिंता की बात यह है कि चुनाव आयोग इस बारे में खुलकर जवाब भी नहीं दे रहा है। कई पर्दों में काम किया जा रहा है। चुनाव आयोग कोई निजी संस्था नहीं है, जिसके कामों में पारदर्शिता की पाबंदी न हो। संवैधानिक संस्था होने के नाते इसकी हरेक गतिविधि की जानकारी सार्वजनिक होनी चाहिए, लेकिन अब तो हालात ऐसे हो गए हैं कि चुनाव आयोग सुप्रीम कोर्ट का नाम लेकर भी गलत बयानी कर रहा है। सोमवार को ही जब एसआईआर पर एक सुनवाई हुई तो उसमें नयी मतदाता सूची में नाम जोड़ने के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म 6 में किए गए बदलाव को लेकर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने ही कहा कि, 'किसी भी संशोधित फॉर्म 6 को हमने मंजूरी नहीं दी है।Ó जबकि चुनाव आयोग दावा करता रहा है कि उसने सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी के बाद ही संशोधन किया था। बता दें कि एसआईआर में ऑनलाइन फॉर्म 6 में एक अतिरिक्त घोषणा-पत्र जोड़ा गया जिस के तहत नए मतदाता के रूप में नाम दर्ज कराने वाले व्यक्ति को यह बताना होता है कि वह स्वयं या उसके माता-पिता पिछली एसआईआर प्रक्रिया के दौरान मतदाता सूची में मैप किए गए थे या नहीं। इसी पर दोनों चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने आपत्ति भी जतलाई थी, इसका खुलासा द इंडियन एक्सप्रेस में हुआ था। अब सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से भी पता चलता है कि चुनाव आयोग ने देश को गुमराह किया।

इसी तरह की कई गड़बड़ियों के कारण ही विपक्ष बार-बार एसआईआर रद्द करने की मांग कर रहा है। मंगलवार को इंडिया ब्लॉक के सांसदों ने इसी मांग को चुनाव आयोग के सामने रखने के लिए संसद परिसर से चुनाव आयोग तक मार्च निकालना शुरु किया। सांसदों ने ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग वाले पोस्टर थामे हुए थे। लेकिन इस मार्च को निकलते ही दिल्ली पुलिस ने रोका, फिर तमाम सांसदों को हिरासत में लेना शुरु किया। अखिलेश यादव, डेरेक ओ'ब्रायन, अभिषेक बनर्जी समेत कई सांसदों को हिरासत में लेकर बस में बिठाया गया। वहीं राहुल गांधी और प्रियंका गांधी तो बस से उतरकर चुनाव आयोग से मात्र 100 मीटर की दूरी पर आकाशवाणी भवन परिसर में चले गए और कई और सांसदों के साथ वहीं धरने पर बैठ गये हैं। ये सारे सांसद आकाशवाणी के दूसरे दरवाजे से चुनाव आयोग पहुंचना चाहते थे, लेकिन उन्हें रोक लिया गया। फिलहाल इन पंक्तियों के लिखे जाने तक राहुल और बाकी सांसद आकाशवाणी में ही बरगद के पेड़ के नीचे डेरा डाले बैठे हैं।

लोकतंत्र बचाने की लड़ाई में ऐसा नजारा आजाद भारत में देखा जा रहा है, यह आश्चर्यजनक है। राहुल गांधी ने सोशल मीडिया पर शेयर किये गये वीडियो में कहा है कि आज 300 से अधिक विपक्षी सांसद संसद से चुनाव आयोग तक पदयात्रा करके चुनाव आयुक्तों से मिलने पहुंचे। हम करोड़ों भारतीयों का प्रतिनिधित्व करते हैं। चुनाव आयुक्त हमसे क्यों नहीं मिल रहे हैं? पुलिस हमें क्यों रोक रही है और धमका रही है?

राहुल गांधी का सवाल बिल्कुल वाजिब है। चुनाव आयोग किसी पार्टी का दफ्तर नहीं है, जहां उससे बिना उसकी मर्जी के लोग मिलने नहीं आ सकते। ज्ञानेश कुमार और दोनों आयुक्त सरकारी मुलाजिम हैं। जिनका काम चुनाव संपन्न कराना है और ऐसे में राजनैतिक दलों के प्रतिनिधियों को हक है कि वे चुनाव आयुक्तों से मिलकर अपनी चिंताएं जाहिर कर सकें। चुनाव आयोग ने पहले भी कई बार राजनैतिक दलों को मिलने का वक्त नहीं दिया है, लेकिन अब ये धृष्टता इस कदर बढ़ चुकी है कि शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात सुनाने जा रहे सांसदों को हिरासत में लिया गया।

अखिलेश यादव ने सही कहा कि चुनाव आयोग और उसके कामकाज के खिलाफ शिकायतें और आपत्तियां पहली बार नहीं उठाई जा रही हैं। ऐसा लगता है कि चुनाव आयोग का मानना है कि केवल भारतीय जनता पार्टी के सदस्य ही भारतीय नागरिक हैं। अखिलेश ने कहा कि कई मौकों पर ऐसा प्रतीत होता है कि चुनाव आयोग का यह भी मानना है कि केवल भाजपा के सदस्यों को ही वोट देने का अधिकार है। वहीं शिवसेना सांसद संजय राउत ने कहा कि विपक्षी सांसदों को रोकने सीमा सुरक्षा बल तैनात किया गया, संसद भवन से निर्वाचन सदन तक हजारों सीआईएसएफ कर्मियों को भेजा गया। इसकी क्या जरूरत थी। सवाल सही है कि आखिर देश की बड़ी आबादी का प्रतिनिधित्व करने वाले विपक्षी सांसदों के साथ अपराधियों वाला सलूक करने की क्या जरूरत है।

विपक्षी सांसदों को ज्ञानेश कुमार से मिलने देने से रोककर भाजपा यानी नरेन्द्र मोदी और अमित शाह ने जाहिर कर दिया कि वे वाकई चुनाव आयोग को अपनी जागीर की तरह चलाते हैं और लोकतांत्रिक मूल्यों में उनकी श्रद्धा धेले भर की भी नहीं है।

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