मजदूरों के गुस्से का पाकिस्तान और नक्सली लिंक

मई दिवस या अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस आने में अभी एक पखवाड़े का वक्त बचा है, लेकिन जिन वजहों से 140 साल पहले मजदूरों ने अपनी आवाज़ बुलंद की थी, वो वजहें अब कई गुना सघनता के साथ समाज में मौजूद हैं।

Update: 2026-04-14 21:20 GMT

मई दिवस या अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस आने में अभी एक पखवाड़े का वक्त बचा है, लेकिन जिन वजहों से 140 साल पहले मजदूरों ने अपनी आवाज़ बुलंद की थी, वो वजहें अब कई गुना सघनता के साथ समाज में मौजूद हैं। इसकी झलक सोमवार और मंगलवार को उत्तरप्रदेश के औद्योगिक नगर नोएडा में दिखाई दी। वही नोएडा जहां कुछ दिनों पहले जेवर अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे का उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने किया और कहा कि अब युवाओं के विकास की उड़ान को पंख मिलेंगे। दिल्ली से सटे नोएडा में कई बहुराष्ट्रीय कंपनियों के दफ्तर और कारखाने हैं। आलीशान रिहायशी इलाके हैं, जहां करोड़ों के फ्लैटों और कोठियों में समाज का उच्च तबका रहता है। लेकिन इस चमचमाती दुनिया के पीछे वही मलिन बस्तियां हैं, जिन्हें छिपाने के लिए अक्सर सफेद पर्दे डाल दिए जाते हैं।

याद कीजिए अहमदाबाद में नमस्ते ट्रंप से लेकर दिल्ली में जी-20 की बैठक तक जब भी अंतरराष्ट्रीय मेहमान भारत आए, ऐसे ही गरीबी को छिपाया जाता रहा। लेकिन सोमवार 13 अप्रैल को नोएडा के फेज टू में एक निजी कंपनी के श्रमिकों ने काम के घंटे और मेहनताने को लेकर जो प्रदर्शन किया, वह छिपाया नहीं जा सका। चूंकि कई बड़े चैनलों के दफ्तर नोएडा में ही हैं, तो यहां मजदूरों के भड़के असंतोष और उसे दबाने के लिए की गई प्रशासनिक सख्ती को पूरा कवरेज मिला। हालांकि नोएडा से पहले कई और शहरों में मजदूरों की नाराजगी सामने आई है।

इस साल फरवरी में बिहार के बरौनी में मजदूर न्यूनतम वेतन बढ़ाने और काम के घंटे तय करने की मांग को लेकर सड़कों पर उतरे। इसके बाद सूरत, मानेसर, पानीपत और फिर नोएडा तक यह सिलसिला फैल गया। इन सभी जगहों पर मांगें लगभग एक जैसी थीं- न्यूनतम वेतन में बढ़ोतरी, ओवरटाइम का सही भुगतान, बकाया राशि का निपटारा और स्थायी कर्मचारियों जैसी सुविधाएं। मजदूर संगठनों का कहना है कि नवंबर 2025 में लागू हुए नयी श्रमिक संहिता के बाद मजदूरों को उम्मीद थी कि उनकी स्थिति बेहतर होगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। नोएडा का विरोध प्रदर्शन खास तौर पर इसलिए व्यापक हो गया क्योंकि वहां बड़ी संख्या में ठेका मजदूर काम करते हैं। ये मजदूर ठेकेदारों के जरिए रखे गए हैं और उन्हें न तो स्थायी नौकरी की सुरक्षा है और न ही पीएफ या अन्य सामाजिक सुरक्षा लाभ मिलती है। 8 अप्रैल से ही मजदूरों का विरोध प्रदर्शन शुरु हो गया था जो धीरे-धीरे तेज हुआ और सोमवार को यह हिंसक हो गया। ट्रेड यूनियन नेताओं का आरोप है कि पिछले पांच दिनों से उन्हें नजरबंद रखा गया था, जिससे हालात और बिगड़ गए। उनका कहना था कि जब मजदूरों से बातचीत ही नहीं होगी, तो स्थिति नियंत्रण से बाहर होनी ही थी।

मजदूर वर्ग की ऐसी नाराजगी किसी भी सत्ता के लिए चेतावनी होती है कि उसकी नीतियों से जनता संतुष्ट नहीं है, लिहाजा उसे आत्मनिरीक्षण करना चाहिए। लेकिन मौजूदा भाजपा के शासनकाल में सत्ता से नाराजगी सीधे देश से विद्रोह मान लिया जाता है। जब किसान आंदोलन हुआ था तो उसे खालिस्तानी आतंकवाद से जोड़ा गया था। शाहीन बाग के आंदोलन में अंतरराष्ट्रीय साजिश देखी गई। और अब नोएडा में मजदूरों के विरोध प्रदर्शन में पाकिस्तान और नक्सलवाद का कोण सरकार ने ढूंढ निकाला है। उत्तर प्रदेश के श्रम मंत्री अनिल राजभर ने मजदूरों की वाजिब मांग को 'बड़ी साजिश' का हिस्सा बताया और कहा कि इसमें 'पाकिस्तान लिंक' की भी जांच की जा रही है। वहीं, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी बयान दिया कि यह 'नक्सलवाद को फिर से जीवित करने की साजिश' का हिस्सा हो सकता है। उन्होंने अधिकारियों को सतर्क रहने और 'विघटनकारी तत्वों' की पहचान करने के निर्देश दिए हैं।

कितनी चालाकी से सरकार ने अपनी जिम्मेदारी पाकिस्तान और नक्सलवाद पर डालने की कोशिश की, हालांकि बाद में सरकार ने औद्योगिक विकास आयुक्त की अध्यक्षता में एक उच्चस्तरीय समिति गठित की, जिसे मजदूरों और उद्योगों के बीच बातचीत कर समाधान निकालने का जिम्मा दिया गया। अब सरकार ने न्यूनतम वेतन में बढ़ोतरी की घोषणा की है। नोएडा (गौतम बुद्ध नगर) और गाजियाबाद में अब अकुशल मजदूर को 13,690 रुपये, अर्ध-कुशल को 15,059 रुपये और कुशल मजदूर को 16,868 रुपये मासिक वेतन तय किया गया है। अन्य नगर निगम क्षेत्रों और बाकी जिलों में भी इसी तरह अलग-अलग दरें तय की गईं हैं।

सरकार ने वेतन बढ़ोतरी को 'संतुलित कदम' बताया है। लेकिन मजदूरों की शुरुआती मांगों और उनकी वास्तविक आय-व्यय की स्थिति को देखते हुए यह सवाल बना हुआ है कि क्या यह बढ़ोतरी उनके जीवन स्तर में वास्तविक सुधार ला पाएगी? बता दें कि नोएडा की फैक्ट्रियों में औसत वेतन 10-15 हजार रुपये के बीच है, जो बढ़ती महंगाई, खासकर मौजूदा ऊर्जा संकट के बाद, जीवनयापन के लिए पर्याप्त नहीं है। क्योंकि मजदूरों का वेतन तो वहीं का वहीं है, लेकिन इस बीच खाद्य सामग्री, शिक्षा, इलाज और किराया सबकी कीमतें बढ़ गई हैं। बहुत से मजदूर इसी वजह से गांवों में वापस लौट गए हैं, हालांकि वहां भी उनके लिए खेती-किसानी बची नहीं है। मज़दूरों का कहना है कि भत्तों में बढ़ोतरी से बचने के लिए कर्मचारियों को नौ महीने के भीतर ही बर्खास्त कर दिया जाता है और फिर से नियुक्त कर लिया जाता है। उन्हें डर है कि कारखाना मालिकों ने सरकार के दबाव में न्यूनतम वेतन बढ़ाने की मांग मान तो ली है, लेकिन उसे लागू करने में अभी से आनाकानी कर रहे हैं।

इसी डर की वजह से सोमवार के बाद मंगलवार को सेक्टर 80 में ऐसा ही विरोध प्रदर्शन भड़क उठा। कम वेतन को लेकर प्रदर्शन कर रहे श्रमिकों पर पुलिस ने लाठीचार्ज किया, प्रदर्शनकारियों को खदेड़ दिया और इलाके को खाली करा लिया। पुलिस ने कहा कि उपद्रवी तत्वों ने स्थिति का फायदा उठाने की कोशिश की। पुलिस अब इस आंदोलन को पाकिस्तान से जोड़कर उस लिंक को तलाश रही है। वहीं नोएडा के कुछ चैनल कल से ही मजदूरों के आंदोलन को पाकिस्तान से जोड़ने में जुटे हुए हैं। इस तरह के कवरेज से सरकार खुश हो सकती है, लेकिन पहले किसानों और अब श्रमिकों का अपमान करके क्या देश चल पाएगा, इस पर गंभीरता से सोचने की जरूरत है।

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