समाज में उठ रही गंभीर चेतावनियां
जयपुर में शाही अंदाज में शादी करवाने के लिए 17 करोड़ रूपयों में एक महल भी बुक करवा लिया गया था, लेकिन उससे पहले इतना बुरा हादसा हो गया।;
पुणे में घटित केतन अग्रवाल हत्याकांड ने एक बार फिर भारतीय समाज की उन परतों को उधेड़ दिया है, जिन्हें देखते-समझते हुए भी अक्सर नजरें फेर ली जाती हैं, क्योंकि हमें आदर्शवादी समाज का दिखावा बनाए रखना है। असीम संभावनाओं से भरे 26 साल के केतन अग्रवाल की हत्या उनकी मंगेतर सिया गोयल ने अपने प्रेमी चेतन चौधरी के साथ मिलकर कर दी। पुणे के पास लोहागढ़ के किले में ट्रेकिंग के बहाने सिया केतन को ले गई, उससे पहले अपने जन्मदिन का जश्न केतन के साथ मनाया और बाकायदा सोशल मीडिया पर उसे डाला भी। उन वीडियो को देखकर जरा सा अनुमान नहीं लगाया जा सकता कि इस दौरान कितनी भयावह योजना उसके दिमाग में चल रही होगी। लोहागढ़ किले में जब केतन और सिया पहुंचे तो उनके साथ-साथ चेतन चौधरी भी पहुंचा, जिसके साथ मिलकर सिया ने केतन को ऊंचाई से धक्का दे दिया। इसके बाद सोशल मीडिया पर फिर पोस्ट डाली कि जन्मदिन पर तुम मुझे छोड़ कर चले गए। पहले पहल इसे सामान्य दुर्घटना मानकर सिया के लिए ही सबकी सहानुभूति उमड़ी कि नवंबर में इनकी शादी होनी थी, जिसके लिए दोनों परिवार जमकर तैयारी कर रहे थे।
जयपुर में शाही अंदाज में शादी करवाने के लिए 17 करोड़ रूपयों में एक महल भी बुक करवा लिया गया था, लेकिन उससे पहले इतना बुरा हादसा हो गया। पुलिस ने जब इस दुर्घटना की जांच शुरु की तो कुछ अजीबोगरीब संयोगों पर नजर गई, जैसे शादी से पहले की फोटोग्राफी करवाने के लिए यह जोड़ा बाली जाने वाला था, और एक दिन पहले केतन का पासपोर्ट अचानक गुम हो गया। 14 जून को भी सिया और केतन लोहागढ़ ट्रेक पर गए थे, जहां केतन को सिया ने धक्का दिया था और उसने झाड़ी पकड़कर खुद को बचाया था, तब सिया ने कहा था कि उसने सांप देखा और केतन की जान बचाने के लिए घबराहट में उसे धक्का दिया। लेकिन 18 जून को जब यह जोड़ा फिर से लोहागढ़ ट्रेक पहुंचा तो इस बार उनके करीब ही एक युवक सर्दियों में पहने जाने वाली हुडी को पहना हुआ था और उसका चेहरा छिपा था, जबकि पुणे में अभी गर्मी ही है। पुलिस ने जब इन सारे तथ्यों की गहराई से पड़ताल की तो यह समझने में वक्त नहीं लगा कि यह सामान्य हादसा नहीं बल्कि सोची-समझी साजिश के तहत की गई हत्या थी।
अब सिया पुलिस की गिरफ्त में है, केतन के घरवाले स्वाभाविक तौर पर उसके लिए कड़ी से कड़ी सजा की मांग कर रहे हैं। उनका एक ही सवाल है कि अगर किसी और से प्यार था और केतन से शादी नहीं करनी थी, तो पहले ही अपने घरवालों को मना कर देना था, इसके लिए हमारे बेटे को मारने की क्या जरूरत थी। ठीक ऐसा ही सवाल पिछले साल मेघालय में क्रूरता से मारे गए राजा रघुवंशी के घर वाले भी पूछ रहे थे। जब राजा से शादी करने के चंद दिनों बाद सोनम ने अपने प्रेमी के साथ मिलकर उनकी हत्या कर दी थी। असल में इन्हें प्रेमी या प्रेमिका कहना प्रेम जैसे पवित्र भाव का अपमान करने जैसा है, ये अपराध में भागीदार होते हैं, इससे ज्यादा इन्हें और कुछ नहीं कहा जा सकता। क्योंकि जो प्रेम करेगा, वह अपने साथी को कभी गलत दिशा में कदम उठाने नहीं कहेगा।
बहरहाल, इंदौर से लेकर पुणे तक अपने जीवनसाथी को मारने की घटनाएं समाज में बढ़ती आपराधिक प्रवृत्ति को तो दिखाती ही हैं, साथ ही यह संकेत भी देती हैं कि एक बनी-बनाई लीक पर समाज को चलाने की कोशिश कई बार कितने भयावह परिणाम लाती है। न जाने क्यों भारतीय समाज में अपनी मर्जी से जीवनसाथी चुनने या किसी से प्यार करने के बाद शादी करने को हिकारत से देखा जाता है। आज के दौर में भी बहुत से अभिभावक यह कहने से हिचकते हैं कि उनकी बेटी या बेटे ने अपनी मर्जी से जीवनसाथी चुना है।
पितृसत्तात्मक समाज बेटे की पसंद को एक बार सहजता से स्वीकार कर भी ले, लेकिन अधिकतर घरों में बेटियां खुलकर जीवनसाथी के लिए अपनी मर्जी का इजहार कर ही नहीं पाती हैं। अगर करें तो उसे या तो पाश्चात्य संस्कृ ति का दुष्प्रभाव बताया जाता है, या फिर निर्लज्जता की श्रेणी में डाला जाता है। शायद इसी वजह से कई बार सही राह पर चलकर अपनी मर्जी बताने की जगह हत्या करने जैसा आपराधिक कदम उठाया जाता है, जिसकी कोई माफी नहीं दी जा सकती। जो इंसान किसी दूसरे की जान लेने जैसा अतिरेक भरा कदम उठा सकता है, वो इतनी हिम्मत क्यों नहीं जुटा पाता कि शादी के लिए अपनी मर्जी बताए या मां-बाप के दबाव को मानने से इंकार करे।
सिया गोयल और सोनम रघुवंशी दोनों को अगर वाकई अपने पसंद के लड़कों से शादी करनी थी या मां-बाप की मर्जी से शादी नहीं करनी थी, तो वे पहले बता सकती थीं, इससे घर बर्बाद नहीं होते, न ही विवाह जैसी संस्था से भरोसा उठता। मगर इन्होंने गलत राह चुनी। हालांकि इनके कारण केवल लड़कियों पर सवाल उठाने से इस गंभीर समस्या का समाधान नहीं मिलेगा। अभी बीते दिनों नोएडा से लेकर भोपाल तक दहेज हत्याओं या ससुराल में मिली प्रताड़ना के कारण हुई मौतों के मामले सामने आए, जिनमें नवयुवतियों की जिंदगी बर्बाद हुई और उनके मां-बाप जिंदगी भर का दुख अब उठा रहे हैं। यह सब इसलिए हो रहा है क्योंकि बड़ों के सामने खुलकर अपनी राय रखने को आज भी बदतमीजी बताया जाता है। हमारे जमाने में तो बिना दिखाए-बताए शादी हो जाती थी और कोई हूं-चूं नहीं करता था, जैसी बातें सुनाकर नयी पीढ़ी को तिरस्कृत करना आम बात है। अच्छी संतानें उन्हें ही माना जाता है जो बिना ना-नुकुर के, बिना किसी सवाल के बड़ों के फैसले को मान ले। इसमें मां-बाप तो आज्ञाकारी संतान होने की खुशी मना लेते हैं, लेकिन अपनी मर्जी दबाने की कुंठा कई तरीकों से बाहर आती है, जिसमें अक्सर जीवनसाथी ही प्रभावित होते हैं।
आदर्शवादी समाज होने का ढकोसला और ज्यादा खींचने की जगह अब बदलते माहौल की हकीकत को समझना और स्वीकार करना शुरु करना चाहिए। भोपाल, नोएडा, इंदौर, पुणे में घटी घटनाएं केवल अपराधकथाएं नहीं हैं, ये समाज में तेजी से बज रहे अलार्म की तरह हैं, जिन्हें सुनकर जागने की जरूरत है।