नए रंगों में छात्रों की गूंज
इंदौर में छात्रों की गूंज कार्यक्रम की जबरदस्त सफलता ने भाजपा के समूचे तंत्र को हिला कर रख दिया है।;
इंदौर में छात्रों की गूंज कार्यक्रम की जबरदस्त सफलता ने भाजपा के समूचे तंत्र को हिला कर रख दिया है। राहुल गांधी युवाओं को उम्मीद बंधाने वाले अपने इस कार्यक्रम में हर बार एक नया रंग जोड़ रहे हैं। इंदौर में राहुल गांधी ने दुख, करुणा, हास्य-व्यंग्य, क्रोध तमाम भावनाओं का समावेश अपने संबोधन में किया। कोटा में जब राहुल गांधी ने छात्रों की गूंज का पहला कार्यक्रम किया था तो राजनीति पर बात करने से इंकार कर दिया था। फिर देहरादून में उस वक्त यह कार्यक्रम हुआ, जब जंतर-मंतर पर भी आंदोलन चल रहा था। अपने मंच पर राहुल ने नीट पेपर लीक की शिकार छात्रा के पिता को बुलाया, उनका दुख साझा किया। प्रयागराज में राहुल गांधी ने देश की युवा शक्ति का जिक्र किया, और कहा कि अमेरिका, चीन और रूस कोई भी भारत के युवाओं की संभावना का मुकाबला नहीं कर सकता। पुणे में राहुल गांधी ने छात्रों की गूंज को पूरी तरह लड़कियों की आवाज उठाने का मंच बनाया। और अब इंदौर में राहुल गांधी ने छात्रों के भविष्य की बात करने के साथ उस व्यवस्था पर प्रहार किया, जो युवाओं की राह में रोड़ा बन चुकी है। पुणे में राहुल गांधी ने मनुस्मृति पर प्रहार किया था और उदाहरण दिए थे कि मोहन भागवत, नरेन्द्र मोदी समेत कई भाजपा नेताओं की सोच कितनी संकुचित है। वहीं इंदौर में राहुल गांधी ने भाजपा और संघ की बनाई व्यवस्था पर प्रहार करने के लिए नरेन्द्र मोदी, मोहन भागवत, अमित शाह, अजित डोभाल, मुकेश अंबानी, गौतम अडानी, जैसों का चेहरा पहली पंक्ति में लगाकर नीचे की पंक्ति में योगी आदित्यनाथ, मोहन यादव, ज्ञानेश कुमार, रामदेव, कंगना रानौत, पत्रकारों में अर्णव गोस्वामी, रजत शर्मा जैसे चेहरों को भी उजागर किया कि किस तरह इन तमाम लोगों ने मिलकर एक ऐसा सिस्टम तैयार किया है, जो छात्रों के खिलाफ है।
राहुल गांधी ने बता दिया कि छात्र यानी स्टूडेंट और अंधभक्तों के बीच का फर्क समझाया और बताया कि कैसे भाजपा का बनाया सिस्टम अंधभक्तों को बढ़ा रहा है। 2014 से ही देश देख रहा है कि नरेन्द्र मोदी को सत्ता पर बिठाने के लिए भाजपा और संघ को अंधभक्तों की जरूरत थी, ताकि जब संविधान को तार-तार करने के लिए न्यायपालिका, चुनाव आयोग, संसद समेत सारे मंचों का दुरुपयोग किया जाए तो कोई सवाल न करे। पिछले बारह सालों से यही देश में हो भी रहा है। मोदी ने सत्ता में आने से पहले हर साल दो करोड़ रोजगार का वादा किया था, मगर बेरोजगारी 45 सालों में सबसे उच्च स्तर पर जा पहुंची, तो अंधभक्तों ने सवाल नहीं किया। जिन छात्रों ने सवाल किया, उनके साथ भाजपा ने क्या किया, ये उमर खालिद जैसे उदाहरणों से समझा जा सकता है। मोदी ने सत्ता में आने के दो साल बाद ही नोटबंदी कर दी और नकदी रहित अर्थव्यवस्था के नाम पर यूपीआई को बढ़ावा दिया, अब अमेरिका के दबाव में यूपीआई पर भी शुल्क लगाने का फैसला लिया, जिसके बाद छोटे-बड़े सारे दुकानदार अब यूपीआई से भुगतान लेने से इंकार कर रहे हैं। अंधभक्त फिर भी सवाल नहीं करेंगे कि नोटबंदी से आखिर देश को क्या मिला। मोदी ने लोगों से कहा कि तेल का इस्तेमाल कम करो, लेकिन अपने जन्मदिन पर करोड़ों रुपयों का तेल दिए जलवाने में फुंकवा दिया, अंधभक्त फिर भी सवाल नहीं करेंगे कि मोदीजी आपकी कथनी और करनी में इतना अंतर क्यों है।
अपने मंच से राहुल गांधी ने शनिवार को यही सच पूरे देश को फिर से दिखाया। इसके साथ ही राहुल गांधी ने हाल ही में दिल्ली में सत्य निकेतन इलाके में बहुमंजिला इमारत के गिरने और उसमें निर्दोष छात्रों की मौत पर भी सरकार को घेरा। इस घटना के बाद छात्रों में भाजपा के लिए पहले ही काफी नाराजगी है, क्योंकि उनके लिए छात्रावास की व्यवस्था नहीं है, इसलिए बच्चों को दड़बेनुमा कमरों में भारी किराए के साथ रहना पड़ता है। और बदले में जान जोखिम में डालनी पड़ती है। राहुल ने इस घटना में मृत एक युवा के परिजनों के साथ मंच पर उनका दुख साझा किया। प्रत्यक्षदर्शी बताते हैं कि उस समय वहां मौजूद कई युवाओं की आंखें नम हो गई थीं। ऐसी संवेदनशीलता ही नागरिकों के बीच एकता बनाए रखती है। संवेदनहीन राजनीति करने वाली भाजपा बार-बार इस एकता को कुचलना चाहती है। लेकिन राहुल गांधी उसकी इस कोशिश के सामने बड़ी चट्टान की तरह खड़े हुए हैं, यह भाजपा के लिए काफी तकलीफदेह है।
राहुल गांधी ने भाजपा की तकलीफ बढ़ाने वाला एक और काम इंदौर में किया। हास्य कलाकार पुलकित मणि राहुल गांधी के मंच पर आए और उन्होंने जबरन गले मिलने, हीही-खीखी करने, फ्रैंड्स कहने जैसे कुछ अभिनय किए, जिस पर अब भाजपा तिलमिलाई हुई है। उनके हास्य अभिनय में कहीं नरेन्द्र मोदी या उनकी स्वर्गीया मां का नाम नहीं लिया गया, मगर भाजपा के सारे मुख्यमंत्री, केन्द्रीय मंत्री, भाजपा खेमे के पत्रकार और अब तक खुद को निष्पक्ष बताने वाले पत्रकार भी राहुल गांधी की नीयत और नैतिकता पर सवाल उठाने लगे। संभवत: हरिशंकर परसाई ने कहा था कि तानाशाह मसखरों से डरता है, क्योंकि वे उसकी भव्यता के गुब्बारे में सुई चुभो देते हैं। यही बात अब सच साबित होते दिखी। नेहरूजी से लेकर डा.मनमोहन सिंह तक तमाम प्रधानमंत्रियों को व्यंग्यकारों ने अपने निशाने पर लिया है। लेकिन इसमें व्यंग्यकारों या कलाकारों की देशभक्ति पर सवाल नहीं उठे, न इनसे देश की प्रतिष्ठा धूमिल हुई। अभिव्यक्ति की आजादी चयनित तरीके से नहीं दी जा सकती। मगर मोदी सरकार का सिस्टम सबको डरा-धमका कर रखना चाहता है।
मगर ये डर अब खत्म हो चुका है, ये इंदौर में नजर आया। राहुल के साथ मंच साझा करने वाले लोगों ने एक बार फिर बेझिझक, बेखौफ होकर बातें कीं। राहुल गांधी के समर्थक और प्रशंसक तो उनके इस अंदाज के मुरीद हैं ही कि वे कितनी सहजता से आम लोगों में घुल मिल जाते हैं। जबकि वे पांच बार से सांसद निर्वाचित हो रहे हैं, इस समय नेता प्रतिपक्ष हैं और उनके परिवार से तीन व्यक्ति देश के प्रधानमंत्री रह चुके हैं। राहुल के विरोधी भी उनकी इस सहजता की काट नहीं ढूंढ पाते हैं, इसलिए उनकी छवि खराब करने की कोशिशें की जाती हैं। 2004 से जब से राहुल गांधी सक्रिय राजनीति में उतरे हैं, उन्हें शहजादा, वंशवाद का प्रतीक, पप्पू, पार्टटाइम राजनेता और न जाने कितने अपमानजनक शब्दों की चोट पहुंचाई गई। मगर अब जनता ही देख रही है कि राहुल गांधी का सच क्या है।