ट्रंप का खत्म हुआ दबदबा

By :  National
Update: 2026-11-04 22:24 GMT

अमेरिका में मध्यावधि चुनाव राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लिए बड़ा झटका साबित हुए हैं। डोनाल्ड ट्रंप के लिए इन चुनावों को बड़ी परीक्षा माना जा रहा था। क्योंकि अपने दूसरे कार्यकाल में उन्होंने कई ऐसे फैसले लिए जिसका सीधा असर न केवल वैश्विक अर्थव्यवस्था और राजनीति पर पड़ा, बल्कि अमेरिका के भीतर भी सवाल खड़े होने लगे कि क्या दुनिया का सबसे बड़ा यह लोकतांत्रिक देश नफरत और हिंसा का प्रतिनिधि बनकर रह जाएगा। गौरतलब है कि अपने दूसरे कार्यकाल में ट्रंप ने मेक अमेरिका ग्रेट अगेन का नारा बुलंद करते हुए नयी टैरिफ नीति घोषित कर दी, जिसकी चपेट में भारत समेत कई देश आए। अमेरिका में काम करने, नागरिकता हासिल करने और वीज़ा के नए कड़े नियम बना दिए, जिसका असर लाखों लोगों पर पड़ा। ईरान पर इजरायल के कहने से ट्रंप ने हमला बोला, जिसकी वजह से न केवल हजारों निर्दोषों की मौत हुई, बल्कि होर्मुज जलडमरूमध्य मार्ग पर पाबंदी लगाने को ईरान मजबूर हुआ और इसका खामियाजा सारी दुनिया ने भुगता। ईरान के मीनाब शहर में बच्चियों के स्कूल पर अमेरिकी हमले के बारे में अमेरिका में सवाल उठे, लेकिन ट्रंप ने इस पर जवाब नहीं दिया। वेनेजुएला में राष्ट्रपति मादुरो निकोलस के सुरक्षा गार्डों को रिश्वत देकर अपने साथ मिलाना और फिर उन्हें पत्नी समेत अगवा कर लेने का काम ट्रंप ने किया, मानो दुनिया अब भी मध्यकाल में जी रही है। कई देशों के आंतरिक मामलों या चुनावों में दखल देने का काम अमेरिका हमेशा ही करता रहा है, ट्रंप ने इस रवायत को बरकरार रखा, हालांकि इससे उनका अपना ही नुकसान हुआ।

बहरहाल, अब जो मध्यावधि चुनावों के नतीजे आए हैं, उसमें डेमोक्रेटिक पार्टी ने प्रतिनिधि सभा यानी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव और सीनेट, दोनों पर नियंत्रण हासिल कर लिया है। इसके बाद सवाल उठने लगे हैं कि क्या अब ट्रंप के लिए बचे दो सालों का कार्यकाल खासा मुश्किल होने लगा है। वैसे अमेरिकी संविधान में 'सेपरेशन ऑफ पावर' की व्यवस्था है। यानी शक्तियों का बंटवारा है। संसद, सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रपति की शक्तियां अलग-अलग हैं और कोई किसी के काम में दखल नहीं दे सकता। खास बात ये है कि राष्ट्रपति संसद के प्रति उत्तरदायी नहीं है। इसलिए सीनेट और प्रतिनिधि सभा में करारी हार के बावजूद राष्ट्रपति के तौर पर डोनाल्ड ट्रंप की कार्यकारी शक्तियों पर कोई असर नहीं पड़ेगा। लेकिन अब वो कोई कानून अपनी मर्जी से पास नहीं करवा पाएंगे। इसके लिए संसद की जरूरत होती है। डेमोक्रेट्स की संख्या 90 होने के कारण, उनके सभी बिल रोक दिए जाएंगे। दूसरी बात, बजट पर संसद का नियंत्रण होता है। तो ट्रंप के लिए मागा जैसे प्रोजेक्ट्स के लिए कोई फंडिंग नहीं मिल पाएगी। वहीं व्यापार समझौतों और युद्ध के लिए फंडिंग के वास्ते संसद की मंजूरी जरूरी होगी, तो यहां भी मर्जी नहीं चल पाएगी। तीसरी बात जजों/अधिकारियों की मनमानी नियुक्ति नहीं कर पाएंगे, सीनेट उनके द्वारा चुने गए नामों को रोक देगी। ट्रंप पर अब महाभियोग का खतरा बढ़ सकता है। एपस्टीन फाइल्स जैसे कुछ मामलों में डेमोक्रेट्स जांच शुरू कर सकते हैं और महाभियोग की प्रक्रिया भी ला सकते हैं।

इन नतीजों में कुछ चौंकाने वाले नतीजे आए हैं। जैसे डेमोक्रेट्स ने कई ऐसे राज्यों में भी जीत दर्ज की, जिन्हें पारंपरिक रूप से रिपब्लिकन का मजबूत इलाका माना जाता रहा है। टेक्सास, साउथ कैरोलाइना, आयोवा और कंसास जैसे राज्यों में उनकी सफलता विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। कई रिपब्लिकन उम्मीदवारों को भी हार का सामना करना पड़ा, जिन्हें ट्रंप का समर्थन प्राप्त था। मिशिगन सीट से जीत कर डेमोक्रेट अब्दुल अल सैयद अमेरिका के पहले मुस्लिम सीनेटर बन गए हैं। डोनाल्ड ट्रंप ने चुनाव प्रचार के दौरान अब्दुल के खिलाफ काफी नफरती टिप्पणी की थी। इस पर अब्दुल ने अब तंज कसते हुए कहा है कि डोनाल्ड ट्रंप को मेरा नाम लेने में दिक्कत होती थी, अब वह मुझे सीनेटर कह सकते हैं। इसी तरह इल्हान उमर पांचवी बार जीती हैं, उन्हें मिनेसोटा से भारी जीत हासिल हुई है। ट्रंप ने इल्हान उमर की शादी को लेकर भी काफी सवाल उठाए थे। इल्हान उमर की नागरिकता की जांच भी चल रही है। इसके बावजूद उन्हें जीत मिली। जॉर्जिया में डेमोक्रेटिक पार्टी की केइसा लांस बॉटम्स ने इतिहास रच दिया है। केइसा लांस बॉटम्स पहली अश्वेत महिला हैं जो अमेरिका में किसी राज्य की गवर्नर चुनी गई हैं।

तो ऐसे कई बड़े उलटफेर हुए हैं, जिन पर कहा जा रहा है कि यह सब ट्रंप की नीतियों से जनता की नाराजगी के परिणाम हैं। ट्रंप ने अपने भाषणों और बयानों में काफी व्यक्तिगत हमले लोगों पर किए, लेकिन अमेरिकी जनता ने इस बार अपने उदार चरित्र को दिखाया है। ट्रंप ने भी अब जनता की मर्जी को स्वीकार कर लिया है। वैसे भी उनका यह अंतिम कार्यकाल है, दो बार के बाद तीसरी बार राष्ट्रपति का चुनाव वो नहीं लड़ेंगे, लेकिन ट्रंप के कारण रिपब्लिकन पार्टी को जो नुकसान हुआ है, उसकी भरपाई करने में वक्त लगेगा। ट्रंप ने अब मान लिया है कि ईरान पर युद्ध के कारण जनता ने साथ नहीं दिया। ट्रंप ने कहा भी है कि अब ईरान पर हमला नहीं होगा, न ही इजरायल को आर्थिक मदद दी जाएगी। ईरानी संसद के अध्यक्ष एम बी गालिबाफ ने भी कहा है कि चाहे अंतरात्मा की आवाज़ हो या जीवन-यापन का सवाल, अमेरिकियों ने 'युद्ध को ना' कहा है, और हम इस संदेश का समर्थन करते हैं।

लेकिन यह सब इतने सरल समीकरण नहीं हैं। ट्रंप ने अकेले के दम पर युद्ध नहीं छेड़ा था, उसके पीछे जो कार्पोरेट लॉबी काम कर रही थी, क्या वह ट्रंप पर या अब किसी और तरीके से अमेरिकी सत्ता पर दबाव नहीं बनाएगी और दुनिया में अशांति फैलाने की कोशिश नहीं करेगी, इन सवालों के जवाब तलाशने होंगे।

वैसे कांग्रेस सांसद अभिषेक सिंघवी ने मजेदार टिप्पणी की है कि नतीजे बता रहे हैं कि अमेरिकी राष्ट्रपति के बजाय, ईरान ने अमेरिका में सत्ता परिवर्तन (रेजीम चेंज) सफलतापूर्वक कर दिया है!

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