स्वतंत्र पत्रकारिता के लिए एक और चुनौती

मोदी सरकार के 12 वर्षों में भारत में प्रेस की आजादी काफी ज्यादा खतरे में पड़ चुकी है। कार्पोरेट पूंजी ने स्वतंत्र पत्रकारिता पर कई तरह की बेड़ियां लगा ही दी हैं, ऊपर से सरकार के रवैये ने भी निर्भीक, स्वतंत्र और जिम्मेदार पत्रकारिता को काफी नुकसान पहुंचाया है;

By :  Deshbandhu
Update: 2026-10-28 01:22 GMT

मोदी सरकार के 12 वर्षों में भारत में प्रेस की आजादी काफी ज्यादा खतरे में पड़ चुकी है। कार्पोरेट पूंजी ने स्वतंत्र पत्रकारिता पर कई तरह की बेड़ियां लगा ही दी हैं, ऊपर से सरकार के रवैये ने भी निर्भीक, स्वतंत्र और जिम्मेदार पत्रकारिता को काफी नुकसान पहुंचाया है। सरकार ने निजता की सुरक्षा के नाम पर जो डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण का कानून बनाया है, वह भी अब पत्रकारिता की राह में बड़ा रोड़ा बन रहा है। इस बाधा को दूर करने के लिए डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन (डीएनपीए) ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था। डीएनपीए की याचिका पर मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है। गौरतलब है कि डीएनपीए के माध्यम से 21 समाचार प्रकाशकों ने कानून के प्रावधानों को चुनौती दी है। जिनमें वे मीडिया संस्थान भी शामिल हैं, जिनके मालिकाना हक गौतम अडानी और मुकेश अंबानी के पास हैं।

मंगलवार को भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची तथा जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने डीएनपीए की याचिका पर सुनवाई की और केंद्र सरकार से याचिका पर जवाब मांगा है। अदालत ने मामले को आगे की सुनवाई के लिए 17 नवंबर की तारीख दी है। हालांकि केंद्र सरकार को नोटिस जारी होने का अर्थ यह नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट ने कानून को असंवैधानिक घोषित कर दिया है। कानून की वैधता और उसके प्रावधानों पर अंतिम निर्णय होना बाकी है और यहीं सारा पेंच फंसा हुआ है। क्योंकि अगर अदालत का फैसला कानून निरस्त करने या इसमें प्रावधानों में संशोधनों वाला हुआ, तब तो खोजी पत्रकारिता के लिए उम्मीद बची रहेगी। वर्ना फिर बड़े घोटालों की पोल खोलने वाली खबरें बनाने का जोखिम भरा काम शायद ही हो पाए।

ध्यान रहे कि डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 भारत का पहला व्यापक डेटा संरक्षण कानून है, जिसे 11 अगस्त 2023 को राष्ट्रपति की स्वीकृति मिली थी। इस कानून का मकसद नागरिकों के डिजिटल व्यक्तिगत डेटा की गोपनीयता और सुरक्षा को सुनिश्चित करना तथा डेटा के वैध उपयोग के बीच संतुलन बनाना। केंद्र सरकार ने इससे संबंधित डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण नियम, 2025, पिछले साल 14 नवंबर को अधिसूचित किए हैं। नियमों का उल्लंघन करने या डेटा सुरक्षा में चूक होने पर 'डेटा प्रोटेक्शन बोर्डÓ द्वारा 250 करोड़ रुपये तक का भारी जुर्माना लगाया जा सकता है।

तकनीकी विकास के इस वक्त में डेटा लीक होने और व्यक्तिगत जानकारियां गलत हाथों में पड़ने के खतरे वाकई बहुत बढ़ चुके हैं। इस लिहाज से निजता की सुरक्षा के प्रावधान करने में कोई हर्ज नहीं है। लेकिन इसकी आड़ में गलत बातों पर पर्दा डालने और उन खबरों को बाहर आने से रोकने की चालाकी हो, तो फिर सवाल उठने जायज हैं।

मीडिया संगठनों का कहना है कि इस कानून के प्रावधान खोजी पत्रकारिता को बाधित कर सकते हैं, सूचना पाने के मौलिक अधिकार को प्रभावित कर सकते हैं और पत्रकारों के गोपनीय सूत्रों की पहचान उजागर होने का खतरा पैदा कर सकते हैं। मीडिया संगठनों की चिंता है कि व्यक्तिगत डिजिटल डेटा की सुरक्षा के लिए बनाए गए नियम यदि पत्रकारिता पर भी उसी तरह लागू होते हैं, तो भ्रष्टाचार, कॉरपोरेट अनियमितताओं, चुनावी गड़बड़ियों और सरकारी कामकाज की जांच करना मुश्किल हो सकता है। डीएनपीए की दलील है कि कानून के नोटिस और सहमति से जुड़े प्रावधानों को पत्रकारिता पर लागू करने से ऐसी स्थिति पैदा हो सकती है, जिसमें किसी व्यक्ति के बारे में उसकी निजी जानकारी जुटाने या उसकी गतिविधियों की जांच करने से पहले पत्रकारों को उसे सूचना देनी पड़े या उसकी सहमति लेनी पड़े। इसे आसान शब्दों में ऐसे समझ सकते हैं कि अगर किसी व्यक्ति पर भ्रष्टाचार के आरोप हैं या कोई खोजी पत्रकार किसी के भ्रष्ट कामों का पता लगा भी ले, तो भी उसे उजागर करने से पहले उसे संबंधित व्यक्ति को ही सूचना देनी होगी। और जाहिर है कि उसके बाद वह उस खबर को शायद ही सामने ला पाए, क्योंकि फिर उस खोजी पत्रकार पर व्यक्तिगत डेटा मिटाने के अधिकार का इस्तेमाल खबर को दबाने या उनमें बदलाव कराने की मांग के लिए किया जा सकता है।

मीडिया समूहों की आपत्ति का मूल सवाल यह है कि व्यक्तिगत निजता की रक्षा और स्वतंत्र पत्रकारिता के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। उनका कहना है कि निजता की सुरक्षा जरूरी है, लेकिन ऐसे नियमों से पत्रकारों की जनहित में जानकारी जुटाने और प्रकाशित करने की क्षमता प्रभावित नहीं होनी चाहिए।

रिपोर्टों के मुताबिक, मीडिया कंपनियों के प्रतिनिधियों और सरकार के बीच अगस्त में हुई बैठक में प्रेस की स्वतंत्रता की रक्षा को लेकर आश्वासन दिया गया था। लेकिन डीएनपीए का कहना है कि पत्रकारों के लिए कानून में स्पष्ट लिखित छूट नहीं होने से उसकी चिंताएं दूर नहीं हुई हैं। एसोसिएशन ने इस मुद्दे को केवल तकनीकी या डेटा प्रबंधन से जुड़ा विवाद नहीं माना है। उसके मुताबिक, कानून के कुछ प्रावधानों का असर यह हो सकता है कि समाचार संस्थान जनहित से जुड़े मामलों की जांच और रिपोर्टिंग करते समय कानूनी कार्रवाई या आर्थिक दंड के जोखिम से बचने के लिए जरूरी खबरें प्रकाशित करने से पीछे हटें।

बहरहाल, अब गेंद सुप्रीम कोर्ट के पाले में है, जहां से भारत में स्वतंत्र पत्रकारिता के बने और बचे रहने का रास्ता तय हो सकता है। क्योंकि सरकार के हित में तो यही है कि चाटुकार पत्रकार उसके कार्यकर्ता की तरह काम करते रहें। लेकिन यह देशहित में कतई नहीं है। अच्छी बात यह है कि जिन मीडिया संस्थानों पर सरकार के लिए काम करने के आरोप लगते रहे हैं, उनमें से भी कुछ इस कानून के प्रावधानों पर सवाल उठा रहे हैं। 

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