एमएलसी चुनाव के निहितार्थ
देश के चार राज्यों उत्तरप्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक और बिहार में विधानपरिषद की 28 सीटों के लिए चुनाव हुए। जिस के नतीजों से इस समय सियासी हलचल तेज हो गई है;
देश के चार राज्यों उत्तरप्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक और बिहार में विधानपरिषद की 28 सीटों के लिए चुनाव हुए। जिस के नतीजों से इस समय सियासी हलचल तेज हो गई है। हालांकि विधानपरिषद के चुनाव विधानसभा चुनावों से अलग होते हैं। इसमें जनता सीधे मतदान नहीं करती, बल्कि उसके द्वारा चुने प्रतिनिधि मतदान करते हैं। विधानपरिषद के सदस्य यानी एमएलसी छह सालों के लिए निर्वाचित होते हैं और सबसे बड़ी बात ये चुनाव मतपत्रों से होते हैं। मतलब चुनावी राजनीति का एमएलसी चुनाव से सीधे कोई लेना-देना नहीं है। लेकिन जब पंचायत से लेकर स्थानीय निकाय तक के चुनावों में मौजूदा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सीधी दिलचस्पी रहती है, तो फिर एमएलसी चुनाव भी आम चुनावों जैसी हलचल मचा देते हैं।
हालांकि 28 सीटों के जो नतीजे आए हैं, उन पर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा शुरु हो चुकी है। दरअसल बुधवार को जब नतीजे आ ही रहे थे, तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की एक पोस्ट आ गई, जिसमें कांग्रेस पर तंज कसते हुए उन्होंने लिखा- चुनाव बैलेट पेपर से हुए तो अंदाजा लगाइए कि कांग्रेस ने कितनी सीटें जीतीं। और इसके साथ एक इमोजी भी डाला है। इस पोस्ट के बाद सवाल उठने लगे कि किसी पार्टी की हार या जीत अपनी जगह है, लेकिन क्या प्रधानमंत्री मोदी पद की गरिमा भूलकर अब ट्रोलर्स की तरह बातें करने लगेंगे। मोदी की इस पोस्ट को ही आगे बढ़ाते हुए अमित शाह और देवेन्द्र फड़नवीस ने भी बिना देर किए अपनी तरफ से कांग्रेस के लिए शून्य सीटों का जिक्र कर मजे लिए। लेकिन अब उनका यह फूहड़ता से मजा लेना, भाजपा पर ही भारी पड़ चुका है।
यह सही है कि कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार है, और फिर भी वहां उसे एमएलसी चुनाव में जीत नहीं मिली। लेकिन भाजपा ने जो सीटें हारी हैं, वो कांग्रेस और इंडिया ब्लॉक के लिए बड़ी जीत है। कांग्रेस कर्नाटक में हारी, मगर राष्ट्रीय स्वयंसेवक का मुख्यालय, देवेन्द्र फड़नवीस और नितिन गडकरी का गृहनगर नागपुर उसके खाते में आया है। नागपुर स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में कांग्रेस उम्मीदवार अभिजीत वंजारी ने लगातार दूसरी बार जीत दर्ज की है। उन्होंने 2020 में पहली बार यह सीट जीती थी और अब 2026 में भी इसे अपने पास बनाए रखा है। बकौल संजय राउत कांग्रेस की यह एक सीट बीजेपी के लिए सौ सीटों के बराबर है। पुणे और औरंगाबाद की स्नातक सीटों पर शरद पवार की एनसीपी ने जीत दर्ज की है। यानी तीन सीटों पर महाविकास अगाड़ी जीती है।
भाजपा के लिए एक बड़ा झटका नरेन्द्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी से भी आया है। यहां के शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र और स्नातक निर्वाचन क्षेत्र दोनों में सपा की जीत हुई है। लखनऊ भी भाजपा हार चुकी है। उप्र की 11 सीटों में भाजपा के खाते में छह और सपा के खाते में पांच सीटें आई हैं। वहीं बिहार की आठ सीटों में तीन पर भाजपा, एक पर जदयू, राजद और जनसुराज को एक-एक और निर्दलीयों को 2 सीटें मिली हैं। राजद के लिए यह जीत इसलिए बड़ी है क्योंकि नितिन नबीन के पटना क्षेत्र पर उसने भाजपा को मात दी है।
इस तरह देखें तो प्रधानमंत्री, रक्षा मंत्री, भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष और एक मुख्यमंत्री के क्षेत्र में विपक्ष ने जीत हासिल की है। फिर भी प्रधानमंत्री अगर यह बता रहे हैं कि बैलेट पेपर यानी मतपत्रों से चुनाव में भी जीत भाजपा की हुई है, तो फिर उन्हें अविलंब देश में ईवीएम की जगह मतपत्रों का इस्तेमाल शुरु करने की पहल करना चाहिए या फिर एक लोकतांत्रिक देश के प्रधानमंत्री की गरिमा को बनाए रखने के लिए ऐसे हर चुनाव में जो मन में आए, वो हांकने से बचना चाहिए।
जैसा कि पहले जिक्र किया गया, विधानसभा और विधानपरिषद के चुनावों में, एमएलए और एमएलसी की जिम्मेदारियों और अधिकारों में काफी फर्क होता है। विधान परिषद् विधानसभा का उच्च और स्थायी सदन है। यानी यह कभी भंग नहीं होता। विधान परिषद की लगभग एक-तिहाई सीटों पर स्थानीय निकायों के प्रतिनिधि मतदान करते हैं। इनमें नगर निगम, नगरपालिका और जिला स्तर के संबंधित स्थानीय निकायों के निर्वाचित प्रतिनिधि शामिल होते हैं। आम जनता की जगह निर्धारित निर्वाचक मंडल के सदस्य मतदान करते हैं। वहीं विधान परिषद की लगभग एक-बारहवीं सीटें स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों के लिए होती हैं और लगभग इतनी ही सीटें शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों के लिए निर्धारित हैं। इसके अलावा विधान परिषद की लगभग एक-तिहाई सीटों पर राज्य के विधायक मतदान करते हैं। विधानसभा के सदस्य एमएलसी उम्मीदवारों को अपनी प्राथमिकता के क्रम में वोट देते हैं। और फिर विधान परिषद के बाकी सदस्यों को राज्यपाल मनोनीत करते हैं। संविधान के अनुसार, ऐसे लोगों को साहित्य, विज्ञान, कला, सहकारिता आंदोलन और समाज सेवा जैसे क्षेत्रों में विशेष ज्ञान या व्यावहारिक अनुभव होना चाहिए।
जैसे उत्तरप्रदेश विधानपरिषद में कुल सौ सदस्यों की जगह है, तो सारे विधायक 38 सदस्यों को चुनते हैं, स्थानीय निकायों द्वारा चुने गए सदस्य 36 होते हैं, स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों से 8 सदस्य, शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों से 8 सदस्य और राज्यपाल द्वारा मनोनीत सदस्य 10 होते हैं।
स्नातक या ग्रेजुएट एमएलसी चुनाव, विधान परिषद की उन सीटों के लिए होता है जिनमें पात्र और पंजीकृत स्नातक मतदाता अपने प्रतिनिधि को चुनते हैं। इस चुनाव में मतदान करने के लिए व्यक्ति के पास किसी मान्य विश्वविद्यालय की स्नातक डिग्री या नियमों के तहत मान्य समकक्ष योग्यता होनी चाहिए। संबंधित मतदाता सूची की निर्धारित तारीख से कम-से-कम तीन साल पहले स्नातक की डिग्री प्राप्त की होनी चाहिए। साथ ही व्यक्ति सामान्य रूप से उसी स्नातक निर्वाचन क्षेत्र का निवासी होना चाहिए। और संबंधित निर्वाचन क्षेत्र की मतदाता सूची में नाम दर्ज होना जरूरी है। वहीं शिक्षक एमएलसी चुनाव, विधान परिषद की उन सीटों के लिए होता है जिनमें निर्धारित शैक्षणिक संस्थानों में पढ़ाने का जरूरी अनुभव रखने वाले और मतदाता सूची में पंजीकृत शिक्षक मतदान करते हैं। इसका उद्देश्य शिक्षकों को विधान परिषद में अपना प्रतिनिधि चुनने का अवसर देना है। इस चुनाव में वोट डालने के लिए मतदाता को निर्धारित तारीख से पहले के छह वर्षों के दौरान कुल कम-से-कम तीन साल तक पात्र शैक्षणिक संस्थानों में पढ़ाने की योग्यता होनी चाहिए। इसके अलावा व्यक्ति सामान्य रूप से उसी शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र का निवासी होना चाहिए और संबंधित शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र की मतदाता सूची में नाम दर्ज होना जरूरी है।
ये सारे प्रावधान काफी विचार-विमर्श के बाद तय किए गए थे ताकि राजनीति में हर वर्ग का आनुपातिक प्रतिनिधित्व रहे। दलगत राजनीति ही पूरी तरह हावी न हो और संवैधानिक व्यवस्थाएं निर्बाध चलती रहें। लेकिन प्रधानमंत्री मोदी इस बुनियादी बात को भी नजरंदाज कर रहे हैं।