अब्दुल अल सैयद से बंधी उम्मीद
अमेरिका के मध्यावधि चुनावों में रिपब्लिकन पार्टी की हार और डोनाल्ड ट्रंप के खत्म होते दबदबे के अलावा सबसे ज्यादा चर्चा हो रही है मिशिगन से सीनेट के लिए जीतने वाले अब्दुल अल-सैयद की। पेशे से डॉक्टर अब्दुल अल-सैयद अमेरिका के पहले मुस्लिम सीनेटर बन गए हैं;
अमेरिका के मध्यावधि चुनावों में रिपब्लिकन पार्टी की हार और डोनाल्ड ट्रंप के खत्म होते दबदबे के अलावा सबसे ज्यादा चर्चा हो रही है मिशिगन से सीनेट के लिए जीतने वाले अब्दुल अल-सैयद की। पेशे से डॉक्टर अब्दुल अल-सैयद अमेरिका के पहले मुस्लिम सीनेटर बन गए हैं। उनकी जड़ें मिस्र से हैं, जबकि उनकी पत्नी डॉ. सारा जुकाकू का संबंध कर्नाटक के तटीय क्षेत्र भटकल से है। इसलिए अब्दुल भी खुद को भारतीयों के नजदीक समझते हैं। अब्दुल अल सैयद ने जिन मुद्दों और मूल्यों पर जीत हासिल की है और उन्हें हराने के लिए जिस तरह की कोशिशें की गईं, उन का खास विश्लेषण करने की जरूरत है। क्योंकि आज भारत समेत तमाम दुनिया की राजनीति में जिस तरह कट्टरपंथ, पूर्वाग्रहों और स्वार्थों को महिमामंडित कर सत्ता का रास्ता तैयार किया जाता है, उसमें अब्दुल की जीत उम्मीद बंधाती है कि जनता अब भी अच्छाई को अधिक तवज्जो देती है।
गौरतलब है कि अमेरिकन इजरायल पब्लिक अफेयर्स कमिटी (एआईपीएसी) ने डेमोक्रेटिक पार्टी के प्राइमरी चुनाव में उन्हें हराने के लिए तीन करोड़ डॉलर से ज़्यादा ख़र्च किए थे। इसके अलावा, आम चुनाव में उनके मुकाबले में खड़े रिपब्लिकन माइक रोज़र्स के समर्थन में भी क़रीब 90 लाख डॉलर खर्च किए जाने की ख़बरें थीं। चुनाव प्रचार के डोनाल्ड ट्रंप ने उन्हें 'जिहादी' कहा था और साथ ही यह भी कहा था कि अगर वो सीनेट में दाखिल होंगे तो मेटल डिटेक्टर की जांच से गुजरना होगा। लेकिन अब्दुल अल सैयद ने इसका सटीक जवाब हंसते-हंसते दे दिया। उन्होंने ट्रंप के लिए कहा कि अब आपको मेरा नाम लेने में तकलीफ नहीं होगी, आप मुझे सीनेटर कह सकते हैं। वहीं मेटल डिटेक्टर वाली बात पर उन्होंने कहा कि मुझे इसमें कोई आपत्ति नहीं है, बशर्ते आप भी लाइ डिटेक्टर यानी झूठ पकड़ने वाली मशीन को खुद पर आजमाने दें। क्योंकि एपस्टीन और 2020 का चुनाव जीतने जैसे कई सवालों पर आपसे जवाब चाहिए। अब्दुल अल सैयद के ऐसे जवाबों को जनता ने खूब पसंद किया।
उन्होंने यह भी कहा कि जो मां-बाप इस बात से परेशान थे कि वे अपने बच्चों को कैसे समझाएं कि उनके राष्ट्रपति ने एक उम्मीदवार के लिए गलत बातें क्यों कहीं, तो अब वे उन्हें कह सकते हैं कि बुराई की हार हुई है। ऐसे कई और उदाहरण अब सामने आ रहे हैं जिसमें अब्दुल अल सैयद अपने ऊपर हुए निजी हमलों के जवाब में संतुलित और सधे जवाब अविचलित दे रहे हैं, जिनमें समाज के लिए व्यापक संदेश छिपे हैं। जैसे एक पत्रकार ने उनसे मुस्लिम ब्रदरहुड पर सवाल किया कि क्या वे उसे खारिज करेंगे। जानकारी के लिए बता दें कि 1928 में मिस्र में मुस्लिम ब्रदहहुड नाम का संगठन खड़ा किया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य समाज में शरिया (इस्लामी कानून), कुरान और हदीस के सिद्धांतों को लागू करना और पश्चिमी/धर्मनिरपेक्ष प्रभावों का मुकाबला करना था। लेकिन जल्द ही यह राजनैतिक तौर पर प्रभावशाली बन गया, बहुत सी हिंसक घटनाओं में इसकी संलिप्तता देखी गई, जिसके बाद कई देशों ने इसे 'आतंकवादी संगठन' घोषित किया। अब्दुल अल सैयद के खिलाफ ट्रंप और रिपब्लिकन उम्मीदवार माइक रोज़र्स समेत कई विरोधियों ने मुस्लिम ब्रदरहुड से संबंध होने के आरोप प्रचार के दौरान लगाए थे, हालांकि इसके कोई सबूत वे पेश नहीं कर पाए। ऐसे में जब पत्रकार ने उनसे इस बारे में सवाल किया तो पलट कर उन्होंने कहा कि आप ऐसे सवाल और किस-किस से कर चुके हैं, क्या आप मुस्लिम ब्रदरहुड को खारिज नहीं करते या आप मुझसे ये सवाल क्यों करते हैं। मैं अमेरिका के संविधान में यकीन रखता हूं और मुस्लिम ब्रदरहुड को खारिज करता हूं। लेकिन आपने खासतौर पर मुझसे ये सवाल किया यह इस बात का संकेत है कि मुस्लिम होने के कारण उनकी दोहरी निष्ठा का मुद्दा खड़ा किया जा रहा है। अब्दुल अल सैयद ने जॉन एफ कैनेडी के 1960 के ऐतिहासिक भाषण का हवाला देते हुए कहा कि उनकी मुख्य निष्ठा किसी धार्मिक समूह से नहीं, बल्कि अमेरिकी संविधान और धार्मिक स्वतंत्रता के सिद्धांतों से है। वे अमेरिकी राष्ट्रपति बने और संयोग है कि वे कैथोलिक हैं। इसी तरह मैं सीनेटर बना और संयोग है कि मैं मुस्लिम हूं।
अब्दुल अल सैयद ने जिस पूर्वाग्रह ग्रसित सवाल का सामना किया, भारत के मुसलमानों को भी बारम्बार ऐसे ही पूर्वाग्रहों से जूझना पड़ता है। उनसे देशभक्ति के सबूत मांगे जाते हैं। पाकिस्तानपरस्ती के आरोप लगातार लगते हैं। चक दे इंडिया जैसी पूरी पिक्चर ही इस पर बन गई। वैसे अब्दुल अल सैयद का जवाब राहुल गांधी के अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में दिए गए जवाब से काफी मेल खाता है। तब एक छात्रा ने उनसे पूछा था कि क्या कोई मुस्लिम देश का प्रधानमंत्री बन सकता है, तो राहुल का जवाब था कि नेतृत्व और प्रधानमंत्री का पद किसी धर्म से तय नहीं होता, बल्कि काम करने की क्षमता से तय होता है। उन्होंने डा. मनमोहन सिंह का उदाहरण दिया था, जो उनके धर्म की वजह से नहीं बल्कि उनकी योग्यता के कारण उस पद पर पहुंचे हैं।
बहरहाल, अब्दुल अल सैयद के ऐसे कई जवाब इस समय सोशल मीडिया पर धूम मचा रहे हैं। पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने भी उनके लिए प्रचार किया था, लेकिन कुछ मुद्दों पर उनके मतभेद भी हैं। इसे लेकर भी जब अब्दुल से सवाल हुआ तो उन्होंने कहा कि आप अपने पिता से प्यार करते हैं, लेकिन यह जरूरी नहीं कि आप उनकी हर बात से सहमत हों। विचारों में मतभेद हो सकता है, इससे उनके लिए आदर या प्रेम में कमी नहीं हो सकती। जिस तरह न्यूयार्क के मेयर जोहरान ममदानी के उदार और समावेशी रवैये को अमेरिकी जनता ने पसंद किया, वही लोकप्रियता अब अब्दुल अल सैयद को मिल रही है।
जब 2007 में मिशिगन विश्वविद्यालय से उन्होंने स्नातक किया तो दीक्षांत समारोह के भाषण में उन्होंने असमानता और नस्लीय भेदभाव के खिलाफ बातें की थी, बिल क्लिंटन की मौजूदगी में उन्होंने भाषण दिया था। जिससे प्रभावित होकर क्लिंटन ने कहा था कि दुनिया का हर वह व्यक्ति, जो यह मानता है कि सभ्यताओं के बीच टकराव होना तय है और धार्मिक विभाजनों को पार नहीं किया जा सकता, आज आपकी बातें सुनें यह मेरी इच्छा है। क्लिंटन की दो दशक पुरानी कही बात आज चरितार्थ हो रही है। वैसे मिशिगन के बाद रोड्स स्कॉलर के रूप में ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से सार्वजनिक स्वास्थ्य में डॉक्टरेट और फिर कोलंबिया विश्वविद्यालय से मेडिकल की डिग्री अब्दुल अल सैयद ने हासिल की। अब उनकी शैक्षणिक और राजनैतिक दोनों योग्यताओं का लाभ अमेरिकी जनता को मिलेगा।
अब्दुल अल सैयद के मुस्लिम होने पर जीतने को भारत में असद्दुदीन ओवैसी भी मुद्दा बना रहे हैं। लेकिन तथ्य यह है कि मिशिगन में महज 2-3 प्रतिशत मुस्लिम मतदाता हैं, लोगों ने उन्हें सामाजिक और लोककल्याणकारी विचारों के कारण जिताया है।