राहुल जेन ज़ी के सबसे करीब
जब से नरेन्द्र मोदी ने प्रधानमंत्री का पद सम्हाला है (2014), तभी से वे देश की युवाशक्ति को लाभांश यानी डिवडेंड कहते रहे हैं।;
जब से नरेन्द्र मोदी ने प्रधानमंत्री का पद सम्हाला है (2014), तभी से वे देश की युवाशक्ति को लाभांश यानी डिवडेंड कहते रहे हैं। इसके चलते युवा और छात्र-छात्राएं स्वाभाविक रूप से उनके मुरीद होते गये। उनके तीन बार प्रधानमंत्री बनने के पीछे का एक बड़ा कारण यह भी है कि इस विशाल वर्ग को उन्होंने भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारधारा से जोड़ा। नयी पौध को लगा था कि भाजपा सरकार उनकी शिक्षा, रोजगार और उद्यमियता के नये अवसर खोलेगी। हर साल दो करोड़ लोगों को रोजगार, नये विश्वविद्यालय, स्टार्टअप, मेक इन इंडिया जैसे लुभावने नारे देकर कुछ समय तो मोदी उन्हें रिझाने में कामयाब रहे पर देश में पिछले पांच दशकों के दौरान की सबसे बड़ी बेरोजगारी, बंद होते स्कूल, बदहाल विश्वविद्यालय, लीक होती परीक्षाओं जैसे कारणों से छात्र और युवा वर्ग इस कदर निराश है कि पिछले कुछ समय से देश के ज्यादातर राज्यों में छात्र और युवा सड़कों पर हैं। वे बेहतर शिक्षा व्यवस्था तथा रोजगार की मांग कर रहे हैं।
वैसे तो लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने बेरोजगारी के मुद्दे पर देश की बिगड़ती हालत की तरफ़ लोगों का ध्यान काफी पहले ही खींचा था, जब उन्होंने सितम्बर 2022 में भारत जोड़ो यात्रा निकाली थी।
कन्याकुमारी (तमिलनाडु) से लेकर कश्मीर के श्रीनगर तक उनकी पैदल यात्रा वैसे तो भाजपा-संघ द्वारा फैलाई जा रही नफ़रत के खिलाफ़ थी, परन्तु उस दौरान अपने संवाद के जरिये वे देश की केवल सामाजिक और राजनीतिक ही नहीं बल्कि आर्थिक परिस्थितियों को लेकर भी लोगों को आगाह करते रहे। उन्होंने बताया था कि मोदी सरकार की गलत नीतियों और निर्णयों, खासकर नोटबन्दी, जीएसटी आदि के कारण बंद होते व्यवसायों एवं उद्योगों से फैली आर्थिक मंदी से बेरोजगारी की विकट स्थिति बनी है। इसके पहले कोविड-19 के समय ही उन्होंने चेतावनी दी थी कि 'देश में बड़ी आर्थिक सुनामी आने वाली है जिससे बेरोजगारी फैलेगी।' उनकी बात का भाजपा और उसके समर्थकों ने मज़ाक उड़ाया था पर उनकी आशंका सही साबित हुई थी।
भारत जोड़ो यात्रा ने राहुल की छवि को व्यापक रूप से सुधारा था। इसके बाद उनकी दूसरी यात्रा (पूर्व से पश्चिम) से पूरा देश उन्हें गम्भीरता से सुनने लगा। देश उस नरेटिव से बाहर निकलने लगा, जो भाजपा-संघ पोषित आईटी सेल और साम्प्रदायिक व जातिवादी समर्थकों ने मिलकर गढ़ा था। 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की सदस्य संख्या लगभग दोगुनी हो गयी तथा मोदी एवं भाजपा के सहयोगी दलों से मिलकर बना एनडीए उस 400 के पार नहीं जा पाया, जिसका दावा बढ़ा-चढ़ाकर हो रहा था। भाजपा की सरकार तो बनी पर 240 के अंकों के साथ; वह भी दो दलों की बैसाखियों के बूते।
इसके बाद राहुल और कांग्रेस के तेवर संसद के भीतर-बाहर कुछ ऐसे आक्रामक रहे कि मोदी सरकार को अक्सर बैकफुट पर जाना पड़ा। इसका कारण है कि वे मोदी सरकार की खामियों को बेखौफ़ गिनाते रहे- फिर चाहे वह भाजपा-संघ का साम्प्रदायिकता का एजेंडा हो या सरकार के सबसे करीबी गौतम अडाणी व मुकेश अंबानी को मिलता संरक्षण। आर्थिक बदहाली के उनके उठाये मुद्दों का सीधा सम्बन्ध बेरोजगारी से रहा। इस स्टैंड से देश के छात्रों एवं युवाओं में राहुल के लिये खास जगह बनी। इस बीच हुए कई विधानसभा चुनाव हारने के बावजूद उनका हौसला नहीं टूटा और वे शिक्षित युवाओं, किसानों, मजदूरों, आदिवासियों, महिलाओं समेत सभी वर्गों की रोजी-रोटी के सवाल उठाते रहे। यहां तक कि उनकी जातिगत जनगणना की मांग का भी सीधा नाता ओबीसी वर्गों के लिये नौकरियों से था जिसे अंतत: केन्द्र सरकार को माननी पड़ी।
मई के पहले हफ्ते में जब नीट का पेपर लीक हुआ तो उसे लेकर सबसे पहले कांग्रेस ने ही विभिन्न राज्यों में आंदोलन चलाये। जून में जब इस मामले में कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) की एंट्री हुई तो यह मुद्दा अधिक गरमा गया। कहने को तो तत्कालीन केन्द्रीय शिक्षा मंत्री मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान से इस्तीफा ले लिया गया पर वहां राहुल की नैतिक उपस्थिति इस कदर हावी थी कि सीजेपी के आंदोलन के समर्थन में भूख हड़ताल करने वाले पर्यावरणवादी कार्यकर्ता सोनम वांगचुक एवं उनकी पत्नी गीतांजलि को मलाल रहा कि राहुल गांधी उनका उपवास तुड़वाने नहीं आये। आंदोलन चाहे सीजेपी का रहा हो परन्तु उसमें शामिल व सक्रिय नेहा बोरा समेत वामपंथी छात्र संगठनों के नेता मिलने के लिये राहुल गांधी के पास जाते हैं और उनके साथ मंच शेयर करते हैं। इतना ही नहीं पैलेट गन से घायल युवक को भी राहुल ने मीडिया के समक्ष पेश किया।
लोकसभा में राहुल तथा राज्यसभा में कांग्रेसाध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे छात्रों पर होने वाली बर्बर पुलिसिया कार्रवाई के लिये गृह मंत्री अमित शाह से इस मुखरता से इस्तीफा मांग रहे हैं कि वर्तमान में जारी संसद के मानसून सत्र की बैठकों में वे शामिल ही नहीं हो रहे हैं। इधर राहुल छात्रों के साथ विभिन्न शहरों में छात्रों की गूंज नाम से सभाएं ले रहे हैं जिनमें छात्र और युवा बड़ी तादाद में शामिल हो रहे हैं। शनिवार को उनके परिवार के शहर प्रयागराज में राहुल की सभा ने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिये जिससे पूरी भाजपा बौखलाई हुई है। अनुमान है कि 2029 के चुनाव तक कुल वोटरों की संख्या का 50 प्रतिशत से अधिक जेन ज़ी का होगा। स्वाभाविक है कि भाजपा इसे लेकर परेशान है क्योंकि युवा व छात्र बड़ा उलटफेर कर सकते हैं।
मामले को संगीन होता देख अब खुद मोदी युवाओं से जुड़ रहे हैं। प्रधान के इस्तीफे के बाद वे गाहे-बगाहे और रात-बे-रात रीलें बनाकर बतला रहे हैं कि सरकार छात्रों व युवाओं के प्रति संवेदनशील है तथा उनकी खुशहाली के लिये कई कदम उठा रही है। इसी कड़ी में पीएम ने शनिवार को आईआईटी दिल्ली के दीक्षांत समारोह में शिरकत कर युवाओं के भविष्य की बात की। अब तो संघप्रमुख मोहन भागवत भी जेन जी के साथ 100 शहरों में संवाद का ऐलान कर चुके हैं परन्तु इस मोर्चे पर वे पिछड़ते दिख रहे हैं क्योंकि जेन जी जान चुका है कि देश में फैली व्यापक बेरोजगारी तथा बदहाल शिक्षा व्यवस्था के लिये ये लोग ही दोषी हैं- मोदी व उनकी सरकार की नीतियां तथा आरआरएस, जिसके नफ़रती दृष्टिकोण ने देश को अवनति की राह पर ढकेल दिया है। जेन जी के सबसे करीब निर्विवाद रूप से आज राहुल ही हैं।