सवाल पूछो तो थप्पड़, यही है भाजपा राज
भाजपा में सत्ता का अहंकार इस कदर बढ़ चुका है कि अब वो जनता को नागरिक नहीं अपनी प्रजा की तरह देखने लगी है;
भाजपा में सत्ता का अहंकार इस कदर बढ़ चुका है कि अब वो जनता को नागरिक नहीं अपनी प्रजा की तरह देखने लगी है, बल्कि प्रजा भी नहीं गुलाम मानने लगी है। गुलामों को अपने मालिकों, शासकों के रहमोकरम पर रहना पड़ता है। जो मिल जाए, उसके लिए उन्हें धन्यवाद देना पड़ता है। जो न मिले, उस पर सवाल करने का कोई हक उन्हें नहीं होता। भारत के लोकतंत्र को मोदी शासनकाल में राजशाही में इसी तरह तब्दील किया जा रहा है। इसलिए जब मोदी या भाजपा का कोई भी सत्ताधारी छोटी-मोटी परियोजना का भी शिलान्यास करे, तो उसे बड़ी सौगात कहा जाता है। लेकिन जब इन परियोजनाओं में खामी निकले और लोग सवाल करें तो जवाब की जगह उन्हें थप्पड़ मिलता है। राजशाही में तो फिर भी राजा प्रजा को कोई सौगात दे तो वह अपने राजकोष से ही खर्च करता है। लेकिन इस समय विडंबना यह है कि जनता से लिए टैक्स के पैसे से ही देश में सारे काम होते हैं, मगर जनता से यह हक छीन लिया गया है कि वह पलट कर इन पैसों का हिसाब मांग सके या कम से कम खराब काम होने की शिकायत ही कर पाए। दिल्ली में भाजपा सरकार में उपमुख्यमंत्री प्रवेश वर्मा ने घटिया सड़क निर्माण पर सवाल उठाने वाले एक व्यक्ति को थप्पड़ मारकर यही दिखाया है कि मोदी शासनकाल में भारत में लोकतंत्र नहीं राजशाही और काफी हद तक तानाशाही बनाई जा रही है।
पाठक जानते हैं कि रविवार शाम दिल्ली के तिलक नगर इलाके में आम आदमी पार्टी के विधायक जनरैल सिंह लोक निर्माण विभाग के मंत्री और उपमुख्यमंत्री प्रवेश वर्मा को उखड़ी हुई सड़क दिखा रहे थे। इसी दौरान वहां मौजूद एक युवक ने कुछ बयान दिया, जिस पर प्रवेश वर्मा भड़क गए और उन्होंने उस युवक को थप्पड़ ही मार दिया। इस पर आम आदमी पार्टी, कांग्रेस समेत सोशल मीडिया पर बहुत से लोगों ने सवाल उठाए, तो जवाब में प्रवेश वर्मा ने कहा कि उस युवक ने उनके पिता व परिवार के बारे में कोई गलत टिप्पणी की, जिस पर वो आपा खो बैठे। कितनी आसानी से एक निर्वाचित जनप्रतिनिधि ने नागरिक के साथ हिंसा करने वाले अपराध को न्यायोचित ठहरा दिया। हालांकि जिस तरह चुनाव चोरी करके भाजपा पर कई राज्यों में सरकार बनाने के आरोप लगे हैं, उसके बाद सवाल उठता है कि क्या प्रवेश वर्मा को निर्वाचित जनप्रतिनिधि कहना सही होगा। क्योंकि जिन्हें अपने पद की गंभीरता और जिम्मेदारी का बोध रहता है वे इस तरह गैरजिम्मेदाराना आचरण नहीं करते। लोकतंत्र में तो नेताओं के मन में हमेशा यह भाव रहता है कि जनता को शिकायत का मौका न दिया जाए, क्योंकि चुनाव में वोट मांगने जनता के पास ही जाना होगा। राजनीति में कई बार इस तथ्य को रेखांकित भी किया जाता है कि नेता चुनाव के वक्त तो जनता को माई-बाप बनाते हैं, लेकिन जीतते ही उनकी सुध लेना भूल जाते हैं। उन पर कुर्सी का अहंकार चढ़ जाता है। लेकिन भाजपा तो इस अहंकार से कहीं ज्यादा आगे निकल चुकी है। शायद चुनाव भी उसके लिए औपचारिकता या लोकतंत्र का दिखावा ही है, क्योंकि उसे इस बात का कोई डर नहीं है कि जनता अपने वोटों से कहीं उसके नेताओं को खारिज न कर दे। राहुल गांधी ने अपनी हालिया प्रेस कांफ्रेंस में यही तथ्य तो सबसे पहले उजागर किया था कि भाजपा को एंटी इनकमबेंसी का कोई डर नहीं है, क्योंकि चुनाव आयोग में बैठे लोगों के जरिए उसने पूरी व्यवस्था बना ली है कि जीत उसके खाते में ही जाए। नरेन्द्र मोदी और अमित शाह ही जब बार-बार कह चुके हैं कि अगले पचास सालों तक हमारी ही सत्ता रहने वाली है तो फिर भाजपा नेता क्यों जन भावनाओं और अपेक्षाओं की कद्र करेंगे। प्रवेश वर्मा जैसे नेताओं को पता है कि वे किसी को थप्पड़ मारें या अपशब्द कहें उनकी सत्ता पर आंच नहीं आने वाली है।
कायदे से तो इस मामले में अदालत को स्वत: संज्ञान लेकर प्रवेश वर्मा पर कार्रवाई का आदेश देना चाहिए था। लेकिन अब अदालत में शिखर पर बैठे लोग भी निराश कर रहे हैं। वे संविधान के संरक्षक होने के बावजूद भारत के लोगों का निरंतर अनादर और उनके हकों की लूट देख रहे हैं। मीडिया को भी इस लूट का हिस्सा बना लिया गया है। इसलिए अब खबरें चलाई जा रही हैं कि जिस व्यक्ति को प्रवेश वर्मा ने थप्पड़ मारा, उस पर पहले ही एफआईआर दर्ज हैं, वो आम आदमी पार्टी का कार्यकर्ता है आदि आदि। क्या खुद को पत्रकार कहने वाले लोग यह नहीं जानते कि अगर किसी पर पहले किसी मामले में एफआईआर दर्ज है भी तो उस पर कार्रवाई का अधिकार पुलिस और अदालत का है। कोई आरोपी है तो उसे सवाल पूछने से वंचित नहीं किया जा सकता। अगर वो सवाल पूछे और बदले में थप्पड़ खाए तो यह सरासर नाइंसाफी है। ऐसे में थप्पड़ मारने वाले पर ही कार्रवाई होनी चाहिए। इस मामले में कार्रवाई के पात्र प्रवेश वर्मा ही हैं और कोई नहीं। लेकिन अमित शाह की पुलिस ने तो प्रवेश वर्मा के घर के आसपास सुरक्षा घेरा बड़ा कर दिया है ताकि उन पर कोई आंच न आए।
राहुल गांधी ने इस समूचे मामले में सही कहा है कि ये उस सत्ता का चेहरा है जिसे अब वोटर से डर लगना बंद हो गया है। सड़क पर सवाल पूछो- थप्पड़। पेपर लीक पर सवाल पूछो - लाठी। संसद में सवाल पूछो- माइक बंद। ये लोग ऐसा इसलिए करते हैं क्योंकि इन्हें अब ये डर ही नहीं कि चुनाव इन्हें हटा सकता है। वोट चोरी यही ख़रीदती है- सिफ़र् नतीजा नहीं, उसके बाद आने वाला अहंकार भी। जो सरकार जीत को पक्का मान लेती है, उसे आपकी रज़ामंदी नहीं चाहिए- आपकी ख़ामोशी और अंधभक्ति चाहिए।
राहुल की इस पोस्ट पर बड़ी निर्लज्जता से प्रवेश वर्मा ने लिखा कि आप तो रहने ही दो। यानी अब लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष को एक विधायक बताएंगे कि उनका क्या कहना सही है और क्या गलत। बहरहाल, जनता भाजपा नेताओं के सिर पर चढ़े इस अहंकार को देख रही है। फिलहाल चुनाव आयोग और न्यायपालिका अगर भाजपा नेताओं को बचा भी रहें हैं, तब भी यह बचाव ज्यादा वक्त तक कारगर साबित नहीं होगा, यह देश का माहौल बता रहा है।