बद्रीनाथ पर मुरली मनोहर जोशी की चिंता

भाजपा राज में इस कदर बढ़ चुकी है कि अब खुद भाजपा को बनाने वाले नेता ही इस पर चिंता प्रकट कर रहे हैं।;

By :  DB Desk
Update: 2026-09-27 21:10 GMT

धर्म और आस्था के नाम पर नियम-कानूनों को ताक पर रखना, प्रकृति को नुकसान पहुंचाना और आम जनता के जीवन से खिलवाड़ करना, यह विकृति भाजपा राज में इस कदर बढ़ चुकी है कि अब खुद भाजपा को बनाने वाले नेता ही इस पर चिंता प्रकट कर रहे हैं। अभी 19 और 20 सितंबर को उत्तराखंड के बद्रीनाथ के टूरिस्ट अराइवल प्लाजा में दो दिनों के 'देवभूमि सांस्कृतिक महोत्सव' का आयोजन किया गया था। जैसा कि भाजपा में चलन हो चुका है संस्कृति के नाम पर तेज आवाज में गाना-बजाना ही होता है। अभी दो दिन पहले खुद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने दीनदयाल उपाध्याय की जयंती पर भजन क्लबिंग में हिस्सा लिया और बाकायदा ट्वीट किया कि हमारी जेन ज़ी 'भजन क्लबिंग' की ओर बढ़ रही है... यह आध्यात्मिकता और आधुनिकता का एक सुंदर संगम है, जिसमें भजनों की पवित्रता का भी पूरा ध्यान रखा जाता है।

हो सकता है प्रधानमंत्री सामने बैठे थे तो भजनों की पवित्रता का ध्यान रखा गया हो, वर्ना फिल्मी गानों की धुनों पर भजन ही आजकल भक्ति के नाम पर गाए-बजाए जाते हैं। बहरहाल, प्रधानमंत्री का यह ट्वीट बता रहा है कि अभी उन्होंने नयी पीढ़ी से जुड़ने की कोशिशों को छोड़ा नहीं है। हैलो फ्रेंड्स वाला दांव काम नहीं आया तो अब मोदी यह दिखा रहे हैं कि नयी पीढ़ी भाजपा वाले भक्ति मॉडल को अपना रही है, जिसे वो आध्यात्मिकता और आधुनिकता का संगम कह रहे हैं। हालांकि आध्यात्मिकता और आधुनिकता में कभी भी अलगाव नहीं रहा है, दोनों हमेशा साथ चले हैं। लेकिन नरेन्द्र मोदी अलग ही किस्म का दर्शन देश पर थोप रहे हैं, जिसमें भक्ति के नाम पर कट्टरता और कर्मकांड ही दिखाई देते हैं। इसलिए सड़क पर तो छोड़िए अपने घर में भी कोई नमाज पढ़े तो उस पर मामला दर्ज होता है, लेकिन हिंदू त्योहार मनाने के लिए फूहड़ता से निकाले गए जुलूसों पर फूल बरसाए जाते हैं। धर्म के इस दिखावे में धर्म का नुकसान तो हो रहा है, सदियों से धर्म की रक्षा करने वाले तीर्थों को भी नुकसान पहुंच रहा है। बद्रीनाथ में सांस्कृतिक महोत्सव इसी की एक मिसाल है।

इस महोत्सव के दौरान तेज संगीत, डीजे और लोगों के नाचने के वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गए, जिस पर हिमालय प्रेमी और बद्रीनाथ के प्रति श्रद्धा रखने वाले कई लोगों ने कड़ी आपत्ति जताई। यहां तक कि भाजपा के वरिष्ठ नेता और विज्ञान के शिक्षक रहे मुरली मनोहर जोशी ने भी सोशल मीडिया पर इस आयोजन की तीखी आलोचना करते हुए लिखा, 'बद्रीनाथ धाम में संगीत समारोह को छूट दिया जाना न सिर्फ सांस्कृतिक मर्यादाओं का उल्लंघन है बल्कि धाम की पवित्रता पर भी सीधा आघात है। आदि गुरु शंकराचार्य महाराज जी द्वारा इस धाम की स्थापना हिमालयी पर्यावरण में शांतिपूर्ण तरीके से भगवत भजन के लिए की थी। गौर करने वाली है कि इस जगह पर शंख बजाना भी मना है लेकिन हम उसे भूलकर शोर-शराबे वाले संगीत कार्यक्रमों का आयोजन कर भारतीय आध्यात्मिक, सांस्कृतिक, पर्यावरणीय मूल्यों की घोर उपेक्षा तो कर ही रहे हैं, साथ में इतनी ऊंचाई पर हजारों लोगों के नाचने से उनके स्वास्थ्य पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों की भी उपेक्षा कर रहे हैं। यह इस बात का प्रतीक है कि अब देवभूमि को बाजारू संस्कृति के रूप में परिणीत किया जा रहा है।

जोशीजी की चिंता तो वाजिब है, लेकिन अफसोस इस बात का है कि उन्होंने इस चिंता को जताने में काफी देर कर दी। 2014 से वे मोदी शासन में इस तरह के तमाशों को देखते आए हैं, लेकिन न जाने क्या मजबूरी रही कि उन्होंने खुलकर कभी आलोचना नहीं की। अब भी वे चाहते तो सीधे मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को संबोधित कर आलोचना कर सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। हालांकि स्थानीय लोग भी इस आयोजन से खिन्न हैं। यहीं के माणा गांव के पूर्व प्रधान पीताम्बर सिंह मोलफा ने कहा कि हमारा इलाका बहुत ही संवेदनशील है। यहां धार्मिक परंपराओं और स्थानीय लोगों की भावनाओं को समझे बिना कोई भी बड़ा कार्यक्रम करना ठीक नहीं है। उन्होंने याद दिलाया कि चिपको आंदोलन से जुड़े चंडी प्रसाद भट्ट जी जैसे पर्यावरणविदों ने इस क्षेत्र के लिए काफी सुझाव दिए हैं, लेकिन मास्टर प्लान तैयार करते समय उनकी बातों को दरकिनार किया गया। मास्टर प्लान के तहत बड़ी-बड़ी मशीनें दिन-रात शोर कर रही हैं, हेली सेवा से जो शोर होता है, उस पर कोई बात नहीं करता। हालांकि अब प्रशासन कह रहा है कि भविष्य में बद्रीनाथ में ऐसे किसी भी कार्यक्रम पर रोक लगाई गई है। लेकिन उसे जवाब देना चाहिए कि पहले ही यह सब क्यों नहीं रोका गया। प्रदूषण से केवल बद्रीनाथ नहीं केदारनाथ धाम भी ग्रस्त है। यहां आई विनाशकारी बाढ़ ने बता दिया था कि किस तरह जरूरत से ज्यादा भीड़ पहुंचने से सारा इको सिस्टम प्रभावित हो रहा है। केदारनाथ क्षेत्र में स्थानीय लोग लंबे समय से पर्यावरण और बढ़ते पर्यटन के दबाव से जुड़ी समस्याओं की ओर ध्यान दिलाते रहे हैं। धाम के आसपास और यात्रा मार्ग पर साल-दर-साल रिकॉर्ड स्तर पर कचरा बढ़ रहा है, जिसका प्रबंधन नहीं हो पा रहा है। पर्यटक अपने पानी की खाली बोतल, खाने-पीने के पैकेट समेत कई सामान खाई में सीधे नीचे फेंक देते हैं, जिसे इक_ा करना असंभव है। यह इस संवेदनशील हिमालयी क्षेत्र के पर्यावरण के लिए एक गंभीर चेतावनी है। कचरे के बढ़ने के कारण भारी बारिश में हालात और बिगड़ जाते हैं। अभी रुद्रप्रयाग में ही लैंडस्लाइड होने की वजह से चारधाम यात्रा रोकनी पड़ी। बताया जा रहा है कि दोनों तरफ से करीब 4000 के आसपास तीर्थ यात्री फंसे हुए हैं।

इस तरह की खबरों से जाहिर होता है प्रकृति की मार से इंसान बच नहीं सकता। फिर भी सबक नहीं लिया जा रहा है। और यह केवल पहाड़ों की बात नहीं है, मैदानी इलाकों में भी ध्वनि प्रदूषण से हालत बुरी है। अभी उत्तर प्रदेश के बलरामपुर में एक स्कूल के बाहर गणेश विसर्जन के जुलूस के शोर से एक बारह साल की बच्ची की मौत की खबर आई है। कहा जा रहा है कि डीजे के शोर से बच्ची को हार्ट अटैक आया और मौके पर ही उसकी मौत हो गई। इस पूरे मामले का सीसीटीवी वीडियो भी सामने आया है।

सुप्रीम कोर्ट ने ध्वनि प्रदूषण रोकने के लिए निर्देश दिए हैं, लेकिन धर्म के नाम पर उन निर्देशों की अवहेलना हो रही है। ऐसा क्यों हो रहा है, इसका जवाब भाजपा से ही मांगा जाना चाहिए।

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