क्या होगा लोकतंत्र का भविष्य

रिपोर्ट में चुनाव आयोग के अंदर मतदाता सूची के प्रबंधन और उसके डिजिटल सिस्टम को लेकर गंभीर मतभेदों का खुलासा किया गया है।;

By :  DB Desk
Update: 2026-09-23 21:20 GMT

लोकतंत्र को बनाए और बचाए रखने का एकमात्र उपाय है संविधान की बनाई व्यवस्था के मुताबिक निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव। नागरिकों को मताधिकार इसलिए ही दिया गया है, ताकि वे अपनी मर्जी के प्रत्याशी को वोट दें और फिर जिसे बहुमत मिले, वह दल सत्ता पर काबिज हो। लेकिन मोदी सरकार में इस सीधी, स्पष्ट व्यवस्था पर बारम्बार चोट की गई। इस काम में चुनाव आयोग को भी इस्तेमाल में लाने के आरोप विपक्ष ने लगाए। अब अंग्रेजी अखबार द इंडियन एक्सप्रेस की एक खोजी रिपोर्ट से इन आरोपों को और बल मिला है।

रिपोर्ट में चुनाव आयोग के अंदर मतदाता सूची के प्रबंधन और उसके डिजिटल सिस्टम को लेकर गंभीर मतभेदों का खुलासा किया गया है। इस खास खबर के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले करीब 10 महीनों में कई बार चुनावी प्रक्रिया से जुड़े आईटी सिस्टम में बदलाव और मतदाता सूची के नियंत्रण के केंद्रीकरण पर आपत्ति दर्ज की। दोनों चुनाव आयुक्तों ने इस मुद्दे पर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को भी अपनी आपत्तियों से अवगत कराया। उन्होंने कैबिनेट सेक्रेटरी तक अपनी आपत्तियां पहुंचाईं। लेकिन ज्ञानेश कुमार और कैबिनेट सेक्रेटरी ने चुप्पी साध ली। जिसके बाद मजबूरन दो महीने पहले जुलाई में दोनों चुनाव आयुक्तों ने अलग-अलग पत्र लिखकर कैबिनेट सचिव टी.वी. सोमनाथन को भी चुनाव आयोग के प्रशासनिक और आईटी ढांचे में हुए बदलाव की जानकारी दी।

दरअसल चुनाव आयोग ने इस साल 22 जनवरी को ईसीआईनेट नाम का नया डिजिटल प्लेटफॉर्म शुरू किया था। इसके जरिए आयोग के 40 से ज्यादा ऐप और पोर्टल को एक ही तकनीकी ढांचे के अंतर्गत लाया गया। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने इसके लॉन्च के समय कहा था कि यह सिस्टम कानून के अनुरूप बनाया गया है। लेकिन अब खुलासा हुआ है कि राज्यों में मतदाता सूची तैयार करने और उसमें नाम जोड़ने, हटाने या संशोधन करने के लिए कानूनन जिम्मेदार अधिकारियों को कुछ मामलों में इस नए सिस्टम पर अपेक्षित अधिकार नहीं मिल पा रहे थे। दरअसल 1950 का जन प्रतिनिधित्व कानून और रजिस्ट्रेशन ऑफ इलेक्टर्स रूल्स, 1960 के तहत प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र के लिए एक इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर यानी ईआरओ होता है। ईआरओ अमूमन एसडीएम या जिला प्रशासन के समान स्तर का अधिकारी होता है। जिन पर मतदाता सूची तैयार करने, दावों और आपत्तियों की सुनवाई करने तथा किसी नाम को सूची में रखने या हटाने का निर्णय लेने की जिम्मेदारी होती है।

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, पिछले करीब 10 महीनों में कई राज्यों में ऐसी स्थितियां सामने आईं जहां ईआरओ कानूनन फैसला तो ले रहे हैं, लेकिन उसे सॉफ्टवेयर में दर्ज नहीं कर पा रहे थे। यानी वोटर लिस्ट में किसी नाम को जोड़ना, हटाना, पहले लिए गए निर्णय को बदलना या अपील की प्रक्रिया आगे बढ़ाना अब ईआरओ के हाथ में नहीं रहा और नए सिस्टम के कारण इन फैसलों का नियंत्रण दिल्ली स्थित आईटी डिवीजन के स्तर पर केंद्रित हो गया। इसी पर चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू के निर्देश पर तत्कालीन उप चुनाव आयुक्त संजय कुमार ने आईटी महानिदेशक सीमा खन्ना और आयोग के वरिष्ठ अधिकारियों को पत्र लिखा कि ईआरओ, डीईओ और सीईओ के वैधानिक अधिकार उन्हीं अधिकारियों द्वारा इस्तेमाल किए जाने चाहिए और किसी अन्य व्यक्ति या व्यवस्था द्वारा उन्हें सीमित नहीं किया जाना चाहिए। सुखबीर सिंह संधू ने यह भी बताया कि आईटी डिवीजन ने पिछले कुछ महीनों में कई नए मॉड्यूल और पोर्टल विकसित किए हैं, लेकिन इनकी जानकारी आयोग के सभी सदस्यों को नहीं दी गई। इनके अलावा दूसरे चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने भी मुख्य चुनाव आयुक्त, संधू और संजय कुमार को पत्र लिखकर मतदाता सूची के डेटाबेस के 'क्रमिक केंद्रीकरणÓ पर चिंता जताई। जोशी ने सुझाव दिया कि इस पूरे सिस्टम का स्वतंत्र ऑडिट कराया जाए। उन्होंने आईआईटी के किसी बाहरी विशेषज्ञ को शामिल करने का प्रस्ताव रखा ताकि यह प्रमाणित किया जा सके कि मतदाता डेटाबेस में बदलाव करने का अधिकार सिर्फ उन्हीं वैधानिक अधिकारियों के पास हो जिन्हें कानून ने यह अधिकार दिया है।

मतलब एसआईआर और नए आईटी सिस्टम के जरिए मतदाताओं के नाम काटे जाने पर ज्ञानेश कुमार तो बेफिक्र थे, लेकिन अन्य दोनों चुनाव आयुक्त लगातार बिगड़ती व्यवस्था पर चिंता जता रहे थे। इन पर ध्यान देने की जगह उप चुनाव आयुक्त संजय कुमार, जो कि चुनाव आयोग के आईटी डिवीजन के काम की निगरानी कर रहे थे, उन्हें ही वहां से हटा दिया गया। तब दोनों चुनाव आयुक्तों ने अलग-अलग पत्र लिखकर कैबिनेट सचिव टी.वी. सोमनाथन को इस प्रशासनिक बदलाव की जानकारी दी और इसे कानून का 'स्पष्ट उल्लंघन' बताया। यह शायद पहली बार है कि चुनाव आयोग के दो सदस्यों ने पहली बार इस तरह आयोग के अंदर लिए गए किसी प्रशासनिक आदेश को लेकर देश के शीर्ष नौकरशाह को सीधे शिकायत की।

यह सब केवल चुनाव आयोग के भीतर ज्ञानेश कुमार के लिए फैसलों से असहमति के तौर पर नहीं देखा जा सकता। बल्कि अब यह नजर आ रहा है कि चुनाव आयोग के भीतर निष्पक्षता और पारदर्शिता से काम नहीं हो रहा है। विपक्ष ज्ञानेश कुमार पर भाजपा की बी टीम की तरह काम करने का आरोप लगाता रहा है। अब इस खुलासे के बाद नैतिकता के नाते ही सही ज्ञानेश कुमार को तत्काल पद से इस्तीफा दे देना चाहिए। लेकिन ऐसा लग रहा है कि राहुल गांधी के वोट चोरी वाले आरोपों पर जिस तरह उन्होंने हलफनामा पेश करने कहा था, और आरोपों को खारिज किया था, वही रवैया अब भी अपनाया जाएगा। फिलहाल चुनाव आयोग की तरफ से सफाई तो आई है कि किसी भी संस्था में विचार-विमर्श के दौरान अलग-अलग राय और टिप्पणियां होना सामान्य बात है। ... 10 महीनों के दौरान की कुछ खास आंतरिक टिप्पणियों/अवलोकनों को उजागर करना, जबकि बड़ी संख्या में मंजूरियों, फैसलों, निर्देशों और पहलों को नजरअंदाज करना, तस्वीर का केवल एक हिस्सा ही दिखाता है। हाल के महीनों में, आयोग ने देश भर में मतदाता सूची संशोधन के संचालन सहित कई चुनावी सुधार किए हैं। ये सभी फैसले पिछले एक साल में पूरे आयोग के सर्वसम्मत फैसलों का परिणाम हैं।

लेकिन यह स्पष्टीकरण भी आरोपों पर पर्दा ढंकने जैसा ही है। इन पंक्तियों के लिखे जाने तक तो दोनों चुनाव आयुक्तों का अलग स्पष्टीकरण नहीं आया है। देखना होगा कि अब ज्ञानेश कुमार खुद इस्तीफा देते हैं, या भाजपा हमेशा की तरह उनके बचाव में उतरती है या फिर विपक्ष ने अपने हमले जिस तरह तेज किए हैं, उसके बाद क्या अदालत कोई स्वत: संज्ञान इस पर लेती है। चुनाव आयोग, विपक्ष और अदालत का अगला कदम जो भी होगा लोकतंत्र की रक्षा या खात्मा उसी पर निर्भर करेगा।

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