मोदी-शाह इस्तीफा दें, ज्ञानेश कुमार भी हटें

ज्ञानेश कुमार तो जन प्रतिनिधि नहीं हैं, लेकिन नरेन्द्र मोदी और अमित शाह में वाकई हिम्मत है कि वो जनता के बीच जाकर असल वोट हासिल कर जीत सकते हैं तो उन्हें इस्तीफा देने में कोई दिक्कत नहीं होगी।;

By :  DB Desk
Update: 2026-09-24 21:14 GMT

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार में राई-रत्ती भर भी नैतिकता हो, तो उन्हें फौरन अपने-अपने पदों से इस्तीफा दे देना चाहिए। क्योंकि उन पर वोट चोरी के कारण देशद्रोह जैसा गंभीर इल्जाम लगाया गया है। ज्ञानेश कुमार तो जन प्रतिनिधि नहीं हैं, लेकिन नरेन्द्र मोदी और अमित शाह में वाकई हिम्मत है कि वो जनता के बीच जाकर असल वोट हासिल कर जीत सकते हैं तो उन्हें इस्तीफा देने में कोई दिक्कत नहीं होगी। याद दिला दें कि यूपीए सरकार के वक्त 2006 में सोनिया गांधी लाभ के पद विवाद में उलझीं तो उन्होंने फौरन इस्तीफा देकर उपचुनाव में जाना तय किया था। दरअसल सोनिया गांधी रायबरेली से लोकसभा सांसद थीं और साथ ही राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की चेयरपर्सन थीं, जिसे तब कैबिनेट मंत्री की रैंक हासिल थी। विपक्ष यानी तत्कालीन भाजपा ने इसे लाभ का पद बताते हुए सोनिया गांधी पर आरोप लगाए तो अपनी नैतिकता दिखाते हुए उन्होंने दोबारा चुनावी मैदान में उतरना तय किया और जीतीं भी। यह मिसाल यहां देना इसलिए जरूरी है, क्योंकि आज देश के सर्वोच्च पदों पर बैठे दो लोगों पर गंभीर आरोप लगे हैं। नरेन्द्र मोदी और अमित शाह सत्ता पर बने रहने के लिए चुनाव आयोग का इस्तेमाल कर रहे हैं और यहां मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार उनके निर्देशों पर काम कर रहे हैं। यह आरोप एक बार नहीं बार-बार लग रहे हैं।

द इंडियन एक्सप्रेस में बुधवार और गुरुवार को छपी रिपोर्टों में इस बात का अच्छे से खुलासा हुआ है कि किस तरह एसआईआर के जरिए करोड़ों योग्य मतदाताओं का नाम वोटर लिस्ट से हटाया गया। एक बड़ा खुलासा यह भी हुआ है कि 2024 के बाद से नयी पीढ़ी के मतदाता यानी 18 बरस की आयु पूरी कर चुके लोगों को अपना नाम वोटर लिस्ट में दर्ज करवाने में अड़चनें आ रही हैं। यह सब महज तकनीकी गड़बड़ी से नहीं हुआ हो, बल्कि इसके लिए पहले कानून बदला गया, फिर नए नियम बनाए गए, गोपनीयता का हवाला देकर बहुत से फैसलों को बिना स्पष्टीकरण के लागू कर दिया गया। भारत के जिस चुनाव आयोग की निष्पक्ष और मजबूत छवि पूरी दुनिया में मशहूर थी। भारत के लोकतांत्रिक चुनावों की मिसाल अन्य लोकतांत्रिक देशों में दी जाती थी, उसकी साख और गरिमा को मोदी-शाह ने तार-तार कर दिया है। इसलिए एक बार फिर देश में जनता के उठ खड़े होने के हालात बन रहे हैं।

गुरुवार को वोट चोरी के मुद्दे पर दो अहम प्रेस कांफ्रेंसेस हुईं। एक कॉकरोच जनता पार्टी ने की और दूसरी राहुल गांधी ने। राहुल गांधी ने अपनी प्रेसवार्ता में एक अहम मुद्दा एंटी इन्कमबेन्सी का उठाया कि इंदिरा गांधी से लेकर तमाम प्रधानमंत्रियों, मुख्यमंत्रियों को कभी न कभी विरोध में जनादेश मिला है, यानी उन्हें सत्ता से हटने का आदेश जनता ने दिया। लेकिन नरेन्द्र मोदी और अमित शाह कई बार कभी 30 साल तो कभी 50 साल तक भाजपा के एकछत्र राज का दावा कर चुके हैं। जाहिर है इसके पीछे उनका षड्यंत्र यही है कि वोट के अधिकार को कुचल कर अपनी सत्ता बनाए रखो। राहुल गांधी ने बताया कि वोट चोरी से कानून चोरी की जा रही है और फिर संस्था चोरी। यानी संसद में सत्ताधारी चोरी के वोटों से पहुंचे हैं और इसलिए वो जो कानून बना रहे हैं वो सही नहीं कहे जा सकते। राहुल गांधी ने बाकायदा क्रोनोलॉजी समझा दी कि दिसंबर 2023 में जब चुनाव आयुक्त को कानूनी कार्रवाई से बचाने का कानून बनाया गया था, तब से लेकर अब तक कितनी बार उन्होंने चुनावी धांधली और चुनाव आयोग पर कब्जे के सबूतों के साथ प्रेस कांफ्रेंस की और जनता को तथ्यों से परिचित कराया है। राहुल गांधी का कहना है कि जब उन्होंने मतदाता सूची में जबरन गलत नाम जोड़ने और सही नामों को काटने के खेल को उजागर किया, उसके बाद एसआईआर की कवायद चुनाव आयोग ने शुरु कर दी। राहुल गांधी ने साफ कहा कि, प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ज्ञानेश कुमार को बचा रहे हैं। आज जैसी धांधली देश में पहले कभी नहीं हुई। ज्ञानेश कुमार तुरंत इस्तीफा दें। उन्होंने यह भी कहा कि प्रधानमंत्री और गृहमंत्री की साजिश की भी जांच हो। अब ये जांच कौन करेगा ये बड़ा सवाल है।

राहुल गांधी अपनी बातों में जहां पुराने तथ्यों और आरोपों को दोहराते दिखे, और उन्होंने प्रेस कांफ्रेंस में इस बात का खुलकर जवाब नहीं दिया कि क्या कांग्रेस या इंडिया गठबंधन इस मामले में अब आंदोलन छेड़ेगा और इसका स्वरूप क्या होगा। वहीं कॉकरोच जनता पार्टी ने अपने पुराने रवैये को बरकरार रखते हुए मोदी सरकार के सामने तीन स्पष्ट मांगें रखीं और इसके लिए वक्त भी मुकर्रर कर दिया है।

सीजेपी ने ज्ञानेश कुमार पर मतदाताओं के अधिकारों को कमजोर करने का आरोप लगाया और चेतावनी दी कि अगर वह 48 घंटे के भीतर अपने पद से इस्तीफा नहीं देते हैं तो राष्ट्रव्यापी आंदोलन शुरू होगा और दिल्ली में 'जंतर-मंतर 2.0Ó भी किया जाएगा। सीजेपी ने चुनाव आयोग और सरकार के सामने तीन मांगें रखीं हैं-

1. ज्ञानेश कुमार इस्तीफा हो। उनके खिलाफ तुरंत आपराधिक मुकदमा दायर किया जाए। जांच हो कि उन्हें कौन आदेश दे रहा था।

2. आगामी सभी चुनावों पर तुरंत प्रभाव से रोक लगा दी जाए। जनवरी 2024 के वोटर लिस्ट को बहाल किया जाए और एसआईआर को रोका जाए। सुप्रीम कोर्ट एसआईआर से जुड़े सभी फाइलों को अपने कब्जे में ले। यहां सीजेपी ने एक बड़ा संकेत भी दे दिया कि कहीं ऐसा न हो कि कल को चुनाव आयोग के दफ्तर में आग लग जाए और सारी फाइलें नष्ट हो जाएं।

3. 2023 के उस कानून को वापस लिया जाए, जो चुनाव आयुक्तों को कानूनी कार्रवाई से संरक्षण प्रदान करता है और नया कानून बनाया जाए, जिसमें सिविल सोसायटी की भागीदारी हो।

अभिजीत दिपके ने कहा कि जो रिपोर्ट आई है उससे साबित होता है कि मुख्य चुनाव आयुक्त देश का सबसे बड़ा गद्दार है। उनको तुरंत इस्तीफा देना चाहिए। वह लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा है। लोकतंत्र का मतलब था कि जनता सरकार चुनेगी। लेकिन ज्ञानेश कुमार जबसे मुख्य चुनाव आयुक्तबने हैं तब से सरकार तय कर रही है कि कौन वोट करेगा कौन नहीं। ज्ञानेश कुमार हमारे मतदान का अधिकार छीनने वाले कौन होते हैं?

अभिजित दिपके ने एक बड़ा खुलासा किया कि ज्ञानेश कुमार के मुख्य चुनाव आयुक्त बनने के बाद हरियाणा, महाराष्ट्र, दिल्ली, पश्चिम बंगाल, असम में वोट फीसदी में इजाफा हुआ। जबकि मोदी लहर में भी यहां इतने वोट नहीं मिले थे। उन्होंने कहा कि भाजपा नरेंद्र मोदी के चेहरे पर चुनाव नहीं जीत रही है असली हीरो ज्ञानेश कुमार हैं।

तो कुल मिलाकर अब देश में फिर से जनांदोलन खड़ा होने के आसार बन रहे हैं और लोकतंत्र बचाने के लिए यह जरूरी भी है। 

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