जेन अल्फा ने उठानी शुरु की हक की आवाज
देश में जेन ज़ी के बाद अब जेन अल्फा का विरोध-प्रदर्शन और अपने हक के लिए आवाज उठाने का सिलसिला शुरु हो चुका है।;
देश में जेन ज़ी के बाद अब जेन अल्फा का विरोध-प्रदर्शन और अपने हक के लिए आवाज उठाने का सिलसिला शुरु हो चुका है। मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, उत्तराखंड समेत कई राज्यों से तस्वीरें सामने आ रही हैं, जहां खस्ताहाल सरकारी स्कूलों या बुनियादी सुविधाओं की कमी पर बच्चों ने सामने आकर विरोध करना शुरु कर दिया है। गौरतलब है कि 2010 या उसके बाद जन्म लेने वाले बच्चे जनरेशन अल्फा का हिस्सा हैं। ये बच्चे पूरी तरह से इंटरनेट, स्मार्टफोन, सोशल मीडिया और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के आधुनिक दौर में जन्मे हैं, लिहाजा तकनीकी तौर पर अपनी पिछली पीढ़ियों के मुकाबले ये कहीं ज्यादा सक्षम हैं।
भारत में इस पीढ़ी के बच्चों की अनुमानित संख्या 32.7 करोड़ से लेकर 41.7 करोड़ के बीच है। इसका मतलब यह है कि भारत की पूरी आबादी का लगभग 27 प्रतिशत हिस्सा केवल इसी उम्र वर्ग का है। आंकड़े बताते हैं कि 0 से 17 साल की उम्र वाले इन बच्चों की बदौलत भारत लंबे समय तक सबसे युवा आबादी वाला देश बना रहेगा। लेकिन हम खुशहाल, स्वस्थ, शिक्षित युवा देश बनने का गौरव हासिल करेंगे या संघर्षों वाला देश बन कर रह जाएंगे, यह आज का सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक और राजनैतिक माहौल ही तय करेगा।
फिलहाल जिस तरह के हालात सामने आ रहे हैं, उनसे जाहिर है कि बच्चों की शिक्षा, पोषण, उनके सर्वांगीण विकास के पैमानों पर सरकार पूरी तरह नाकाम नजर आ रही है। भारत शिक्षा पर अपनी अर्थव्यवस्था का 4.1प्रतिशत खर्च करता है। यह यूनेस्को के तय न्यूनतम 4प्रतिशत मानक से थोड़ा ज्यादा है। लेकिन सरकार के कुल खर्च में शिक्षा की हिस्सेदारी घटकर 14.2प्रतिशत रह गई है। यूनेस्को के मुताबिक यह हिस्सा कम से कम 15प्रतिशत होना चाहिए। 2015 में सरकार के कुल खर्च का 15.7प्रतिशत शिक्षा पर खर्च होता था। लेकिन 11 साल बाद भी यह खर्च बढ़ा नहीं बल्कि कम ही हुआ है, तो यह दिखाता है कि सरकार शिक्षा को लेकर कितनी लापरवाह है।
उसकी यह लापरवाही सबसे ज्यादा गरीबों और ग्रामीण बच्चों का भविष्य ही खराब कर रही है। मगर अब यह जेन अल्फा अपने हक की आवाज उठा रही है। उत्तर प्रदेश के हमीरपुर जिले में बीते दिनों स्कूली बच्चों ने खराब और दलदल वाली कच्ची सड़क को पक्का करवाने की मांग को लेकर हाथों में तिरंगा लेकर लगभग 5 से 6 किलोमीटर पैदल मार्च किया और जिलाधीश कार्यालय के बाहर विरोध प्रदर्शन किया। जिसके बाद प्रशासन को झुकना पड़ा। इसी तरह मध्यप्रदेश के विदिशा में बस किराया बढ़ने पर छात्राओं ने विधायक मुकेश टंडन से जवाब मांगा कि हर दिन 25 रुपए का किराया कैसे दें। छात्राओं ने कहा कि हमारी बड़ी बहनें जो पढ़ने के लिए विदिशा से रायसेन-भोपाल और कई जगहों पर जाती हैं, उन्हें बहुत अधिक किराया देना पड़ता है। हम पहले जो किराया पांच रुपए देते थे वो 25 रुपए हो गया है।
ध्यान रहे कि हाल ही में विदिशा के ही ककरौआ गांव का मामला सामने आया, जहां बच्चे अपनी पढ़ाई जारी रखने के लिए हर रोज बेतवा नदी पर बने चेक-डैम के करीब 10 कांक्रीट के खंभों को कूदकर पार करते थे और फिर हाईस्कूल जा पाते थे। इस खतरनाक रास्ते के पार करने का वीडियो सामने आया, खबर छपी तो प्रशासन ने तुरंत संज्ञान लिया और महज एक दिन के भीतर गांव के स्कूल को अपग्रेड कर हाई स्कूल का दर्जा दे दिया।
इस मामले से यह भी जाहिर होता है कि जनहित के लिए लिखी और बनाई गईं खबरें आज भी सरकार को एक्शन लेने पर मजबूर कर सकती हैं। हालांकि अब मीडिया की प्राथमिकताएं भी बदल गई हैं। लेकिन सोशल मीडिया पर काफी हद तक सच्चाई सामने आ जाती है। विदिशा जैसा ही मामला उत्तराखंड के चौबट्टाखाल से सामने आया, जहां बच्चे जान जोखिम में डालकर नदी के रास्ते स्कूल जाने को मजबूर हैं, क्योंकि साल भर पहले बारिश में बह गया पुल आज तक नहीं बना। गांव वालों की मांग पर भाजपा सरकार ने अब तक ध्यान नहीं दिया है। खस्ताहाल स्कूलों से बच्चों की जिंदगी पर संकट मंडराने की घटनाएं भी सामने आई हैं। महाराष्ट्र के सोलापुर जिले के बबलाद गांव में जिला परिषद स्कूल में छत का स्लैब गिरने से 13 छात्र घायल हो गए। इस घटना ने पिछले साल राजस्थान के झालावाड़ जिले के पिपलोदी गांव में हुए हादसे की याद दिलाई, जहां सरकारी स्कूल की जर्जर छत गिरने से सात मासूम बच्चों की मौत हो गई थी। हाल ही में उप्र के पीलीभीत के अमृता खास गांव में 'श्रीबालक राम सरस्वती शिशु मंदिर' में क्लास के ऊपर लगी भारी-भरकम टीन की छत भरभरा कर नीचे आ गिरी, जिसमें बारह बच्चे और 2 शिक्षिकाएं दब गईं।
ऐसी घटनाओं के अलावा मध्याह्न भोजन के नाम पर बच्चों को कहीं जले और सूखे चावल तो कहीं रोटी के साथ नमक खिलाने के वीडियो भी सामने आए हैं। मध्याह्न भोजन योजना के पीछे मकसद यही था कि बच्चों को कम से कम एक वक्त पौष्टिक भोजन मिले और वे स्कूल आना न छोड़ें। लेकिन कई सरकारी स्कूलों में बच्चों को याचकों की तरह अपमानित कर भोजन दिया जा रहा है। गांवों के और सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले गरीब बच्चों के साथ यह व्यवहार सभ्य समाज के लिए शर्मिंदगी का सबब होना चाहिए।
बच्चों के अलावा दिव्यांग छात्रों के साथ भी अन्याय की खबरें सामने आई हैं। देहरादून के राष्ट्रीय दृष्टि दिव्यांगजन सशक्तिकरण संस्थान के मॉडल स्कूल में दृष्टिबाधित छात्र एक सप्ताह से आंदोलन कर रहे हैं। छात्रों की मांग है कि पहले मिल रही मेरिट और संस्थागत छात्रवृत्ति को दोबारा शुरू किया जाए, इसके अलावा लैपटॉप उपलब्ध कराने, कैंटीन के खाने की गुणवत्ता सुधारने, प्राथमिक कक्षाओं में ब्रेल शिक्षकों की कमी दूर करने, अंग्रेजी माध्यम के विद्यार्थियों को समय पर किताबें उपलब्ध कराने और स्किल विषयों के लिए पर्याप्त शिक्षकों की नियुक्ति की भी मांग की जा रही है।
उपरोक्त तमाम घटनाएं जाहिर कर रही हैं कि देश में बच्चों का भविष्य कैसे दांव पर लगाया जा रहा है। अच्छी बात यही है कि जेन अल्फा वक्त रहते इंसाफ की मांग करने खड़ी हो चुकी है।