अद्भूत जीवटता की मिसाल आशा भोंसले
फिल्म और संगीत जगत की महान गायिका आशा भोंसले ने 92 साल की उम्र में इस दुनिया को अलविदा कह दिया।
फिल्म और संगीत जगत की महान गायिका आशा भोंसले ने 92 साल की उम्र में इस दुनिया को अलविदा कह दिया। चार साल पहले उनकी बड़ी बहन लता मंगेशकर का भी लगभग इसी उम्र में निधन हुआ था। लता मंगेशकर के जाने पर संगीत की दुनिया में जो खालीपन कायम हुआ था, अब आशा भोंसले के जाने के बाद उसका दायरा कुछ और बढ़ गया है। मराठी और कोंकणी के दिग्गज संगीतकार रहे दीनानाथ मंगेशकर की पांचों संतानें हृदयनाथ मंगेशकर, लता मंगेशकर, उषा मंगेशकर, मीना खाडिलकर और आशा भोंसले सभी में स्वाभाविक तौर पर संगीत का गुण आया, लेकिन लता मंगेशकर और आशा भोंसले ने इस क्षेत्र में अलग ही मुकाम हासिल किया। दोनों बहनों की गायकी में कई बार तुलना की गई, उनमें आपसी प्रतिस्पर्द्धा के किस्से चटखारे लेकर सुने गए, दिखाए गए। लेकिन इन बहनों ने अल्पायु में कैसे अपने परिवार को संभाला और उसके साथ संगीत की दुनिया को अपनी गायकी का अनमोल खजाना दिया, इस बात को कोई भी विवाद हाशिए पर नहीं धकेल पाया। लता मंगेशकर को तो भारत रत्न जैसा सर्वोच्च सम्मान मिला, वे उसकी हकदार थीं भी, आशा भोंसले को भी पद्म विभूषण, दादा साहेब फाल्के सम्मान, नेशनल अवार्ड समेत कई पुरस्कारों और सम्मानों से नवाजा गया। लेकिन यह कड़वा सच अपनी जगह कायम है कि उनकी अद्भुत प्रतिभा के अनुरूप उनकी कद्र नहीं हुई, कहीं कोई कमी हमेशा बनी रही।
अपने पिता की मौत के बाद महज 9 बरस की उम्र में आशा भोंसले ने अपनी बड़ी बहन लता मंगेशकर के साथ घर चलाने के लिए काम करना शुरु कर दिया था। लेकिन 16 साल की उम्र में खुद से दोगुनी उम्र के व्यक्ति के साथ शादी करने पर उन्हें परिवार से दूर रहना पड़ा। इस विवाह से तीन बच्चे हुए, लेकिन फिर यह शादी टूट गई और पहले से संघर्षरत आशा भोंसले की मुश्किलें और ज्यादा बढ़ गईं। लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं छोड़ी। गुज़ारा करने के लिए, उन्होंने ऐसी रिकॉर्डिंग्स के लिए हामी भरी, जिसे दूसरे गायकों ने ठुकरा दिया। 1950 के उस दशक में अच्छे बैनर की फिल्में स्थापित गायकों को मिलती थीं। ऐसे में आशा भोंसले के हिस्से में दूसरे के छोड़े हुए गीत, खलनायिकाओं या नैगेटिव किरदार निभाने वाली अभिनेत्रियों के लिए बनाए गए गीत, जिनमें पाश्चात्य संगीत का पुट होता, वही सब आते। उस दौर का भारतीय समाज ऐसे गानों को सभ्य लोगों के बीच सुनने या गुनगुनाने लायक नहीं मानता था। लिहाजा आशा भोंसले की कोई खास पहचान नहीं बनी, वहीं लता मंगेशकर ऐ मेरे वतन के लोगों जैसे गीत के साथ पूरे भारत के लिए आदरणीय बन चुकी थीं। अपने संघर्षपथ पर आगे बढ़ते हुए आशा भोंसले ने 1948 से 1957 के बीच देश के किसी भी अन्य गायक से ज़्यादा गाने रिकॉर्ड किए, और आखिर में उनके संघर्ष को पहचान मिली फिल्म नया दौर के गीतों से। 1957 की इस फिल्म में संगीतकार ओ.पी. नैयर ने उन्हें मुख्य गीत दिए। पहली बार, वह नायिका की आवाज़ बनीं। 1960 के दशक के मध्य तक, उन्होंने युवा संगीतकार आर.डी. बर्मन के साथ साझेदारी की। और फिर इस जोड़ी ने संगीत और गायकी के कैसे कारनामे करके दिखाए ये भारतीय श्रोता अच्छे से जानते हैं।
1966 में जब आर डी बर्मन ने आशा भोंसले को तीसरी मंजिल के लिए पश्चिमीकृत नृत्य गीत 'आजा आजाÓ गाने दिया, पहले आशा भोंसले ने इसे गाने में असमर्थता दिखाई। जिस पर आर डी बर्मन ने संगीत को फिर से लिखने का प्रस्ताव दिया। लेकिन आशा भोंसले ने इनकार कर दिया, दस दिनों तक अभ्यास किया और उस दशक के सबसे बड़े हिट गानों में से एक दिया। यह पेशेवर साझेदारी 1980 में विवाह में तब्दील हो गई। आर डी बर्मन के रूप में आशा भोंसले को एक बेहतरीन जीवनसाथी मिला, लेकिन 1994 में उनका निधन हो गया, आशा भोंसले के जीवन में फिर खालीपन छा गया। 2012 में उनकी बेटी वर्षा ने 56 वर्ष की आयु में आत्महत्या की। 2015 में उनके बेटे हेमंत का कैंसर से निधन हो गया। ये सारे आघात किसी भी इंसान को भीतर तक तोड़ देते हैं, लेकिन आशा भोंसले मजबूती से खड़ी रहीं, गाती रहीं।
फिल्म उमराव जान के लिए उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला। 1981 में संगीतकार खय्याम ने उन्हें उमराव जान की ग़ज़लों के लिए सामान्य से दो सुर नीचे गाने के लिए कहा। आशा ने इस शर्त को भी बखूबी निभाया और इस धारणा को तोड़ दिया कि वह केवल पॉप संगीत ही कर सकती हैं। 62 वर्ष की आयु में, उन्होंने ए.आर. रहमान के साथ रंगीला का साउंडट्रैक रिकॉर्ड किया। लेकिन उनकी प्रतिभा से अभी दुनिया पूरी तरह परिचित नहीं हुई थी, 79 वर्ष की आयु में, उन्होंने माई फिल्म में बतौर अभिनेत्री भी काम किया। गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स ने उन्हें 2011 में संगीत इतिहास में सबसे अधिक गाने रिकॉर्ड करने वाली कलाकार के रूप में प्रमाणित किया। उन्होंने आठ दशकों में 20 से अधिक भाषाओं में 11,000 से अधिक गाने गाए, और दुनिया का कोई भी अन्य कलाकार उनके करीब नहीं पहुंच पाया है।
वह एक ऐसी हस्ती थीं जिनकी आवाज़ ने न केवल भारत में लोगों के दिलों को छुआ बल्कि दुनिया भर के श्रोताओं को प्रेरित किया। ब्रिटिश रॉक बैंड कॉर्नरशॉप ने 1997 में अपना तीसरा एल्बम, व्हेन आई वाज़ बॉर्न फॉर द सेवंथ टाइम, रिलीज़ किया और इसका एक गाना था ब्रिमफुल ऑफ आशा। क्रोनोस क्वार्टेट ने उनके साथ आर.डी. बर्मन की रचनाओं का एक एल्बम रिकॉर्ड किया और ग्रैमी नामांकन अर्जित किया। वहीं इस साल की शुरुआत में, 92 वर्ष की आयु में, वह ब्रिटिश बैंड गोरिल्लाज़ के एक ट्रैक में दिखाई दीं और उनके साथ एक एलबम में अपनी आवाज दी।
इस तरह देखें तो 9 बरस से गीतों की रिकार्डिंग शुरु करने वाली आशा भोंसले ने 92 तक रिकार्डिंग की, 80-82 साल तक सुरों को सजाना एक ऐसा कमाल है, ऐसी उपलब्धि है, ऐसा मुकाम है, जहां शायद ही कोई दूसरा पहुंच सके।