भर्ती का धंधा
सरकारी भर्तियों में यह सालों की देरी महज़ लाल फीताशाही का हिस्सा नहीं है, बल्कि यह युवाओं के मनोविज्ञान को तोड़ने का एक क्रूर हथियार है।;
- निमिषा सिंह
सरकारी भर्तियों में यह सालों की देरी महज़ लाल फीताशाही का हिस्सा नहीं है, बल्कि यह युवाओं के मनोविज्ञान को तोड़ने का एक क्रूर हथियार है। जब एक 23 साल का ऊर्जावान युवा नौकरी की तैयारी में बैठे-बैठे 27 साल का हो जाता है, तो उसका आत्मविश्वास धीरे-धीरे खत्म होने लगता है। इस प्रक्रिया का अंतिम लक्ष्य यह है कि जब युवा पूरी तरह से थक-हार जाए, तो वह अपने वजूद को बचाने के लिए 4,000 रुपये की ट्यूशन या किसी डिलीवरी-ऐप की 10,000 रुपये की नौकरी को ही अपनी नियति मान ले।
आठ लाख 60 हज़ार युवा, 3,539 पद, लगभग 60 करोड़ रुपये की फॉर्म फीस और 4 साल का अंतहीन इंतज़ार। ये महज़ कुछ संख्याएं नहीं हैं, बल्कि 'उत्तरप्रदेश माध्यमिक शिक्षा सेवा चयन बोर्ड' के नाम पर रचे गए उस चक्रव्यूह का सीधा गणित है, जिसमें आज लाखों परिवार फंसे हुए हैं। जब देश का युवा एक अदद रोज़गार के लिए दर-दर भटक रहा है, तब व्यवस्था ने उसकी उम्मीदों और मजबूरी को ही एक मुनाफे वाले व्यापार में तब्दील कर दिया है। विमर्श भले ही इसे केवल 'सिस्टम की नाकामी' या 'प्रशासनिक देरी' कहकर टाल दे, लेकिन इन आंकड़ों को गहराई से देखने पर एक बहुत ही सोची-समझी और क्रूर अर्थव्यवस्था का चेहरा सामने आता है—एक ऐसी अर्थव्यवस्था जहां बेरोज़गारी कोई समस्या नहीं, बल्कि मुनाफा कमाने का सबसे सुरक्षित ज़रिया है।
बेरोज़गारी और सरकारी भर्तियों में हो रही पीड़ा केवल कुछ आंकड़ों या तथ्यों का दस्तावेज़ नहीं है, बल्कि यह उस दर्द, घुटन और खामोश चीख की कहानी है, जो आज देश के हर उस छोटे से कमरे में गूंज रही है जहां एक युवा अपनी जवानी के सबसे कीमती साल महज़ एक 'वेबसाइट रिफ्रेश' करने में गुज़ार देता है। साल 2022 में उत्तरप्रदेश के युवाओं ने जब फॉर्म भरा था, तो उन्होंने सिर्फ एक कागज़ का टुकड़ा नहीं जमा किया था, बल्कि अपने बूढ़े होते मां-बाप की आखिरी उम्मीदें और अपनी रातों की नींदें गिरवी रखी थीं। आज चार साल बाद, वह इंतज़ार एक ऐसे नासूर में बदल चुका है, जिसका इलाज इस व्यवस्था के पास शायद है ही नहीं।
सरकारी भर्तियों में यह सालों की देरी महज़ लाल फीताशाही का हिस्सा नहीं है, बल्कि यह युवाओं के मनोविज्ञान को तोड़ने का एक क्रूर हथियार है। जब एक 23 साल का ऊर्जावान युवा नौकरी की तैयारी में बैठे-बैठे 27 साल का हो जाता है, तो उसका आत्मविश्वास धीरे-धीरे खत्म होने लगता है। इस प्रक्रिया का अंतिम लक्ष्य यह है कि जब युवा पूरी तरह से थक-हार जाए, तो वह अपने वजूद को बचाने के लिए 4,000 रुपये की ट्यूशन या किसी डिलीवरी-ऐप की 10,000 रुपये की नौकरी को ही अपनी नियति मान ले। एक टूटा हुआ और थका हुआ युवा कभी अपने हकों के लिए सत्ता से तीखे सवाल नहीं पूछता।
बेरोजगारी आज के समय में बिना किसी जोखिम वाला एक ऐसा व्यापार बन गई है, जिसमें व्यवस्था को कोई नुकसान नहीं है। परीक्षा फॉर्म के नाम पर ली जाने वाली फीस असल में युवाओं की उम्मीदों पर लगाया गया 'होप टैक्स' यानि 'उम्मीद का कर' है। उपरोक्त परीक्षा में 8 लाख से ज्यादा युवाओं से औसतन 700 रुपये प्रति फॉर्म के हिसाब से लगभग 60 करोड़ रुपये तो सीधे तौर पर वसूले गए, लेकिन लूट का यह गणित यहीं खत्म नहीं हुआ। इसमें वो खर्चे तो जोड़े ही नहीं गए जो एक बेरोजगार छात्र हर फॉर्म के साथ अपनी जेब से वहन करता है—दस्तावेजों की फोटोकॉपी, साइबर कैफे का चार्ज, फॉर्म भेजने के लिए पोस्टल या स्पीड-पोस्ट के खर्चे और परीक्षा केंद्रों तक दर-दर भटकने का किराया। अगर इन 'छिपे हुए खर्चों' को भी जोड़ लिया जाए, तो छात्रों की जेब से निकला यह आंकड़ा अरबों में पहुंच जाएगा।
जब परीक्षाएं 3 से 4 साल तक टलती हैं, तो फॉर्म के नाम पर जमा इन करोड़ों रुपयों पर सरकारी खजाने या एजेंसियां बैंकों से भारी-भरकम ब्याज खाती हैं। यह दुनिया का शायद इकलौता ऐसा बिज़नेस मॉडल है जहां गरीब ग्राहक (युवा) कज़र् लेकर पैसा पहले देता है, सालों इंतज़ार करता है और बदले में कुछ न मिलने पर वह उपभोक्ता अदालत का दरवाज़ा भी नहीं खटखटा सकता।
बेरोजगारी के मूल कारणों को सुलझाने के बजाय, व्यवस्था अक्सर तात्कालिक 'हेडलाइन मैनेजमेंट' का सहारा लेती है। हालिया बजट में घोषित 'इंटर्नशिप योजना' इसका एक सटीक उदाहरण है। कागज़ों पर दावा किया जाता है कि लाखों युवाओं को देश की टॉप कंपनियों में काम सिखाया जाएगा, लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि इन कंपनियों के पास हर साल लाखों नए युवाओं को काम सिखाने का न तो बुनियादी ढांचा है और न ही संसाधन। ऐसी योजनाएं ज़मीन पर रोज़गार पैदा करने के लिए नहीं, बल्कि केवल 'न्यूज़ साइकिल' को मैनेज करने के लिए बनाई जाती हैं।
जीवन के जिस पड़ाव पर शादी और 'फैमिली प्लानिंग' के बारे में सोचना चाहिए, वहां वह अपनी बेरोज़गारी की ग्लानि तले घुट रहा है। जब एक युवा अपने माता-पिता के बुढ़ापे का सहारा बनने और उनकी दवाइयों का खर्च उठाने के बजाय, 28-30 साल की उम्र में भी उनसे ही पैसे मांगने को मजबूर हो, तो वह किसी नए रिश्ते की ज़िम्मेदारी उठाने की हिम्मत कैसे करेगा? यह क्रूर व्यवस्था केवल युवाओं की नौकरियां ही नहीं छीन रही है, बल्कि पूरी-की-पूरी पीढ़ी को पारिवारिक और सामाजिक रूप से अपाहिज बना रही है।
एक राज्य का बजट यह स्पष्ट कर देता है कि उसकी प्राथमिकताएं क्या हैं। जब प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षकों की भर्तियां सालों तक ठंडे बस्ते में पड़ी रहती हैं, लेकिन पुलिस विभाग में लाखों भर्तियां तेजी से पूरी जाती हैं, तो यह एक गहरी 'कंट्रोल थ्योरी' की ओर इशारा करता है। एक शिक्षक का काम ऐसे नागरिक तैयार करना है जो तर्क करें, सवाल पूछें और अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हों। वहीं, पुलिस बल का उपयोग व्यवस्था को नियंत्रित करने के लिए किया जाता है। जब सालों से इंतज़ार कर रहा हताश युवा सड़कों पर अपने हक़ के लिए उतरता है, तो उसे चुप कराने के लिए विचारों की नहीं, बल्कि लाठियों की आवश्यकता पड़ती है।
यह समय हताश होने का नहीं, बल्कि व्यवस्था की इस ढांचागत राजनीति को समझने का है। युवाओं और समाज को अब यह पूछना बंद करना होगा कि 'परीक्षा कब होगी?' इसके बजाय यह सवाल उठाना चाहिए कि 'फॉर्म फीस के रूप में वसूले गए करोड़ों रुपयों का ब्याज किस फंड में गया?' जिस दिन देश का युवा अपनी उम्मीदों पर लग रहे इस टैक्स और अपनी आवाज़ को दबाने की इस रणनीति को समझ जाएगा, उस दिन यह व्यवस्था उन्हें एक 'कस्टमर' या 'वोटबैंक' समझना बंद कर देगी। ज़रूरत इस बात की है कि अपने भीतर के गुस्से और स्वाभिमान को मरने न दिया जाए और सही दिशा में सही सवाल पूछे जाएं।
(लेखिका व पत्रकार हैं।)