ललित सुरजन की कलम से परिभाषा और आंकड़ों में उलझी गरीबी
'महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी का ही उदाहरण लें।;
'महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी का ही उदाहरण लें। मनरेगा की वर्तमान दरों पर छत्तीसगढ़ में छोटी सी छोटी ग्राम पंचायत वाले ग्राम में भी, मेरा अनुमान है कि दस लाख रुपया प्रतिवर्ष इस खाते में आ रहा है। अगर मनरेगा का क्रियान्वयन सही हो तथा इसे गांव में स्थायी परिसम्पत्तियां निर्मित करने में लगाया जाए तो गांव के हालात तेजी से बदल सकते हैं। अभी जैसे भारतीय रेलवे ने पटरी किनारे के गांवों में मनरेगा से सहयोग लेने का नीतिगत निर्णय लिया है, यह एक स्वागतयोग्य कदम है। लेकिन ऐसा न हो तब भी ग्राम पंचायत के माध्यम से गांवों में पैसा पहुंच रहा है और इससे गांव की तस्वीर कुछ न कुछ तो बदली ही है। अगर गड़बड़ियां हैं तो उनको उजागर करने का साहस भी स्थानीय जनता करने लगी है। तथापि योजना का सुचारु संचालन कैसे हो, इसकी जिम्मेदारी सिर्फ सरकार की न हो, नौकरशाही, चुने हुए पंच-सरपंच तथा गांव के प्रबुध्दजन- उन्हें भी अपने हिस्से की जिम्मेदारी उठाने के लिए तैयार रहना पड़ेगा।'
(देशबन्धु में 01 अगस्त 2013 को प्रकाशित)
https://lalitsurjan.blogspot.com/2013/07/blog-post_31.html