'पीएम केयर्स' फंड का ऑडिट

मार्च 2020 में कोविड-19 संकट के दौरान अपनी सार्वजनिक छवि को बेहतर बनाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद 'पीएम केयर्स' नाम का प्रचार-प्रसार वाला शब्द गढ़ा था सार्वजनिक छवि;

By :  DB Desk
Update: 2026-08-20 21:45 GMT
  • डॉ. ज्ञान पाठक

आलोचनाओं में से एक यह थी कि जो फंड जनता का पैसा स्वीकार करता है- जिसमें पब्लिक सेक्टर की कंपनियों से कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (सीएसआर) योगदान और दूसरों से दान शामिल है - उसे पब्लिक ऑडिट के दायरे से बाहर क्यों रखा जाए, जबकि इस निजी फंड को एक सरकारी संस्था जैसा दिखाया जाता है। आलोचकों का तर्क था कि यह बेईमानी थी।

यह कोई छिपी हुई बात नहीं है कि मार्च 2020 में कोविड-19 संकट के दौरान अपनी सार्वजनिक छवि को बेहतर बनाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद 'पीएम केयर्स' नाम का प्रचार-प्रसार वाला शब्द गढ़ा था, ताकि लोगों को बताया जा सके कि वह लोगों का ध्यान रखते हैं। इस शब्दावली को विस्तारित कर इसका नाम रखा गया 'प्राइम मिनिस्टर्स सिटिजन एसिस्टेंस एंड रिलीफ इन इमरजेंसी सिचुएशन' (आपातकालीन स्थिति में प्रधानमंत्री की नागरिक सहायता और राहत) रखा गया और इसे 27 मार्च 2020 को लॉन्च किया गया, ठीक 24 मार्च 2020 की शाम को लॉकडाउन की घोषणा के बाद। विपक्ष का आरोप था कि इसे प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष से अलग इसलिए बनाया गया था ताकि फंड की सार्वजनिक जांच से बचा जा सके। अब छह साल बाद हमें एहसास हो रहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को मुसीबत में फंसे लोगों की मदद करने के बजाय दान का पैसा बैंकों में फिक्स्ड डिपॉज़िट में रखना ज़्यादा पसंद था।

इसका एक बड़ा उदाहरण तब सामने आया जब 2024-25 के लिए पीएम केयर्स फंड का ऑडिट स्टेटमेंट सार्वजनिक किया गया। ऑडिट किए गए वित्तीय विवरण के अनुसार, इस वित्तीय वर्ष के दौरान पीएम केयर्स फंड को कुल 1279.9 करोड़ रुपये मिले, लेकिन उसने केवल 87.85 लाख रुपये खर्च किए। पीएम केयर्स फंड के पास कुल 8,542 करोड़ रुपये उपलब्ध थे, जिसमें से 7,847 करोड़ रुपये (लगभग 93 प्रतिशत) बैंकों में फिक्स्ड डिपॉज़िट में रखे गए थे, जबकि 605 करोड़ रुपये सेविंग्स अकाउंट में रखे गए थे। यह स्पष्ट रूप से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्राथमिकता को दर्शाता है, जिन्होंने देश के लोगों को यह विश्वास दिलाने की कोशिश की थी कि प्रधानमंत्री लोगों की परवाह करते हैं, लेकिन सच्चाई कुछ और ही लगती है।

जब से पीएम केयर्स फंड की स्थापना हुई, यह मुख्य रूप से एक ट्रस्ट के तहत निजी फंड के रूप में स्थापित होने के कारण विवादों में रहा, हालांकि इसमें राष्ट्रीय प्रतीक 'सारनाथ में अशोक का सिंह स्तंभ' का इस्तेमाल किया गया था, जिसके आधार पर 'सत्यमेव जयते' लिखा था और भारत के प्रधानमंत्री कार्यालय का नाम भी शामिल था। ऐसा स्पष्ट रूप से कैग ऑडिट से बचने और आरटीआई अधिनियम के तहत जनता को जानकारी देने से रोकने के लिए किया गया था। इसे एक सरकारी संस्था के तौर पर नहीं बनाया गया था, हालांकि भारत के प्रधानमंत्री के नाम पर दान मांगा और लिया गया था। जमा किए गए फंड का इस्तेमाल प्रधानमंत्री और फंड के ट्रस्टी अपनी मज़ीर् से करते हैं, और यह भारत सरकार के खातों का हिस्सा नहीं होता है।

प्रधानमंत्री कार्यालय नियमित रूप से मिले फंड के इस्तेमाल के बारे में जानकारी नहीं देता है। शुरुआती सालों से लेकर 2022-23 तक की ऑडिट रिपोर्ट बहुत देरी से जारी की गईं, और दो साल के अंतराल के बाद, वित्तीय वर्ष 2023-24 और 2024-25 के ऑडिट किए गए स्टेटमेंट 18 अगस्त, 2026 को सार्वजनिक किए गए। यह फंड के इस्तेमाल में पारदर्शिता की कमी का एक स्पष्ट उदाहरण है, और 2022-23 के दो वर्ष बाद भी पब्लिक ऑडिट स्टेटमेंट न होने के कारण इसे जनता की आलोचना का सामना करना पड़ा।

आलोचनाओं में से एक यह थी कि जो फंड जनता का पैसा स्वीकार करता है- जिसमें पब्लिक सेक्टर की कंपनियों से कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (सीएसआर) योगदान और दूसरों से दान शामिल है - उसे पब्लिक ऑडिट के दायरे से बाहर क्यों रखा जाए, जबकि इस निजी फंड को एक सरकारी संस्था जैसा दिखाया जाता है। आलोचकों का तर्क था कि यह बेईमानी थी।

एक और विवाद प्रधानमंत्री के इस फंड के चेयरमैन (पदेन हैसियत से) होने और केंद्रीय कैबिनेट मंत्रियों के इसके ट्रस्टी होने से जुड़ा था। पीएम केयर्स ने हमेशा यही रुख अपनाया और आरटीआई आवेदकों को जानकारी देने से इनकार किया, यह कहते हुए कि ट्रस्ट आरटीआई एक्ट के तहत कोई सरकारी संस्था नहीं है।

प्रधानमंत्री कार्यालय का इस्तेमाल दान लेने के लिए किया गया, जिसके लिए कानूनों में भी बदलाव किए गए- जैसे कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय के नियमों में- और वह भी पिछली तारीख से लागू होने वाले बदलाव। इसकी आलोचना इसलिए भी हुई क्योंकि इसकी गतिविधियां जनता के प्रति जवाबदेही से परे थीं, और ये पूरी तरह से इसके अध्यक्ष प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मज़ीर् (चाहे वह सही हो या गलत) पर निर्भर थीं।

2020-21 में पीएम केयर्स की कुल आय 7,913.5 करोड़ रुपये थी, लेकिन इसने केवल 3,976.2 करोड़ रुपये खर्च किए। 2021-22 में फंड को 2,116.2 करोड़ रुपये मिले और उसने 3,716.3 करोड़ रुपये खर्च किए। 2022-23 में इसे 1,305.9 करोड़ रुपये मिले लेकिन इसने सिफ़र् 437.9 करोड़ रुपये खर्च किए; 2023-24 में इसे 904.9 करोड़ रुपये मिले लेकिन इसने सिर्फ़ 15.6 करोड़ रुपये खर्च किए; और 2024-25 में इसे 1,279.9 करोड़ रुपये मिले लेकिन इसने सिफ़र् 0.9 करोड़ रुपये खर्च किए। कुल मिलाकर, मार्च 2020 में शुरू होने से लेकर 31 मार्च 2025 तक, इस फंड ने अपनी कुल कमाई का पांचवें हिस्से से भी कम- यानी सिफ़र् 18.4 प्रतिशत - खर्च किया है। वित्त वर्ष 2024-25 में इसने अपने क्लोजिंग फंड का सिर्फ़ 0.01 प्रतिशत खर्च किया।

यह कहने की ज़रूरत नहीं है कि फंड का इस्तेमाल बहुत कम हुआ है, जबकि बड़ी संख्या में लोग प्राकृतिक और इंसानी आपदाओं के कारण मुश्किलों का सामना कर रहे हैं। आपातकालीन स्थितियों में ज़रूरतमंदों की मदद के नाम पर मिले फंड का 93 प्रतिशत बैंकों में फिक्स्ड डिपॉजिट के तौर पर जमा करना नैतिक या मानवीय रूप से सही नहीं लगता। इससे पता चलता है कि प्रधानमंत्री देश के लोगों की कितनी परवाह करते हैं और बड़ी मुश्किलों का सामना कर रहे लोगों को राहत देने के नाम पर बैंक डिपॉजिट बढ़ाने में उनकी कितनी दिलचस्पी है। 

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