दलित पिछड़े के बाद महिला की आवाज, राहुल देश बदल रहे हैं
राहुल के कई भाषणों के बाद हमने सुना लोग कहते हैं यह उनका सबसे अच्छा भाषण है। सच यह है कि उनके सभी भाषण बहुत अच्छे होते हैं;
नफरत और विभाजन देश को अंदर से खोखला कर रहे हैं। राहुल ने मर्ज को पहचान लिया है। हाशिए पर पड़े हर समुदाय को साथ लेकर चलना होगा। 12 साल में मोदी ने सबको लड़वा कर देख लिया। वे सत्ता में तो बने रहे। मगर देश पीछे चला गया। वे बातों ही बातों के जरिए तुमार बांधते रहते हैं। मगर अब देश की सबसे नई पीढ़ी अल्फा ने भी जो स्कूली छात्र-छात्रा हैं उनकी बातों की हकीकत जान ली है।
राहुल के कई भाषणों के बाद हमने सुना लोग कहते हैं यह उनका सबसे अच्छा भाषण है। सच यह है कि उनके सभी भाषण बहुत अच्छे होते हैं। दिल से निकले हुए। उच्च आदर्शों वाले नफरत और विभाजन के विरोधी। एक बड़ा देश, विकसित और अंदर से मजबूत ऐसे ही बनाया जाता है। छोटेपन की बातें करके नहीं।
हमें पता नहीं कि सोनिया गांधी की आने वाली किताब 'बिलान्गिंग ए जर्नी आफ लव' में कांग्रेस के 2014 और उससे पहले 2013 में दिल्ली विधानसभा हारने के कारणों पर लिखा गया है या नहीं। उम्मीद कम है। क्योंकि अगर सोनिया लिख दें तो वह कांग्रेस के तमाम बड़े नेताओं के जिनमें से कुछ हैं और कुछ नहीं रहे के सारे दोहरेपन, निज स्वार्थ की राजनीति और कांग्रेस विरोधी मानसिकता को उजागर कर देगा।
सोनिया बड़ी नेता और उससे बड़ी ह्यूमन वैल्यू वाली इंसान हैं। वे अपने साथ काम कर चुके लोगों की मिट्टी पलीद नहीं होने देंगी। हालांकि उन लोगों ने कांग्रेस की कब्र खोदने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। कोई कारण नहीं था 2014 में हारने का। यह अन्ना का नकली आंदोलन और केजरीवाल संघ का उनको समर्थन कुछ नहीं कर सकता था। अगर कांग्रेस के अंदर के लोग हथियार नहीं डालते तो। सोनिया और मनमोहन सिंह को नहीं डराते तो।
राहुल और प्रियंका को मालूम है सब। मगर वे भी परिवार की उन उच्च मानवीय परंपराओं से बंधे हुए हैं जिसमें अपने साथ काम किए लोगों के अंदरखाने नुकसान पहुंचाने की कहानियों को सार्वजनिक नहीं किया जाता। विश्वासघात जैसे सबसे बड़े जख्म को भी चुपचाप सह लिया जाता है। लेकिन वफादार लोगों को थोड़ा बेहतर महसूस हो, लगे कि प्रतिबद्ध लोगों और निहित स्वार्थियों के बीच कोई फर्क किया जाता है इसके लिए कहीं कोई काम करना संदेश देना राजनीति में जरूरी है। कभी लिखेंगे।
खैर यह लिखा इसलिए कि शनिवार 22 अगस्त को पुणे में राहुल ने एक धारा को पलटने वाला, खेल का रूख बदल देने वाला साहसिक कदम उठाया। उन्होंने सीधे पैट्रियार्की (पितृ सत्तात्मक समाज) को चुनौती दे दी। मनुस्मृति का उल्लेख करके बता दिया कि लड़कियों को नियंत्रण में रखने का विचार कहां से आया है। राहुल ने देश की 70 करोड़ महिलाओं को भारत की असली ताकत बताया। अब सोचिए कि जब देश में महिला सम्मान और समानता की बात भी बहुत मुश्किल से की जाती है। तब महिला मुक्तिकी बात तो एकदम क्रान्ति की आवाज ही है।
राहुल जैसा नेता ही यह कर सकते हैं। इससे पहले जाति गणना की बात भी देश में एक बड़ा विवादास्पद विषय माना जा रहा था। लेकिन राहुल ने उसे संभव कर दिखाया। मोदी सरकार को मानना पड़ा। हालांकि अब जनगणना में ओबीसी का कॉलम न देकर वह इस मुद्दे को कमजोर करने की कोशिश कर रही है। मगर अब यह देश की 50 प्रतिशत से ऊपर ओबीसी की राजनीतिक जगरूकता का सवाल है कि वे इसे किस प्रकार करवा पाते हैं। खासतौर से सत्तापक्ष के ओबीसी सांसद और विधायक। उन्हें आगे आकर सारे दलों के सांसद विधायकों का सम्मेलन करना चाहिए और ओबीसी के मुद्दों को बिना डरे उठाना चाहिए।
उनके विरोध में दिल्ली में जंतर-मंतर से एक आन्दोलन शुरू हो गया। राहुल ने उन्हें जगा तो दिया था। मगर ओबीसी, दलित, आदिवासी जगा रहे इसकी जिम्मेदारी उस समुदाय के नेताओं की है। आन्दोलन सीधा है। आरक्षण हटाओ। मतलब सामाजिक न्याय खत्म करो।
राहुल कहते रहे हैं कि यह मनुस्मृति लागू करने की तरफ जा रहे हैं। राहुल इसलिए हाथ में संविधान लिए घूम रहे हैं। वह राहुल का अभियान ही था 2014 में मोदी 240 से आगे नहीं बढ़ पाए। चार सौ पार मांग रहे थे। संविधान खत्म कर दिया जाता।
खतरा अभी टला नहीं है। इसलिए राहुल ने पुणे में फिर मनुस्मृति का जिक्र किया। इससे पहले कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे राज्यसभा में अभी खत्म हुए मानसून सत्र में कह चुके हैं कि मनुस्मृति के जरिए दलितों को गुलाम बनाकर रखा गया था। उसका बदला कुछ ही दिनों में इस तरह लिया गया कि उत्तराखंड हलद्वानी में जिस रामलीला मैदान में खरगे की सभा हुई उस स्थान को गंगाजल से धोकर पवित्र किया गया। बताने के लिए कि दलित खरगे अपवित्र हैं।
उत्तर प्रदेश जहां अभी सबसे निर्णायक विधानसभा चुनाव होने वाला है वहां जब 2017 में अखिलेश यादव ने मुख्यमंत्री निवास छोड़ा तो उसे भी गंगाजल से धुलवाकर पवित्र किया गया।
सोचिए एक कांग्रेस का अध्यक्ष और एक सपा का अध्यक्ष और मुख्यमंत्री इनके ऐसे अपमान हो रहे हैं तो सामान्य दलित और पिछड़े का अपमान कैसे होता होगा? इस सामाजिक स्थिति को बदलने के लिए ही सामाजिक न्याय की शुरूआत हुई। इसे खत्म करना चाहते हैं। आरक्षण हटाओ आन्दोलन इसकी पहली कड़ी है। भाजपा इसमें शामिल हो गई है। उत्तर प्रदेश के उप मुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक आरक्षण सुधार के नाम से इसका समर्थन करने प्रेस कान्फ्रेंस में सामने आ गए।
तो अब जागना दलित पिछड़े आदिवासी, महिला को है। राहुल वोट का रिस्क लेकर उनके साथ खड़े होते हैं। जब दलित लड़की के साथ बलात्कार और हत्या में वे हाथरस जा रहे थे तो राज्य सरकार ने तो उन्हें रोका ही कई दूसरे लोग भी उनके खिलाफ बोलने लगे। यहां तक कि दलित की बेटी कहने वाली मायावती भी। वे खुद हाथरस नहीं गईं। राहुल को पहली बार में तो जाने ही नहीं दिया गया।
दूसरी बार में पुलिस ने उन्हें सड़क पर गिरा दिया। लाठी चार्ज किया। मगर वे और प्रियंका परिवार तक पहुंचे। उस समय दलित विरोधी मानसिकता रखने वालों को भड़काने का भारी काम किया गया। सामूहिक बलात्कार और हत्या की बात न करके कहा गया कि राहुल आप लोगों का विरोध कर रहे हैं। आरोपियों के गैर दलित होने के कारण उन्हें समर्थन मिल रहा था। ऐसी मुश्किल घड़ी में राहुल ने परिवार के साथ खड़े होने का काम किया है।
जाति गणना की मांग पर भी राहुल के खिलाफ ऐसा ही प्रचार किया गया। और अब महिला अधिकार की आवाज उठाने पर भी राहुल को पुरुष विरोधी बताया जा रहा है। राहुल केवल यह बता रहे हैं कि समाज मेल डोमिनेटिंग (पुरुष प्रधान) है। देश की तरक्की के लिए आधी आबादी को पूरे अधिकार मिलना चाहिए। 70 करोड़ महिला देश की सबसे बड़ी ताकत हैं। अब यह राहुल ने कहा तो आप नहीं मान रहे।
लेकिन अगर महिला ताकत नहीं होती तो देश के सामने सबसे बड़ी चुनौती के समय दो महिला सैनिक अधिकारियों- कर्नल सोफिया कुरैशी और विंग कमांडर व्योमिका सिंह को क्यों लाया गया था? बिना महिला, दलित, ओबीसी, आदिवासी, अल्पसंख्यक को साथ लिए आप भारत को मजबूत और विकसित देश नहीं बना सकते।
नफरत और विभाजन देश को अंदर से खोखला कर रहे हैं। राहुल ने मर्ज को पहचान लिया है। हाशिए पर पड़े हर समुदाय को साथ लेकर चलना होगा। 12 साल में मोदी ने सबको लड़वा कर देख लिया। वे सत्ता में तो बने रहे। मगर देश पीछे चला गया। वे बातों ही बातों के जरिए तुमार बांधते रहते हैं। मगर अब देश की सबसे नई पीढ़ी अल्फा ने भी जो स्कूली छात्र-छात्रा हैं उनकी बातों की हकीकत जान ली है। उससे पहले कि जेन ज़ी तो सफल आन्दोलन करके उनके शिक्षा मंत्री का इस्तीफा ले चुकी है। उधर राहुल ने उन्हें और उनके सबसे खास अमित शाह को लोकसभा के अंदर सदन में नहीं आने दिया। माहौल पूरी तरह बदल चुका है। मगर राहुल जिनके लिए लड़ रहे हैं उन छात्र, युवा, महिला, दलित, ओबीसी सबको उनके साथ आना होगा। मुद्दई सुस्त गवाह चुस्त नहीं चलेगा!
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार है)