छात्रों ने कई मुद्दों पर बुनियादी बदलाव का मैसेज दिया

शिक्षा का सीधा संबंध रोजगार से है। असंतोष और संकट के मूल में बढ़ती बेरोजगारी है। हर साल वर्क फोर्स में 70-80 लाख युवा जुड़ते हैं। आंदोलनों की अगली कतार में इस आयु वर्ग के लोग अधिक हैं। स्कूली छात्रों के जुड़ने का कारण अनिश्चित भविष्य तो है ही।;

By :  DB Desk
Update: 2026-08-20 21:33 GMT
  • राजेश पांडेय

शिक्षा का सीधा संबंध रोजगार से है। असंतोष और संकट के मूल में बढ़ती बेरोजगारी है। हर साल वर्क फोर्स में 70-80 लाख युवा जुड़ते हैं। 80प्रतिशत बेरोजगार 15 से 24 आयु वर्ग के हैं। ग्रेजुएट्स के बीच बेरोजगारी की दर 29 फीसदी के आसपास है। आंदोलनों की अगली कतार में इस आयु वर्ग के लोग अधिक हैं। स्कूली छात्रों के जुड़ने का कारण अनिश्चित भविष्य तो है ही।

20 जून को जंतर-मंतर, नई दिल्ली से शुरू हुए छात्रों के आंदोलन की आवाज देश के कई राज्यों तक पहुंच चुकी है। मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तरप्रदेश,राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, बिहार, झारखंड, तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, आंध्रप्रदेश सहित कई राज्यों में विद्यार्थियों ने अपनी मांगों के समर्थन में धरना दिया और रैलियां निकाली हैं। कहीं बेरोजगारी, प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित धांधली, स्कूलों में शिक्षकों और जरूरी सुविधाओं की कमी, तो कहीं होस्टल की ज्यादा फीस जैसे मुद्दों ने छात्रों को सड़क पर आने के लिए प्रेरित किया है। बदलाव और बेचैनी की ऊर्जा से भरी यह हलचल हमारे समाज, राजनीति और सरकारी तंत्र को वर्तमान दौर की चुनौतियों को समझने और उसके हिसाब से कदम उठाने का स्पष्ट संदेश देती है।

इन आंदोलनों ने कुछ अहम पहलुओं को रेखांकित किया है। कुछ नए ट्रेंड उभर रहे हैं। छात्रों के आंदोलन राज्यों की राजधानियों और बड़े शहरों तक सीमित नहीं रहे। आमतौर पर किसी मुद्दे, मांग या विषय के पक्ष-विपक्ष में जनता के विभिन्न वर्ग बड़े शहरों में एकजुट होते आए हैं। अक्सर राजनीतिक दलों, छात्रों, मजदूर संघों और सामाजिक संगठनों द्वारा जनमत जगाने, विरोध जताने और लोगों को संगठित करने की मुहिम राजधानियों या बड़े शहरों में आकार लेती है। बहुत व्यापक आंदोलनों को छोड़ दें तो कई बार वह उन्हीं स्थानों तक सिमटकर रह जाती है। इस बार स्थिति अलग है। दिल्ली, भोपाल, रायपुर जैसी राजधानियों से उठी आवाज की अनुगंूज छोटे शहरों में सुनाई पड़ रही है।

एक अन्य महत्वपूर्ण बदलाव आंदोलनों में हिस्सा लेने वाले लोगों के स्वरूप में हुआ है। कॉलेज छात्रों के साथ स्कूली छात्र आगे आए हैं। स्कूली छात्र सिर्फ हाईस्कूल तक सीमित नहीं हैं। कई जगह मिडिल स्कूल के छात्रों ने सीनियर साथियों के साथ मोर्चा संभाला है। लड़कियां भी पीछे नहीं हैं। वे सिर्फ दिल्ली या राजधानियों में ही नहीं छोटे शहरों तक में सड़क पर उतरी हैं। सवाल है, ऐसा क्यों हो रहा है? जाहिर है, वे मौजूदा स्थितियों में अपने भविष्य के प्रति आश्वस्त नहीं हैं। उन्हें जिंदगी की दौड़ में पिछड़ने का खतरा नजर आता होगा।

छोटे शहरों के छात्रों के जागरूक होने का मुख्य कारण उनकी मांग तो है ही पर सोशल मीडिया ने उनके लिए कैटलिस्ट या उत्प्रेरक की भूमिका निभाई है। मोबाइल के परदे का छोटा स्क्रीन उन्हें दिल्ली से लेकर सैनफ्रांसिस्को तक की हलचल की जानकारी देता है। वे सिर्फ रील बनाने, देखने या मनोरंजन तक सीमित नहीं होंगे। उन्हें साइंस, टेक्नालॉजी, इनोवेशन से जुड़ी गतिविधियों की खबरें मिल रही हैं। स्पेस साइंस के चमत्कार भी उनकी कल्पनाओं का हिस्सा बन रहे होंगे। वे देख रहे हैं कि कैसे अमेरिका के कोई मार्क जकरबर्ग फेसबुक, व्हाट्सएप जैसा टूल बनाते हैं तो कैसे ओपन एआई के सैम आल्टमैन चैट जीपीटी पेश कर रहे हैं। वे यह भी जानने लगे हैं किस तरह मेडिकल साइंस ने दिल और मस्तिष्क के रोगों सहित कई लाइलाज बीमारियों में राहत देने का रास्ता खोज लिया है।

सूचना क्रांति का वर्तमान समय छात्रों सहित हर किसी को लोकतंत्र, आजादी और खुलेपन की अहमियत बताता है। वह उनके अंदर सिस्टम की जड़ता को तोड़ने और नई राह पर चलने की बेचैनी पैदा करता है। उन्हें कहीं लगता है कि वे असली बदलाव से बहुत दूर हैं। युवा महसूस कर रहे हैं कि मौजूदा व्यवस्था उन्हें सिर्फ प्रतियोगिता की अंतहीन होड़ में झोंक रही है। सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक व्यवस्था को नैतिकता, ईमानदारी, विश्वसनीयता और मानवीय मूल्यों के प्रसार का वाहक होना चाहिए। लेकिन इसका उल्टा हो रहा है। हम हर कहीं मूल्यों का क्षरण देखते हैं। राजनीतिक और प्रशासनिक ढांचा अपने पुराने ढर्रे पर चल रहा है।

ऐेसे सिस्टम से युवाओं का मोहभंग और हताशा स्वाभाविक है। आधुनिक दौर में ऐसी व्यवस्था के खिलाफ ताकतवर स्वर उभरते रहे हैं। युवाओं और आम लोगों ने समय-समय पर सत्ता को झकझोरने के लिए अपना असंतोष जाहिर किया है। छात्रों के सत्याग्रह का जिक्र होता है तो मार्च, मई 1968 में फ्रांस के छात्र आंदोलन को हमेशा याद किया जाता है। उस वक्त पेरिस में छात्रों ने विश्वविद्यालयों, कॉलेजों मेें छात्रों की भीड़, शिक्षकों की कमी और अपर्याप्त साधनों के खिलाफ आवाज बुलंद की थी। देश की ट्रेड यूनियन भी छात्रों के साथ खड़ी हो गई थीं। आंदोलन दूसरे शहरों में फैल गया। मजदूर संघों के साथ आने से कारखानों, दफ्तरों में काम ठप पड़ गया था।

फ्रांस के आंदोलन में तत्कालीन राष्ट्रपति चार्ल्स डिगाल की दस साल लंबी सत्ता का विरोध भी जुड़ा था। डिगाल का शासन अनुदारवादी था। उनकी तानाशाही और मनमानी के खिलाफ नौजवानों और मजदूर वर्ग में असंतोष पनप रहा था। डिगाल ने राजनीतिक सूझबूझ का परिचय दिया। उन्होंने नेशनल असेम्बली भंग कर दी। नए चुनाव कराए। देश में फैली अस्थिरता से परेशान मध्यम वर्ग ने डिगाल का समर्थन किया। उनकी पार्टी को संसद में फिर बहुमत मिल गया। 1969 में डिगाल ने संसद के स्वरूप में बदलाव के मुद्दे पर जनमत संग्रह कराया। लेकिन जनमतसंग्रह में हारने पर अप्रैल में उन्होंने राष्ट्रपति पद से इस्तीफा दे दिया।

भारत में विभिन्न स्तरों पर चल रही छात्रों की हलचल का संबंध व्यवस्था विरोधी भी है। निश्चित रूप से वह स्कूल, कॉलेजों में साधनों के अभाव से जुड़ा है। शिक्षा पर केंद्र और राज्य सरकारों का खर्च सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 2.8 से 4.3 प्रतिशत के बीच चल रहा है। वैसे, राष्ट्रीय नीति में शिक्षा पर जीडीपी का छह प्रतिशत खर्च करने की नीति रही है। लेकिन सरकारें इसका पालन नहीं कर रही हैं। संविधान की समवर्ती सूची में शिक्षा राज्यों का विषय है। इसलिए राज्यों के हिस्से में शिक्षा के खर्च का हिस्सा 75 प्रतिशत और केंद्र सरकार का 25 प्रतिशत है।

शिक्षा की पहली सीढ़ी स्कूल हैं। इसलिए उसके खर्च में कमी का असर भविष्य में शिक्षा के प्रसार और उसके स्तर पर पड़ता है। अपर्याप्त बजट का नतीजा सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की कमी, शाला भवनों की दुर्दशा और अन्य सुविधाओं के अभाव में सामने आया है। विशेष रूप से छोटे शहरों और दूरस्थ ग्रामीण इलाकों के स्कूल ज्यादा अभावग्रस्त हैं। शिक्षा के प्रति सरकारों की उपेक्षा को समझने के लिए कुछ आंकड़ों पर गौर कर सकते हैं। देश में 2014-15 से 2024-25 के बीच सरकारी स्कूलों की संख्या 94 हजार कम हुई है। इसमें उन स्कूलों की संख्या शामिल हैं जिन्हें राज्य सरकारें किसी अन्य स्कूल में शामिल करती हैं। अच्छी बात यह है कि इस दरम्यान शिक्षकों की संख्या में 11 लाख से अधिक इजाफा हुआ है। इन स्कूलों में भर्ती होने वाले छात्रों की संख्या दो करोड़ 26 लाख कम हो गई थी। सरकारी स्कूलों की घटती संख्या और साधनों का अभाव शिक्षा के प्रति सरकारों की प्राथमिकता का प्रमाण है। रोजगार के नए अवसरों के सृजन और भावी चुनौतियों के लिए छात्रों को तैयार करने के मामले में भी सरकारी तंत्र की भूमिका कारगर नहीं है।

भारत में शिक्षा का सीधा संबंध रोजगार से है। असंतोष और संकट के मूल में बढ़ती बेरोजगारी है। हर साल वर्क फोर्स में 70-80 लाख युवा जुड़ते हैं। 80प्रतिशत बेरोजगार 15 से 24 आयु वर्ग के हैं। ग्रेजुएट्स के बीच बेरोजगारी की दर 29 फीसदी के आसपास है। आंदोलनों की अगली कतार में इस आयु वर्ग के लोग अधिक हैं। स्कूली छात्रों के जुड़ने का कारण अनिश्चित भविष्य तो है ही। वे महसूस कर रहे हैं कि ग्रेजुएशन के बाद भी किसी अच्छी नौकरी के आसार बहुत कम हैं। अपने स्कूल की असुविधा, शिक्षकों की कमी जैसी समस्याएं उनके गुस्से के लिए चिन्गारी पैदा करती हैं।

छात्रों के आंदोलन के कुछ फौरी नतीजे निकले हैं। 26 जुलाई को शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे ने जंतर-मंतर पर छात्रों का धरना समाप्त करा दिया। झारखंड सरकार ने 19 अगस्त को 22 भर्ती परीक्षाएं रद्द कर दी हैंं। रांची में छात्र आंदोलन के दबाव में भर्ती परीक्षाओं में कथित गड़बड़ी की सीआईडी जांच कराने का फैसला किया गया है। इसी तरह स्थानीय स्तर पर सरकारें, प्रशासन और स्कूलों ने छात्रों की कुछ मांगें पूरी की हैं। लेकिन ऐसे फैसले अस्थायी राहत देते हैं। इनमें लंबी अवधि की कोई ठोस रणनीति और सुविचारित योजना नजर नहीं आती है। महज भाषणों, वादों और सोशल मीडिया रील्स से उन्हें लंबे समय तक भरमाए नहीं रखा जा सकता है। छात्रों को 21 वीं सदी की चुनौतियों के अनुरूप तैयार करने का सिलसिला स्कूलों से शुरू होना चाहिए। उन्हें वर्तमान टेक्नालॉजी, जॉब मार्केट और कॉरपोरेट सेक्टर की जरूरतों के हिसाब से गढ़ा जाए।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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