जवाबदेही का मुद्दा फिर से एजेंडे पर
खुद मुख्य न्यायाधीश ने बीसीआई अध्यक्ष को बिना अधिकार के बोलने के लिए फटकार लगाई।;
- नीलोत्पल बसु
जब सत्ताधारी पार्टी के एक करीबी और राज्यसभा सांसद, जो बार काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष भी हैं, ने नलसर के छात्रों के ख़िलाफ़ सज़ा देने की कार्रवाई शुरू की, तो कानूनी बिरादरी में हर तरफ़ से उनकी आलोचना हुई। खुद मुख्य न्यायाधीश ने बीसीआई अध्यक्ष को बिना अधिकार के बोलने के लिए फटकार लगाई। भाजपा के बड़े नेताओं को जल्दबाज़ी में पीछे हटना पड़ा।
यह एक अजीब स्थिति थी। संसद के मानसून सत्र के आखिरी दिन से ठीक एक दिन पहले बेहद ताकतवर गृह मंत्री अमित शाह मीडिया चैनलों से बात करते हुए निराश दिखे। उन्होंने कहा, 'लोकसभा के अंदर जाने का क्या मतलब है!Ó संदर्भ के लिए बता दें कि मानसून सत्र का लगभग पूरा समय बिना किसी खास कामकाज के बीत गया, क्योंकि शाह जंतर-मंतर पर 20 जुलाई को हुए शांतिपूर्ण छात्र विरोध प्रदर्शन से निपटने में दिल्ली पुलिस की भूमिका के बारे में बताने से इन्कार कर रहे थे।
शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन के दौरान दिल्ली पुलिस का बर्ताव बेहद क्रूर था। अंधाधुंध आंसू गैस के गोले दागना, बेरहमी से लाठीचार्ज करना (जिसमें नुकीली लाठियों का भी इस्तेमाल हुआ), सादे कपड़ों में और बिना नेम-टैग वाले पुलिसकर्मी, महिला प्रदर्शनकारियों के निजी अंगों को निशाना बनाना, पैलेट गन चलाना, पुलिस की हिरासत में मौजूद पिक-अप ट्रक में पत्थर भरना ताकि बाद में छात्रों पर फेंके जा सकें और यह दिखाया जा सके कि विरोध हिंसक था, इत्यादि हर तरह के हथकंडे अपनाए गए।
बेशक, जो बिल्कुल नई चीज़ इस्तेमाल की गई, वह थी प्रदर्शनकारियों की पहचान जानने और उनके डिजिटल रिकॉर्ड को स्टोर करने के लिए इलेक्ट्रॉनिक निगरानी का जाल। अलग बात है कि इन हथियारों में से किसी को भी कानूनी मंज़ूरी नहीं मिली थी। यह साफ है कि अमित शाह मुश्किल स्थिति में फंस गए थे। वह भूल गए कि सबसे पहले लोकसभा ही उन्हें गृह मंत्री के तौर पर नियुक्त किये जाने के लिए जिम्मेदार था। इसलिए, उनका यह फ़ज़र् था कि वह उस सदन को जवाब दें और बताएं कि 20 जुलाई और उसके बाद दिल्ली पुलिस द्वारा छात्रों के साथ किए गए उस भयानक बर्ताव के लिए कौन ज़िम्मेदार था।
उन्हें इधर-उधर की बातें करने और पुलिस की कार्रवाई के लिए कौन ज़िम्मेदार था, इस सवाल का जवाब देने से बचने की आज़ादी नहीं थी। यह अब उनकी आदत बन गई है; ठीक वैसे ही जैसे उन्होंने 22 अप्रैल, 2025 की उस मनहूस दोपहर को पहलगाम में आतंकवादी कैसे घुस आए और 26 बेगुनाह भारतीय पर्यटकों को कैसे मार डाला, इस बारे में पूछे गए सवालों को टाल दिया था। उस सवाल का जवाब आज भी नहीं मिला है।
हालात बदल गए हैं और अब उस जवाबदेही से बचा नहीं जा सकता जो उन पर बनती है। हालांकि, सरकार एक मुश्किल स्थिति में फंस गई है- या तो जवाब दे और मुसीबत मोल ले, या फिर तब चुप रहे जब जवाबदेही की मांग ज़ोर पकड़ रही हो। धर्मेन्द्र प्रधान का इस्तीफ़ा देना- या यूं कहें कि उन्हें इस्तीफ़ा देने के लिए मजबूर किया गया- इस बात को मानता है कि जवाबदेही से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता। लेकिन नेशनल एलिजिबिलिटी टेस्ट (नेट) रद्द होने की रिपोर्ट दिखाती है कि असल में कुछ भी नहीं बदला है। सरकार को यह मानना होगा कि एनटीए को भंग किए बिना, इन परीक्षाओं को आयोजित करने में जो बहुत ज़्यादा केन्द्रीयकरण है, उसके कारण ये परीक्षाएं नाकाम ही होंगी।
मोदीजी को खुद यह मानना पड़ा कि स्कूली शिक्षा व्यवस्था में तब तक सुधार नहीं हो सकता जब तक छात्र बिना कोचिंग के नामांकन प्रक्रिया और योग्यता निर्धारित करने वाली परीक्षाओं का सामना करने में असमर्थ हैं। उन्होंने यह बात लाल किले की प्राचीर से अपने स्वतंत्रता दिवस के भाषण के दौरान कही थी। कौन इस बात से इन्कार कर सकता है कि सरकार ने खुद माना है कि देश भर में लगभग 94,000 स्कूल बंद कर दिए गए हैं? राष्ट्रीय नीति के योजना में तर्क दिया गया था कि स्कूलों को बंद करने की प्रक्रिया उन्हें एक साथ लाने (कंसोलिडेशन) का हिस्सा थी। अब हम राष्ट्रीय शिक्षा नीति को लागू करने के सातवें साल में हैं। फिर भी, बिना अतिरिक्त कोचिंग के छात्रों के नतीजे अच्छे नहीं आ सकते। इस बीच, 20 जुलाई को पुलिस की हिंसा पर स्पष्टीकरण मांगने के लिए सर्वोच्च न्यायालय को खुद दखल देना पड़ा। साफ़ है कि शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों को आपराधिक ठहराने का जो जाना-पहचाना तरीका मोदी सरकार की आदत बन गयी है, वह अब काम नहीं आ रहा है!
अच्छी बात यह है कि डर कम हो रहा है और सामूहिक साहस की भावना बढ़ रही है, जो ताज़ी हवा के झोंके जैसी है। सिर्फ़ कार्यपालिका ही नहीं, बल्कि न्यायपालिका पर भी दबाव महसूस किया जा रहा है। नलसर के छात्रों ने भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) को बुलाए जाने पर अपने आयोजकों का विरोध किया और सवाल उठाए। शुरू में तो ऐसा लगा जैसे आसमान टूट पड़ा हो! लेकिन, एक और नेशनल लॉ स्कूल के छात्रों ने भी वही भावनाएं दोहराईं जब सीजेआई को उनके संस्थान में बोलने के लिए बुलाया गया।
जब सत्ताधारी पार्टी के एक करीबी और राज्यसभा सांसद, जो बार काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष भी हैं, ने नलसर के छात्रों के ख़िलाफ़ सज़ा देने की कार्रवाई शुरू की, तो कानूनी बिरादरी में हर तरफ़ से उनकी आलोचना हुई। खुद मुख्य न्यायाधीश ने बीसीआई अध्यक्ष को बिना अधिकार के बोलने के लिए फटकार लगाई। भाजपा के बड़े नेताओं को जल्दबाज़ी में पीछे हटना पड़ा। बीसीआई अध्यक्ष को फटकार लगाते हुए, मुख्य न्यायाधीश ने यह भी कहा कि विरोध करना नागरिकों का एक ऐसा अधिकार है जिसे छीना नहीं जा सकता, चाहे वे युवा हों या बुजुर्ग। सर्वोच्च न्यायालय के एक और वरीय जज ने साफ़ तौर पर कहा कि अगर लोगों की नज़र में न्यायपालिका अपनी विश्वसनीयता, ईमानदारी और निष्पक्षता खो देती है, तो वह अप्रासंगिक हो जाएगी। असल में, न्यायपालिका के भीतर यह एहसास हो रहा था कि भले ही उसे लोगों ने नहीं चुना है, फिर भी उसे जवाबदेह होना चाहिए, जैसा कि हमारे संविधान में तय किया गया है।
हालांकि, एक संवैधानिक संस्था अभी भी नहीं झुकी है- वह है भारत का चुनाव आयोग (ईसीआई)। भले ही एसआईआर प्रक्रिया अब मुख्यधारा की मीडिया में कोई बहुत बड़ी चर्चा का विषय न हो, फिर भी ऐसी खबरें आ रही हैं जिनसे पता चलता है कि सॉफ्टवेयर और एल्गोरिदम के इस्तेमाल से वोटरों के नाम बहुत ही अपारदर्शी तरीके से मतदाता सूची से हटाए जा रहे हैं।
जहां तक जवाबदेही का सवाल है, नागरिकों के संवैधानिक अधिकार- यानी वोट देने के अधिकार- को यूं ही खत्म नहीं किया जा सकता। इसलिए, अपने संवैधानिक अधिकारों की रक्षा और कार्यपालिका व न्यायपालिका से जवाबदेही की मांग के लिए लोगों की सामूहिक आवाज़ उठने के इस नए माहौल में, ईसीआई की जवाबदेही की मांग भी ज़ोर-शोर से उठेगी- भले ही डोनाल्ड ट्रंप का सर्टिफिकेट कुछ भी कहे!