सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग की भूमिका पर गंभीर सवाल
चुनाव आयोग ने अधिकृत बयान के माध्यम से अपनी कुछ गलतियों को स्वीकार तो कर लिया है।;
- राजेश पांडेय
चुनाव आयोग ने अधिकृत बयान के माध्यम से अपनी कुछ गलतियों को स्वीकार तो कर लिया है। इसलिए सवाल उठाना लाजिमी है कि इन गलतियों की जवाबदेही किसकी है। इतने बड़े पैमाने पर लोगों का मताधिकार छीनने वाली संस्था में बैठे लोगों के खिलाफ कोई कार्रवाई कैसे होगी। अब तक बीस राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में एसआईआर की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है।
रत में चुनाव प्रक्रिया पर इतने सवाल पहले कभी नहीं उठाए गए थे। न ही पहले कभी चुनाव आयोग की भूमिका पर इतने गंभीर संदेह जताए गए थे। 27 अक्टूबर 2025 को मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की घोषणा के कुछ दिन बाद ही विशेषज्ञों और राजनीतिक दलों ने पूरी प्रक्रिया पर उंगली उठाना शुरू कर दिया था। कई आशंकाएं जताई गई थीं। और अब तमाम संदेह, आशंकाएं सच साबित हो रही हैं। इंडियन एक्सप्रेस में 17 सितंबर को रीतिका चोपड़ा की धमाकेदार खबर ने चुनाव आयोग में चल रही खुली धांधली का खुलासा कर दिया। लंबे समय बाद किसी अखबार की खोजी खबर ने ऐसा तहलका मचाया है। खबर के अनुसार दो चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने दस माह में 14 बार उन फैसलों और आदेशों पर आपत्तियां जताई जो उनकी जानकारी के बगैर लिए गए।
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार चुनाव आयोग में सभी फैसले आम राय या बहुमत से करने की व्यवस्था के खिलाफ जाकर मनमानी कर रहे थे। संवैधानिक पद पर आसीन किसी व्यक्तिक्र का ऐसा आचरण संविधान और कानून के शासन का मखौल है। इस खुलासे की तीखी प्रतिक्रिया स्वाभाविक है। इस बीच, चुनाव आयोग ने रास्ते पर आने के थोड़े संकेत दिए हैं। 26 सितंबर को आयोग ने एक विज्ञप्ति जारी कर एक तरह से अपने दोष और गलतियों को स्वीकार कर लिया है। उसने आयोग की सभी बैठकों का एजेंडा पहले जारी करने, नए वोटरों के नाम दर्ज करने के लिए जरूरी फार्म छह में बदलावों को वापस लेने, आयोग के पोर्टल ईसीआईनेट के सिस्टम की समीक्षा के लिए कमेटी बनाने, मैदानी कर्मचारियों ईआरओ और बीआरओ के अधिकारों की बहाली जैसे कुछ फैसले लिए हैं। दोनों चुनाव आयुक्तों ने इन सभी मामलों पर एतराज जताया था।
चुनाव आयोग ने अधिकृत बयान के माध्यम से अपनी कुछ गलतियों को स्वीकार तो कर लिया है। इसलिए सवाल उठाना लाजिमी है कि इन गलतियों की जवाबदेही किसकी है। इतने बड़े पैमाने पर लोगों का मताधिकार छीनने वाली संस्था में बैठे लोगों के खिलाफ कोई कार्रवाई कैसे होगी। अब तक बीस राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में एसआईआर की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। लगभग 13 करोड़ मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से बाहर किए जा सकते हैं। इनमें मृत, गैरहाजिर, किसी अन्य स्थान पर जा चुके, डुप्लीकेट या कानूनी विसंगति (लीगल डिसक्रीपेंसी) जैसे प्रावधानों के दायरे में आए लोग शामिल हैं। कानूनी विसंगति जैसा अनोखा प्रावधान पहली बार वोटर लिस्ट के संशोधन पर लागू किया गया। वोटिंग के अधिकार से सिर्फ 13 करोड़ लोग वंचित नहीं होंगे। उनकी आने वाली पीढ़ियां भी इससे प्रभावित हो सकती हैं। कौन जानता है, भविष्य में दूसरे वोटरों को भी ऐसी स्थिति का सामना करने की नौबत आ जाए।
ज्ञानेश कुमार की अगुआई में आयोग ने पहली बार बड़े पैमाने पर वोटरों का हक छीनने का अभियान चलाया है और देश की सर्वोच्च अदालत- सुप्रीम कोर्ट ने इन अनियमितताओं की ओर से आंख बंद कर रखी हैं। कुछ उदाहरणों से चुनाव आयोग की खुलेआम धांधली को समझने में मदद मिल सकती है। देश की राजधानी दिल्ली में 50 प्रतिशत से अधिक वोटरों को या तो वोटर लिस्ट से बाहर कर दिया है या आयोग ने उन्हें स्वयं को सही मतदाता साबित करने के लिए नोटिस जारी किए हैं। दिल्ली के एक करोड़ 45 लाख वोटरों में से लगभग 80 लाख वोटर आयोग की छानबीन के दायरे में हैं। दिल्ली की प्रमुख हस्तियों के मतदाता होने की जांच का खुलासा होने पर प्रक्रिया की गंभीर गड़बड़ी ने लोगों का ध्यान खींचा। दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता, पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, विदेशमंत्री जयशंकर सहित कई बड़े रिटायर्ड अधिकारियों का नाम नोटिस जारी होने वाले लोगों की सूची में था। संभवत: आयोग ने ऐसा करके जताने की कोशिश की है कि वह निष्पक्षता से कार्रवाई कर रहा है।
पश्चिम बंगाल का अनुभव बेहद गंभीर है। आयोग ने राज्य में हुई गड़बड़ी को सुधारने के लिए अभी तक कोई कदम नहीं उठाए हैं। वहां विधानसभा चुनाव से पहले 27 लाख लोग कानूनी विसंगति प्रावधान का निशाना बने। आयोग के निर्देश पर वोटरों की जांच और दावों की सुनवाई के लिए ट्रिब्यूनल बनाए गए। ट्रिब्यूनलों में अपील दायर करने वाले 38 लाख लोगों में हटाए गए 22 लाख वोटर भी हैं। इनके अलावा 16 लाख अन्य वोटर आयोग ने बाहर कर दिए। चुनाव आयुक्त संधू ने सवाल उठाया कि वोटर लिस्ट से नाम हटाने की अपीलें चुनाव आयोग की तरफ से दाखिल करने के लिए किसने अधिकृत किया है। उन्हें और जोशी को इस संबंध में कुछ नहीं बताया गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने संविधान और कानूनी प्रक्रियाओं से अलग हटकर हो रही कार्रवाई को रोकने की जरूरत नहीं समझी है। एसआईआर को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। कोर्ट ने एसआईआर को कानूनी दृष्टि से जायज ठहराते हुए आयोग को खुली छूट दे दी। उसने एसआईआर में होने वाली अनियमितताओं और उसके पेचीदा नियमों को नहीं रोका। याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने कोर्ट में कहा कि लाखों लोग चुनावों में वोट नहीं दे पाएंगे तो एक न्यायाधीश ने टिप्पणी की कि यदि एक चुनाव लोग वोट नहीं दे सकेंगे तो क्या फर्क पड़ जाएगा?
सुप्रीम कोर्ट का यह रुख अब भी कायम है। 28 सितंबर को पश्चिम बंगाल की मतदाता सूचियों में नाम शामिल करने के मामले में कोर्ट ने अपीलों की सुनवाई पहले करने से इंकार कर दिया। याचिकाकर्ताओं के वकील ने नंदीग्राम और रेजिनगर उपचुनाव को देखते हुए जल्द सुनवाई का आग्रह किया था। उनका कहना था, इन क्षेत्रों के वोटर विधानसभा चुनाव में पहले ही वोट नहीं दे पाए हैं। यदि उनकी अपीलों पर जल्द फैसला नहीं हो पाता है तो वे एक अन्य चुनाव में वोट नहीं दे सकेंगे। भारत के चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि 'ये तो केवल उपचुनाव हैं'।
अगर मतदाता सूची से नाम बाहर करने के वर्तमान तरीके में कोई सुधार नहीं हुआ तो बंगाल के लाखों वोटर शायद दो-तीन चुनावों तक वोट नहीं दे सकेंगे। 16 सिंतबर को सर्वोच्च न्यायालय में दाखिल एक हलफनामे में चुनाव आयोग ने बताया कि कुल 38 लाख 31429 अपीलों में सिर्फ एक लाख 26194 अपीलों पर अब तक निर्णय हो पाया है। इनमें 22 लाख अपीलें उन वोटरों की तरफ से हैं जिनके नाम हटाए गए हैं। 16 लाख अपीलें नाम शामिल करने के खिलाफ हैं। अनुमान है, अगर ट्रिब्यूनलों में अपीलों का निपटारा इसी गति से चलता रहा तो सभी अपीलों पर फैसला होने में दस से बारह साल लग सकते हैं।
एसआईआर से जुड़ा पूरा घटनाक्रम चुनाव आयोग की स्वतंत्रता, निष्पक्षता और उसकी कार्यशैली को कठघरे में खड़ा करता है। यह अभियान भी बिहार, बंगाल, तमिलनाडु सहित कई राज्यों के विधानसभा चुनावों के आसपास हुआ है। मतदाता सूची तैयार करने का मुख्य आधार मतदाताओं को शामिल करने का रहा है। लेकिन आयोग ने तो जैसे वोटरों को बाहर निकालने की मुहिम चला रखी है। 2002 की वोटर लिस्ट में वोटर और उसके माता-पिता का नाम होने की शर्त तो बहुत अटपटी और मुश्किल है। इस अभियान में सबसे अधिक गरीब और अल्पसंख्यक वोटर प्रभावित हो रहे हैं। बीएलओ के घर-घर जाकर वोटरों की जांच करने की पुरानी प्रक्रिया की बहाली के फैसले से जरूर लोगों को राहत मिलेगी।
ज्ञानेश कुमार द्वारा नियमों, कानूनों से परे हटकर बेखटके काम करने के कारण उनकी नियुक्तियों से जुड़े हो सकते हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त और आयुक्तों का चयन प्रधानमंत्री, उनके द्वारा नियुक्त कैबिनेट मंत्री और विपक्ष के नेता की कमेटी करती है। सुप्रीम कोर्ट ने एक निर्णय में चयन प्रक्रिया से सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस को जोड़ने का सुझाव दिया था जिसे एनडीए सरकार ने स्वीकार नहीं किया है। फिर चुनाव आयुक्त को केवल संसद में पास महाभियोग की प्रक्रिया से ही हटाया जा सकता है। विपक्ष ने दूसरी बार ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने का इरादा जताया है। पहला प्रस्ताव खारिज हो चुका है।
फरवरी 2025 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने ज्ञानेश कुमार को नियुक्त किया था। उनका छह साल का कार्यकाल जनवरी 2029 तक चलेगा। कानून से अभयदान प्राप्त ज्ञानेश कुमार के हटने की संभावनाएं क्षीण नजर आती हैं। वे चुनाव कानूनों के खिलाफ जाकर काम कर रहे है। उन्होंने अपने दो सहयोगी चुनाव आयुक्तों को निर्णय प्रक्रिया से बाहर कर रखा है। सुप्रीम कोर्ट चुनाव आयोग के माध्यम से हो रही धांधली और गड़बड़ी को रोक सकता है, लाखों मतदाताओं के अधिकार की रक्षा कर सकता है पर वह भी खामोश है। भारत जैसे लोकतांत्रिक देश के लिए यह स्थिति बहुत दुर्भाग्यपूर्ण और चिंताजनक है।