गांधी के अखबार की राजनीति

गांधी की भागीदारी उनके सभी अखबारों में भरपूर थी लेकिन इसमें शायद सबसे ज्यादा थी।;

Update: 2026-09-29 21:30 GMT

यह अखबार या यह पूरा प्रयोग गांधी के अछूतोद्धार (जिस पद पर आज के सचेत दलित नाराजगी जताते हैं) कार्यक्रम को बताने का सबसे बड़ा माध्यम है पर यह गांधी की पत्रकारिता का भी सबसे प्रभावी और बड़ा प्रयोग है। गांधी की भागीदारी उनके सभी अखबारों में भरपूर थी लेकिन इसमें शायद सबसे ज्यादा थी। बीच आजादी की लड़ाई में शुरू होने पर भी इसने राजनैतिक स्वर एकदम मद्धिम ही नहीं किया, लगभग भुला दिया।

गांधी के सामाजिक आंदोलन के इस पक्ष को बारीकी से समझने और उनके आंदोलन की ताकत को जानने और तब के राष्ट्रीय आंदोलन में उसकी स्थिति का अनुमान लगाने का सबसे अच्छा माध्यम उनका 'हरिजन' नामक अखबार ही है जो तीन भाषाओं में निकला और उनकी हत्या के बाद भी काफी समय तक निकलता रहा। गांधी खुद अंग्रेजी अखबार का संपादन करते रहे और उनके सबसे भरोसे के विद्वान लोग गुजराती 'हरिजन बंधु' और हिन्दी 'हरिजन सेवक' का सम्पादन उनकी देखरेख में करते रहे।

यह अखबार या यह पूरा प्रयोग गांधी के अछूतोद्धार (जिस पद पर आज के सचेत दलित नाराजगी जताते हैं) कार्यक्रम को बताने का सबसे बड़ा माध्यम है पर यह गांधी की पत्रकारिता का भी सबसे प्रभावी और बड़ा प्रयोग है। गांधी की भागीदारी उनके सभी अखबारों में भरपूर थी लेकिन इसमें शायद सबसे ज्यादा थी। बीच आजादी की लड़ाई में शुरू होने पर भी इसने राजनैतिक स्वर एकदम मद्धिम ही नहीं किया, लगभग भुला दिया। इससे लिए छुआछूत, मंदिर प्रवेश, सार्वजनिक कुंए-तालाब तक अछूतों की पहुंच, दलित बच्चों की शिक्षा, रोजगार और मान-सम्मान ही एकमात्र प्राथमिकता रही। हर अंक में हरिजन सेवक संघ के सचिव ठक्कर बापा की रिपोर्ट हर क्षेत्र में होने वाली प्रगति की सूचना देने के साथ उसकी कमीबेसी को भी रेखांकित करती थी। गांधी खुद शास्त्रों के अध्ययन और संस्कृत विद्वानों से चर्चा के बाद छुआछूत के हर पहलू पर लिखते थे और अपनी मूल धारणा को आगे बढ़ा रहे थे कि छुआछूत शास्त्रोक्त नहीं है। चूंकि यह चीज धर्म और नैतिकता से जुड़ी थी इसलिए गांधी कानून बनाने या सरकारी मदद से इसे दूर करने की जगह उसके शास्त्रीय पक्ष को साफ करके लोगों का मन बदलना चाहते थे। और गांधी ही नहीं उनके सारे बड़े मित्र और तब के दिग्गज भी इन सवालों पर अखबार में नियमित लिखा करते थे।

लेकिन इस मुहिम का प्राण गांधी ही थे और तब अखबार उनका प्राण बन गए थे। सविनय अवज्ञा आंदोलन में गांधी, प्रकाशक स्वामी आनंद और शंकरलाल बैंकर के जेल चले जाने पर यंग इंडिया और नवजीवन का प्रकाशन बंद हो गया था। उन्होंने अपने पुराने अखबारों को दोबारा शुरू भी नहीं किया जो आजादी की लड़ाई में उनका एक बड़ा हथियार बन गए थे। उनके प्रकाशन से जुड़े सारे लोग जेलों में डाल दिए गए थे। लेकिन दूसरे गोलमेज सम्मेलन के अनुभव और अंग्रेजी सरकार के षड्यंत्रकारी मन को जानने के बाद गांधी को अछूतोद्धार से बड़ा कोई कार्यक्रम नहीं लगता था। हिन्दू-मुसलमान सवाल पर उनकी तत्परता से जो परिणाम मिला उसकी तुलना में जाति व्यवस्था की कुरीतियों वाले सवाल पर ज्यादा सफलता मिली।

इन सबसे भी ज्यादा दिलचस्प पक्ष यह है कि सिर्फ दलितों के सवाल और सामाजिक मुद्दों को उठाने के बावजूद गांधी का अखबार 'हरिजन' उनके अखबारों में सबसे बड़ा हिट साबित हुआ। ज्यादा दिन नहीं हुए जब उसने दस हजार की प्रसार संख्या हासिल कर ली। यह तेरह हजार तक गया जो गांधी के किसी भी अखबार की सबसे बड़ी प्रसार संख्या है।

गांधी का यह अखबार 11 फरवरी 1933 को पुणे से प्रकाशित हुआ। इसके प्रकाशक अनंत पटवर्द्धन थे और संपादक संस्कृत के विद्वान आर वी शास्त्री थे पर अखबार गांधी का था क्योंकि नब्बे फीसदी से ज्यादा सामग्री उनके नाम से छपी है। दो साल बाद महादेव देसाई संपादक बने तब भी ज्यादा बदलाव नहीं दिखता। हिन्दी के संपादक प्रसिद्ध लेखक वियोगी हरि थे जिनके सहयोगी हरिभाऊ उपाध्याय थे। तीनों अखबारों के हर शब्द पर गांधी की छाप दिखती है। बहुत बाद में गांधी का दिमाग कहे जाने वाले उनके साथी किशोरलाल मशरुवाला को तीनों अखबारों का संपादक बनाया गया और आखिर में उन्होंने गुजरात विद्यापीठ को संभालने वाले गणित और दर्शन के जानकार मगनभाई देसाई को अखबार का जिम्मा सौंपा।

हरिजन के पहले अंक में सबसे ऊपर रवि बाबू की एक कविता है और पहले पन्ने से हरिजन सेवक संघ के सचिव ठक्कर बापा की रिपोर्ट है कि कौन-कौन से मंदिरों के द्वार अछूतों के लिए खुले हैं, कहा- कहां कुंआ और तालाब सबसे लिए उपलब्ध हैं, किस-किस जगह अछूतों के लिए स्कूल बने हैं (हरिजन सेवक संघ ने बनवाए थे)। यह रिपोर्टिंग लगातार बाद के अंकों में भी चलती रही थी और बाद में जब वियोगी हरिजी सचिव बने तो उनके जिम्मे यह काम रहा। पहले अंक की सूचना के अनुसार सरवेंट्स आफ अनटचेबल सोसाइटी इसका प्रकाशक थी। अखबार आठ फुलस्केप पन्नों का था। अखबार साप्ताहिक था। हिन्दी और गुजराती अखबारों की फ्रीक्वेंसी अलग-अलग थी पर सबका स्वर एक था।

आज के हिसाब से पहले अंक की सबसे बड़ी सामग्री बाबा साहब का बयान है। गांधी ने हरिजन के प्रकाशन के अवसर पर डॉ. अंबेडकर से संदेश मांगा था। बाबा साहब का जवाब था कि वे खुद को कोई संदेश देने लायक (बड़ा) नहीं मानते। सो उन्होंने जाति व्यवस्था की आलोचना और उसकी समाप्ति की इच्छा वाला एक छोटा बयान दिया था। गांधी ने उसे प्रमुखता से छापने के साथ ही जाति व्यवस्था को लेकर अपनी राय बताने वाला लंबा लेख जवाब के रूप में छापा है। इसमें छुआछूत पर फोकस है और उसे अछूतों से भी ज्यादा पूरे हिन्दू समाज के लिए अभिशाप बताया गया है। एक और लंबा लेख छुआछूत पर ही है।

लेकिन इस अंक में गांधी ने हरिजन नाम और अंग्रेजी में छापने की मजबूरी को लेकर जो सफाई दी है वह पर्याप्त महत्वपूर्ण है। आज काफी सारे लोग हरिजन कहना और कहलाना पसंद नहीं करते। लेकिन गांधी के छुआछूत विरोधी और जाति व्यवस्था की बुराइयों को दूर करने के आंदोलन में ज्यादातर समय यही पद इस्तेमाल हुआ है। यह पद भक्त कवि नरसिंह मेहता के एक भजन से लिया गया है। तब यह चला भी बहुत लेकिन अस्सी के दशक से जो नया दलित आंदोलन उभरा है उसे यह पसंद नहीं है और जब उसे ही यह नापसंद हो तो दूसरों को कहने का अधिकार भी नहीं रहता।

दूसरे अंक का फोकस मद्रास एसेम्बली में पेश छुआछूत संबंधी बिल की चर्चा है जिसे जयकर ने पेश किया था। इस अंक में कलकत्ता की दलित बस्ती में काम की रिपोर्ट वसंत मोरारका ने दी है और बापा की सामान्य रिपोर्ट 'वीक टू वीक' भी ऊपर है। अंग्रेजी शासन की नीतियों पर अलग से आलोचना 'इज दिस ब्रदरलीनेस' शीर्षक से है तो गांधी और पंडित मालवीय के पत्राचार को प्रकाशित किया गया है जिसमें छुआछूत की शास्त्रीय वैधता न होने की बात प्रमुखता से उठी है। और निष्कर्ष 'असहमति पर सहमति' शीर्षक से दिया गया है। गांधी के सवाल भी महत्वपूर्ण हैं। गांधी ने मंदिर प्रवेश और वर्णाश्रम नामक आलेख भी लिखा है तथा सामग्री के मामले में पहले अंक जैसा ही दबदबा बनाए रखा है।

लेकिन बाद के अंकों में लिखने वालों की सूची बहुत बड़ी और भारी है। इसमें रवीन्द्रनाथ टैगोर और चक्रवर्ती राजगोपालाचारी से लेकर सारे बड़े लोग शामिल हैं। यह गांधी के आग्रह का नतीजा होगा या छुआछूत का मुख्य वैचारिक चर्चा का केंद्र बन जाना होगा। दोनों ही चीजें गांधी की चिंता और प्रयत्न को बताती हैं। और उन पर यह भूत ऐसा चढ़ा रहा कि उन्होंने बिहार भूकंप को वहां के समाज द्वारा बरते जाने वाले छुआछूत से जोड़ दिया।

यह आलेख इस पत्रिका का कोई व्यवस्थित अध्ययन नहीं है। यह सिर्फ एक परिचय है। इसके प्रभाव, विषय वस्तु और यहां दिखी खुद गांधी की सोच को लेकर गंभीर अध्ययन होना चाहिए। जाति व्यवस्था और दलित सवालों पर गांधी की राय और उनके आंदोलन के सम्यक मूल्यांकन के लिए यह एक न्यूनतम जरूरत है। और जरूरी नहीं है कि इसे अकादमिक जगत के लोग या गाँधीवादी जमात के लोग ही करें। बेहतर हो कि गांधी की आलोचना करने वाला जमात इसे पढ़-समझकर, इसकी सही चीर-फाड़ करके गांधी की आलोचना करे या ठीक लगे तो उनके बारे में अनर्गल बातें बंद करे। 

Tags:    

Similar News