चुनाव आयोग में हलचल : मुख्य मुद्दों पर नज़र रखनी ज़रूरी

भारत के चुनाव आयोग में मतभेदों को लेकर हुए चौंकाने वाले खुलासों ने इसकी विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं;

By :  Deshbandhu
Update: 2026-10-03 02:13 GMT
  • डॉ. परकाला प्रभाकर

चल रही एसआईआर प्रक्रिया का मक़सद सिर्फ़ किसी खास पार्टी को चुनाव जिताना नहीं है बल्कि यह एक बहुत गहरी साज़िश की ओर इशारा करती है- देश में अपनी पसंद का वोटर बेस तैयार करना। इसका मकसद भारत को एक ऐसे गणतंत्र में बदलना है जहां आबादी का सिर्फ़ कुछ ही हिस्सा राजनीतिक रूप से अहम रहे। ये हिस्से गैर-अल्पसंख्यक, गैर-दलित, गैर-आदिवासी और गैर-हाशिए पर रहने वाले समुदायों के होंगे।

भारत के चुनाव आयोग में मतभेदों को लेकर हुए चौंकाने वाले खुलासों ने इसकी विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मीडिया में छपी खबरों के मुताबिक पिछले चार महीनों में चुनाव आयोग के सभी सदस्य एक साथ कभी नहीं मिले और दो चुनाव आयुक्तों की असहमति और आपत्तियों वाली 14 टिप्पणियों पर न तो कोई ध्यान दिया गया और न ही उनका जवाब। इन बातों ने आयोग, खासकर मुख्य चुनाव आयुक्त के काम करने के तरीके को सवालों के घेरे में ला खड़ा किया है। आयोग की दो प्रेस विज्ञप्तियों ने स्थिति को स्पष्ट करने और लोगों का भरोसा जीतने की बजाय, आयोग के अस्पष्ट काम-काज को लेकर जनता के शक को और गहरा दिया है। इन प्रेस विज्ञप्तियों में मीडिया रिपोर्टों में किए दावों को गलत साबित करने के लिए कोई दस्तावेज़ पेश नहीं किया गया।

विपक्षी दलों के साथ-साथ कई नागरिकों, सामाजिक संगठनों और कार्यकर्ताओं ने 'स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न' (एसआईआर) को लागू करने में बरती गई अनियमितताओं पर तीखे सवाल उठाए हैं। वे मुख्य चुनाव आयुक्त पर महाभियोग चलाने की मांग भी कर रहे हैं। एसआईआर को रद्द करने और मतदाता सूची से हटाए गए सभी नामों को वापस जोड़ने की ज़ोरदार मांगें उठ रही हैं।

इस समय सार्वजनिक चर्चाओं में चुनाव आयोग के काम-काज और एसआईआर लागू करने में मुख्य चुनाव आयुक्त के आचरण के विश्लेषण, बातचीत, बहस और चर्चाओं की बाढ़ सी आ गई है। हालांकि कुछ बुनियादी मुद्दे और सवाल हैं जिन्हें सार्वजनिक चर्चा में छाई मौजूदा बातों से अलग करके देखना ज़रूरी है। ऐसा इसलिए क्योंकि मौजूदा शोर में वे बुनियादी मुद्दे दब सकते हैं। यह भी हो सकता है कि वे देश की लोकतांत्रिक चर्चा के केंद्र से गायब ही हो जाएं।

आइए, कुछ 'क्या होता अगर' वाले सवालों से शुरुआत करते हैं। क्या होता अगर दो चुनाव आयुक्तों ने असहमति या आपत्ति के नोट न लिखे होते? क्या होता अगर एसआईआर (सिस्टमैटिक वोटर्स लिस्ट अपडेशन) के तरीके को लेकर दोनों चुनाव आयुक्त, मुख्य चुनाव आयुक्त और आयोग के आईटी विभाग के प्रमुख की राय एक जैसी होती? क्या होता अगर इस प्रक्रिया में सुनवाई के लिए कुछ हाई-प्रोफाइल लोगों को न बुलाया जाता और नाम हटाने और सुनवाई का निशाना सिफ़र् कमज़ोर आवाज़ वाले अल्पसंख्यक, आदिवासी, दलित, हाशिए पर रहने वाले दिहाड़ी मज़दूर और महिलाएं ही बनतीं? क्या होता अगर पश्चिम बंगाल में 16 लाख वोटरों के नाम हटाने के लिए 'फॉर्म 7' भरने का फ़ैसला दोनों चुनाव आयुक्तों को जानकारी में रखकर और उनकी सहमति से लिया जाता? क्या इन सब बातों से एसआईआर की प्रक्रिया स्वीकार्य हो जाती?

जांच पर मिली प्रतिक्रियाओं में हमें ऐसी बातें भी मिलती हैं जिनमें कहा गया है कि, 'एसआईआर की प्रक्रिया तो अच्छी थी, लेकिन उसे ठीक से लागू नहीं किया गया।' चुनाव आयोग ने भी अपना बचाव करने के लिए इसी बात का सहारा लिया। आयोग ने इस बात पर ज़ोर दिया कि इस प्रक्रिया को लागू करने के फै़सले पर सभी आयुक्त एकमत थे। लेकिन इस विवाद से जुड़ी सार्वजनिक चर्चा और आयोग के जवाब में एक बुनियादी सवाल का जवाब अब तक नहीं मिला है। 'सूचना का अधिकार' के तहत पूछे गए एक सवाल के जवाब में आयोग ने लिखित रूप में साफ़ कहा था कि एसआईआर करने का फै़सला आयोग में नहीं लिया गया था। आयोग ने अपने ही एक उच्चस्तरीय अधिकारी के उस जवाब से पल्ला झाड़ने के लिए कुछ नहीं कहा है।

इस चर्चा की ज़रूरी बात एसआईआर को लागू करने के तरीके के बारे में नहीं बल्कि इस बात पर होनी चाहिए कि यह हकीक़त में भारत के राजनीतिक समाज की प्रकृति पर क्या असर डालेगा? बड़े पैमाने पर, विशेषकर मताधिकार से वंचित करने की उस प्रक्रिया को हमें नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए जिससे भारतीयों के दो वर्ग बन जाएंगे- एक जिनके पास वोट देने का अधिकार होगा और दूसरे जिनके पास यह नहीं होगा। यह गंभीर चिंता का विषय होना चाहिए कि एसआईआर के कारण वोटर लिस्ट से 14 करोड़ लोगों के नाम हटा दिए जाएंगे जिसकी वजह वे देश में रहते हुए भी राजनीतिक प्रक्रिया में भाग लेने के अपने जायज़ अधिकार से वंचित हो जाएंगे। असल में यह उन्हें दूसरे दर्जे का भारतीय बना देता है।

मौजूदा चर्चा पर इस जांच रिपोर्ट के असर को देखते हुए हमें कम से कम पिछले आठ वर्षों (या उससे भी ज्यादा) में चुनाव कराने के तरीकों में हुई भारी अनियमितताओं को नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए। राजनीतिक रूप से अहम कुछ अनियमितताएं इस प्रकार हैं- अलग-अलग राज्यों में वोटिंग के चरणों का अतार्किक बंटवारा; आदर्श आचार संहिता को पक्षपातपूर्ण तरीके से लागू करना जिससे सत्ताधारी पार्टी के स्टार प्रचारकों को खुलकर नफ़रत भरे भाषण देने की छूट मिली, डाले गए वोटों के अंतिम प्रतिशत की घोषणा में बहुत ज़्यादा विलम्ब, वोटिंग के शुरुआती प्रतिशत और वोटिंग के अंतिम आंकड़ों की देर से हुई घोषणा के बीच अभूतपूर्व अंतर, 2024 के लोकसभा चुनावों और उसके बाद हुए राज्य विधानसभा चुनावों में बड़े पैमाने पर संदिग्ध और फर्जी वोट डाले जाने की आशंका, वोटिंग के बाद घोषित डाले गए वोटों की संख्या और 2024 के लोकसभा चुनाव की गिनती के दौरान इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों से मिले वोटों की संख्या के बीच भारी अंतर (दूसरे शब्दों में, फॉर्म 17सी और फॉर्म 20 के आंकड़ों के बीच अंतर); यह तथ्य कि वोटिंग के सातवें और अंतिम चरण के वोटों का अंतिम प्रतिशत लोकसभा चुनाव के नतीजे घोषित होने और विजेताओं के नाम घोषित होने के बाद बताया गया और कुछ राज्यों में विधानसभा चुनावों से ठीक पहले वोटरों की संख्या में असामान्य और बिना किसी स्पष्ट कारण के बढ़ोतरी।

इन सभी गड़बड़ियों के बावजूद हमें अभी तक कमीशन के अंदर किसी मतभेद के बारे में पता नहीं चला है। बेशक, हम इसकी संभावना से इनकार नहीं कर सकते। ऐसा हो सकता है लेकिन यह बात अभी तक सामने नहीं आई है। जब तक कुछ पता नहीं चलता, हमें यही मानकर चलना होगा कि कमीशन के सभी सदस्य एक ही राय रखते थे।

चल रही एसआईआर प्रक्रिया का मक़सद सिर्फ़ किसी खास पार्टी को चुनाव जिताना नहीं है बल्कि यह एक बहुत गहरी साज़िश की ओर इशारा करती है- देश में अपनी पसंद का वोटर बेस तैयार करना। इसका मकसद भारत को एक ऐसे गणतंत्र में बदलना है जहां आबादी का सिर्फ़ कुछ ही हिस्सा राजनीतिक रूप से अहम रहे। ये हिस्से गैर-अल्पसंख्यक, गैर-दलित, गैर-आदिवासी और गैर-हाशिए पर रहने वाले समुदायों के होंगे। अल्पसंख्यकों, आदिवासियों, दलितों और हाशिए पर रहने वाले अन्य समुदायों के वोटिंग अधिकार छिन जाने के बाद राजनीतिक रूप से अहम समुदाय मुख्य रूप से सवर्ण हिंदू होंगे। जो अल्पसंख्यक, आदिवासी, दलित और हाशिए पर रहने वाले लोग बचेंगे भी, वे चुनावी लिहाज़ से बेअसर होंगे। दूसरे शब्दों में, एसआईआर भारत को एक हिंदू-यानी सवर्ण हिंदू- राज्य एवं सवर्ण हिंदू राष्ट्र में बदलने का एक गहरा प्रोजेक्ट है। एसआईआर का विरोध और इसे रद्द करने की मांग इसी समझ पर आधारित होनी चाहिए, न कि सिर्फ़ इसके लागू करने में हुई गड़बड़ियों के आधार पर।

(लेखक प्रसिद्ध अर्थशास्त्री व राजनीतिक विश्लेषक हैं। सिंडिकेट:द बिलियन प्रेस)

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