ललित सुरजन की कलम से पिंक : एक उत्तर-आधुनिक फिल्म
'हर समाज आज की तारीख में कुछेक परंपराओं, प्रथाओं और रीतियों से संचालित हो रहा है।;
'हर समाज आज की तारीख में कुछेक परंपराओं, प्रथाओं और रीतियों से संचालित हो रहा है। यहां आज से आशय एक दिन से नहीं बल्कि एक कालखंड से है, जिसमें समाज अपरिवर्तनशील रहता है। ध्यान रखें कि परिवर्तन की रफ्तार लगातार बढ़ रही है।
'पिंक' फिल्म की व्याख्या करें तो स्पष्ट समझ आता है कि भारतीय समाज में वर्तमान में जो रीतियां और प्रथाएं विद्यमान हैं यह फिल्म उनको चुनौती देती है, तोड़ती है, परिवर्तन का आह्वान करती है और एक नई सोच को जन्म देती है। इस फिल्म का अंत जिस बिन्दु पर होता है वह आज के भारतीय समाज को स्वीकार नहीं है। इसमें परिवर्तन की जो आहट है वह आज की सामान्य बुद्धि और सामूहिक कल्पना से परे है।
आज के समाज में औरत की जो दुर्दशा है वह किसी से छिपी हुई नहीं है। उसे कदम-कदम पर निंदा, प्रताडऩा और धिक्कार का सामना करना पड़ रहा है। उसे पुरुष के सामने झुक जाना चाहिए, अगर नहीं तो सजा भुगतने के लिए तैयार रहना चाहिए। उस पर जो अनकथ अत्याचार जो हो रहे हैं उनके बारे में कुछ कहूं तो दोहराना ही होगा।'
(देशबंधु अवकाश अंक में 15 जनवरी 2017 को प्रकाशित)
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