आदिवासी स्कूल : बड़े बजट की बचकानी उपलब्धियां
आदिवासी शिक्षा की सबसे बड़ी चुनौती शायद यही है कि यहां स्कूल सिर्फ पढ़ाई की जगह नहीं होती।;
- निमिषा सिंह
आदिवासी शिक्षा की सबसे बड़ी चुनौती शायद यही है कि यहां स्कूल सिर्फ पढ़ाई की जगह नहीं होती। दूरदराज के गांवों में रहने वाले बच्चे के लिए वही छात्रावास है, वही भोजन की व्यवस्था है, वही स्वास्थ्य की पहली निगरानी है और कई बार वही घर से बाहर सुरक्षित ठिकाना भी है। इसलिए किसी आदिवासी स्कूल की खराब छत केवल निर्माण की समस्या नहीं है। पानी की कमी सिर्फ एक सुविधा का अभाव नहीं है।
गढ़चिरौली के जंगलों के बीच किसी आदिवासी स्कूल की जर्जर दीवार, पानी के लिए इंतजार करते बच्चे, छात्रावास में सुरक्षा की चिंता और पढ़ाई के बीच बिजली या बुनियादी सुविधाओं का अभाव की तस्वीरें किसी एक जिले या एक राज्य की कहानी नहीं हैं। देश में आदिवासी बच्चों की शिक्षा के लिए योजनाएं हैं, अलग बजट है, आवासीय स्कू लों का बड़ा नेटवर्क है और छात्रवृत्तियों की व्यवस्था भी है। फिर भी सवाल वहीं खड़ा है-इन सबका वास्तविक असर उस बच्चे तक कितना पहुंच रहा है, जो अपने गांव से कई किलोमीटर दूर पढ़ने आया है।
सितंबर में महाराष्ट्र के गढ़चिरौली से शुरू हुई 'आदिवासी स्कूल ठीक करो' जैसी एक हालिया जमीनी पहल ने इसी पुराने सवाल को फिर सामने ला दिया है। स्कूलों की इमारत, पानी, बिजली, शौचालय, छात्रावास, शिक्षकों और बच्चों की सुरक्षा को लेकर जब जमीन पर सवाल उठते हैं तो बात किसी एक स्कूल की नहीं रह जाती। तब सवाल पूरे आदिवासी शिक्षा तंत्र की पड़ताल का हो जाता है।
सरकारी आंकड़े बताते हैं कि आदिवासी शिक्षा पर संसाधनों की कमी की तस्वीर इतनी सीधी भी नहीं है। 2026-27 में 'जनजातीय कार्य मंत्रालय' ने 'एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालयों' (ईएमआरएस) के लिए 7,200 करोड़ रुपये का प्रावधान किया है, लेकिन इसी सरकारी वित्तीय विवरण में अभी तक 2,070 करोड़ रुपये की स्वीकृति दर्ज है। यह फर्क महत्वपूर्ण है। बजट में राशि रख देना, राशि स्वीकृत होना और उसका जमीन पर खर्च हो जाना- तीनों अलग-अलग चरण हैं। सरकारी डैशबोर्ड के अनुसार देश में 728 'ईएमआरएस' स्वीकृत हैं। इनमें 511 कार्यरत और 217 गैर-कार्यरत हैं। कार्यरत विद्यालयों में 1,71,229 विद्यार्थी दर्ज हैं और कुल स्टाफ की संख्या 14,263 है, जिसमें 9,673 शिक्षण और 4,590 गैर-शिक्षण कर्मचारी हैं। यानी विस्तार बड़ा है, लेकिन स्वीकृत और वास्तव में चल रहे स्कूलों के बीच अभी भी अंतर बना हुआ है।
यह अंतर केवल इमारत खड़ी करने का मामला नहीं है। स्कूल शुरू होने के बाद उसका रखरखाव, शिक्षकों की उपलब्धता, छात्रावास, भोजन, स्वास्थ्य, सुरक्षा, इंटरनेट, किताबें और बच्चों के लिए जरूरी सुविधाएं लगातार खर्च मांगती हैं। यही कारण है कि 'ईएमआरएस' में मरम्मत और अनुरक्षण, छात्रावास अधीक्षकों, सीसीटीवी, इंटरनेट, अतिथि शिक्षकों और अन्य मानव संसाधन से जुड़े प्रावधानों पर भी ध्यान देना पड़ा है। आदिवासी आवासीय शिक्षा में केवल भवन बनाना पर्याप्त नहीं है; उसे लगातार और सुरक्षित ढंग से चलाने की व्यवस्था उतनी ही महत्वपूर्ण है।
दूसरी ओर, आदिवासी बच्चों की शिक्षा केवल 'ईएमआरएस' तक सीमित नहीं है। देश के अलग-अलग राज्यों में 'आश्रम स्कूल' और अन्य आवासीय विद्यालय भी बड़ी संख्या में बच्चों को शिक्षा देते हैं। सरकारी दस्तावेजों में 'आश्रम स्कूलों' की बुनियादी सुविधाओं को लेकर कई समस्याएं दर्ज की गई हैं- शौचालयों और स्नानघरों की कमी, सुरक्षित पेयजल की समस्या, बिजली की अनियमित आपूर्ति, जर्जर ढांचा, छात्रावासों में भीड़ और कुछ जगहों पर डेस्क-बेंच जैसी बुनियादी सुविधाओं का अभाव। कई जगह विद्यार्थियों की संख्या बढ़ी, लेकिन उसके अनुरूप आधारभूत ढांचा नहीं बढ़ पाया।
महाराष्ट्र का ताजा अनुभव इस समस्या को और गंभीर बनाता है। राज्य के 'जनजातीय विकास विभाग' के अधिकारियों के अनुसार 2024- 25 और 2025 - 26 में सरकारी तथा सहायता प्राप्त 'आश्रम स्कूलों' से जुड़े 584 विद्यार्थियों की मृत्यु दर्ज की गई। इनमें 384 मौतें सरकारी 'आश्रम स्कूलों' और 200 मौतें सहायता प्राप्त 'आश्रम स्कूलों' में दर्ज हुईं। राज्य में 500 सरकारी और 513 सहायता प्राप्त 'आश्रम स्कूल' हैं। मौतों के कारण अलग-अलग बताए गए हैं, जिनमें बीमारी, सिकलसेल, दुर्घटना, सर्पदंश और आत्महत्या शामिल हैं। गढ़चिरौली के एक सहायता प्राप्त आदिवासी आवासीय स्कूल के छात्रावास में अगस्त में सर्पदंश से तीन छात्राओं की मौत और तीन अन्य के घायल होने की घटना ने इस सवाल को और तीखा कर दिया। ऐसी घटनाओं के बाद जांच और कार्रवाई होती है, लेकिन असली कसौटी यह है कि अगली घटना रोकने के लिए व्यवस्था में कितना स्थायी बदलाव आता है।
पैसा भी इस सवाल का एक हिस्सा है। 2026-27 में अनुसूचित जनजाति विद्यार्थियों की पोस्ट-मैट्रिक छात्रवृत्ति के लिए 3,176.48 करोड़ रुपये और प्री-मैट्रिक छात्रवृत्ति के लिए 339.05 करोड़ रुपये का प्रावधान है। संविधान के अनुच्छेद 275(1) के तहत अनुदान के लिए 1,542 करोड़ रुपये का आवंटन रखा गया है। 'धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान' के लिए भी 2,013.46 करोड़ रुपये का प्रावधान है। ये रकम बताती है कि सरकारी योजनाओं का दायरा छोटा नहीं है, लेकिन सवाल यह है कि इनमें से कितना पैसा समय पर स्वीकृत हुआ, कितना जारी हुआ, कितना खर्च हुआ और उस खर्च से बच्चे की जिंदगी में क्या बदला?
आदिवासी शिक्षा की सबसे बड़ी चुनौती शायद यही है कि यहां स्कूल सिर्फ पढ़ाई की जगह नहीं होती। दूरदराज के गांवों में रहने वाले बच्चे के लिए वही छात्रावास है, वही भोजन की व्यवस्था है, वही स्वास्थ्य की पहली निगरानी है और कई बार वही घर से बाहर सुरक्षित ठिकाना भी है। इसलिए किसी आदिवासी स्कूल की खराब छत केवल निर्माण की समस्या नहीं है। पानी की कमी सिर्फ एक सुविधा का अभाव नहीं है। शिक्षक की कमी केवल एक खाली पद नहीं है। इन सबका सीधा असर बच्चे की पढ़ाई, उपस्थिति, स्वास्थ्य और स्कूल में टिके रहने पर पड़ता है।
सरकार की योजनाओं का उद्देश्य स्पष्ट है - दूरस्थ आदिवासी क्षेत्रों के बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराना और उन्हें आगे की पढ़ाई तथा रोजगार के अवसरों से जोड़ना। 'ईएमआरएस' की परिकल्पना भी इसी उद्देश्य से की गई थी, लेकिन किसी योजना की सफलता का पैमाना उसका बजट या स्वीकृत स्कूलों की संख्या भर नहीं हो सकता। असली सवाल यह है कि जिस बच्चे के नाम पर पैसा जारी हुआ, उसके स्कूल में शिक्षक है या नहीं, पानी आता है या नहीं, शौचालय सुरक्षित है या नहीं, छात्रावास रहने योग्य है या नहीं और बीमारी या दुर्घटना की स्थिति में मदद कितनी जल्दी पहुंचती है।
दूरदराज के इलाकों से आने वाले बच्चों के लिए स्कूल तक पहुंचना ही आसान नहीं होता। ऐसे में स्कूल में पानी, शौचालय, शिक्षक या सुरक्षित छात्रावास जैसी बुनियादी चीजें न मिलें, तो मुश्किल और बढ़ जाती है। आदिवासी बच्चे देश की शिक्षा व्यवस्था के किनारे खड़े बच्चे नहीं हैं। वे उसी व्यवस्था का हिस्सा हैं। इसलिए उनके स्कूलों के लिए जारी हर रुपया केवल सरकारी बजट की एक पंक्ति नहीं, बल्कि किसी बच्चे के भविष्य में लगाया गया सार्वजनिक निवेश है।
(लेखिका स्वतंत्र पत्रकार हैं।)