ललित सुरजन की कलम से सुई की नोंक, हल की मूठ
'वर्धा में सबसे अच्छी बात यह हुई कि दो दिवसीय कार्यक्रम का आरंभ नृतत्वशास्त्री प्रोफेसर नदीम हसनैन के बीज वक्तव्य के साथ हुआ।;
'वर्धा में सबसे अच्छी बात यह हुई कि दो दिवसीय कार्यक्रम का आरंभ नृतत्वशास्त्री प्रोफेसर नदीम हसनैन के बीज वक्तव्य के साथ हुआ। उनका व्याख्यान अत्यंत विचारोत्तेजक व सारगर्भित था। उन्होंने कहा कि सत्तातंत्र के लिए यह आंतरिक सुरक्षा का मुद्दा है तो आदिवासी समाज के लिए यह सामाजिक न्याय की लड़ाई है। दो सौ साल से चली आ रही औपनवेशिक मानसिकता आज भी बदली नहीं है; कल्याणकारी राज्य की छत्रछाया में ऋणग्रस्तता, शोषण व बेदखली बदस्तूर जारी हैं। उन्होंने एक लोकगीत का हवाला देते हुए कहा कि बाहरी लोग जब आए थे तो सुई की नोक की तरह पतले थे, वे अब हल की मूठ की तरह मोटे हो गए हैं। इसे साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत करते हुए उन्होंने कहा कि लोकगीत झूठ नहीं बोलते। प्रोफेसर हसनैन ने कहा कि अस्सी के दशक में वन कानूनों में परिवर्तन होना तो शुरू हुए, लेकिन उन पर अमल नहीं हुआ। विस्थापन आज के आदिवासियों के लिए सबसे बड़ी समस्या है और विकास एक डरावना सच। पनबिजली, अभ्यारण्य, रेलवे, कल-कारखाने आदि से कोई पांच करोड़ लोग विस्थापित हुए हैं, जिनमें से सिर्फ बीस प्रतिशत लोगों का पुर्नवास हो सका है, लेकिन सिर्फ पुर्नवास होने से बात नहीं बनती, विस्थापन से आदिवासी की रचनात्मक क्षमता समाप्त हो जाती है और परस्पर सहयोग का तंत्र बिखर जाता है।'
(देशबन्धु में 12 सितम्बर 2013 को प्रकाशित)
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