सब पर सवार राजनीति
हमारे समय की एक विडंबना है कि राजनीति, जो जीवन को बेहतर बनाने का माध्यम होनी चाहिए, धीरे-धीरे इस तरह हावी होती जा रही है कि जीवन के दूसरे महत्वपूर्ण पक्ष पीछे छूटने लगे हैं। हम किसे पसंद करते हैं;
- डॉ. दुर्गाप्रसाद अग्रवाल
राजनीति को हमारे जीवन में जगह मिलनी चाहिए, लेकिन इतनी नहीं कि वह जीवन की दूसरी सारी जगहों पर कब्जा कर ले। किसी राजनीतिक विचार का उद्देश्य हमारे जीवन को बेहतर बनाने में योगदान देना होना चाहिए। यदि उस विचार पर बने दल के प्रति हमारी निष्ठा ही हमारे जीवन को कटु, संकीर्ण और संबंधों को तोड़ने वाला बना दे, तो हमें अपनी निष्ठा के स्वरूप पर विचार करना चाहिए।
हमारे समय की एक विडंबना है कि राजनीति, जो जीवन को बेहतर बनाने का माध्यम होनी चाहिए, धीरे-धीरे इस तरह हावी होती जा रही है कि जीवन के दूसरे महत्वपूर्ण पक्ष पीछे छूटने लगे हैं। हम किसे पसंद करते हैं, किससे मित्रता रखते हैं, किसके साथ बैठते-उठते हैं, यहां तक कि अपने परिवार में किससे आत्मीयता रखते हैं, इन सब पर हमारी राजनीतिक पसंद-नापसंद का असर दिखाई देने लगा है। विचारों की असहमति अब केवल विचारों की असहमति नहीं रह गई है, कई बार वह संबंधों में कटुता और स्थायी दूरी का कारण बन जाती है। सवाल यह है कि क्या हमें अपनी ज़िंदगी में राजनीति को इतना बड़ा बन जाने देना चाहिए कि उसके सामने सारे रिश्ते-नाते बौने हो जाएं?
लोकतंत्र में राजनीति का महत्व निर्विवाद है। हमारी सरकारें कैसे काम करती हैं, देश की अर्थव्यवस्था किस दिशा में जाती है, शिक्षा और स्वास्थ्य की सुविधाएं कैसी होंगी, रोजगार के अवसर कितने होंगे, नागरिकों को कितनी स्वतंत्रता मिलेगी, इन सबका संबंध राजनीति से है। सच तो यह है कि राजनीति से कुछ भी अछूता नहीं है। इसलिए राजनीतिक घटनाओं में रुचि लेना, सरकारों के कामकाज पर नजर रखना, दलों की नीतियों का मूल्यांकन करना और चुनाव में अपनी पसंद के उम्मीदवार को वोट देना एक जागरूक नागरिक के दायित्व हैं, लेकिन राजनीति में रुचि लेने और राजनीति को अपने समूचे व्यक्तित्व पर हावी कर लेने में फर्क है। दुर्भाग्य से, हमारे यहां यह फर्क मिटता हुआ दिखाई देता है।
दरअसल, समस्या राजनीति में नहीं, राजनीति के प्रति हमारे व्यवहार में है। हम किसी दल की नीतियों से सहमत हो सकते हैं, उसके नेतृत्व पर भरोसा कर सकते हैं और उसके चुनावी वादों को अपने लिए बेहतर मान सकते हैं। कठिनाई तब शुरू होती है, जब हमारा यह विश्वास अंधविश्वास में बदल जाता है। तब अपने दल का हर निर्णय उचित दिखाई देने लगता है और विरोधी दल का हर कदम ग़लत। यह कैसी कसौटी है, जिसमें सही और गलत का फैसला किसी काम की प्रकृति से नहीं, उसे करने वाले दल की पहचान से होता है? क्या भ्रष्टाचार, अन्याय, असंवेदनशीलता और अवसरवादिता का कोई राजनीतिक रंग होता है?
लोकतांत्रिक विवेक की पहली शर्त है कि हम अपने प्रिय राजनीतिक पक्ष को भी प्रश्नों के घेरे में रखने का साहस रखें। राजनीतिक निष्ठा का अर्थ अपनी बुद्धि और विवेक को गिरवी रख देना नहीं है। किसी दल का समर्थक होने का यह मतलब नहीं कि उसके हर निर्णय का समर्थन करना हमारी बाध्यता है, बल्कि वास्तविक निष्ठा तो यह मांग करती है कि हम अपने पक्ष की कमियों को पहचानें और उन्हें सुधारने की अपेक्षा करें। जो व्यक्ति अपने दल की गलतियों पर भी सवाल नहीं उठा सकता, वह नागरिक की भूमिका से बाहर निकलकर प्रचारक की भूमिका में पहुंच जाता है।
इसका दूसरा पहलू भी है। हम अपने राजनीतिक विरोधियों को अक्सर उनके विचारों के आधार पर नहीं, बल्कि उनके बारे में पहले से बनी धारणाओं के आधार पर देखने लगते हैं। हम पहले से तय कर लेते हैं कि अमुक दल का समर्थक संकीर्ण सोच वाला है, अमुक दल का समर्थक देशहित नहीं समझता या अमुक विचारधारा से सहमत व्यक्ति से किसी विवेकपूर्ण बातचीत की अपेक्षा ही नहीं की जा सकती। यह प्रवृत्ति संवाद के दरवाजे बंद करती है। धीरे-धीरे हमारा अपना विचार-जगत एक बंद कमरे में बदल जाता है, जहां हमें अपनी मान्यताओं की पुष्टि तो लगातार मिलती रहती है, लेकिन उन्हें परखने का अवसर नहीं मिलता।
सोशल मीडिया ने इस प्रवृत्ति को तीव्र किया है। वहां राजनीतिक विचार केवल व्यक्त नहीं किए जाते, उनका प्रदर्शन भी होता है। हम कोई टिप्पणी करते हैं, किसी पोस्ट को साझा करते हैं या किसी नेता के पक्ष में कोई संदेश आगे बढ़ाते हैं, तो कई बार हमारा उद्देश्य सूचना देना या विचार-विमर्श करना नहीं, अपने राजनीतिक खेमे के प्रति अपनी निष्ठा प्रदर्शित करना होता है। दूसरी ओर, विरोधी विचार सामने आते ही उन्हें पढ़ने-समझने के बजाय उन पर व्यंग्य, आक्षेप और अपमानजनक टिप्पणियां शुरू हो जाती हैं। तर्क की जगह तंज और असहमति की जगह अवमानना आ जाती है।
ऐसे में समाज भी धीरे-धीरे ऐसे खेमों में बंटने लगता है, जिनके बीच संवाद की संभावना कम होती जाती है। लोकतंत्र में विपक्ष का अस्तित्व केवल सरकार बदलने की संभावना बनाए रखने के लिए नहीं है। उसका काम सरकार से सवाल पूछना और उसके निर्णयों की जांच करना भी है। इसी तरह, सत्तापक्ष के समर्थकों को भी यह समझना चाहिए कि सरकार से प्रश्न पूछना या उसकी आलोचना करना अपने आप में राष्ट्रविरोध या शत्रुता का प्रमाण नहीं है। किसी सरकार, दल या नेता की आलोचना और देश, समाज अथवा लोकतंत्र के प्रति प्रतिबद्धता एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं।
राजनीति को जीवन का एकमात्र आधार बना लेने से हम जीवन के दूसरे सुखों और सरोकारों से भी दूर होने लगते हैं। साहित्य, संगीत, कला, खेल, प्रकृति, मित्रता और पारिवारिक आत्मीयता का अपना स्वतंत्र संसार है। इनका आनंद लेने के लिए जरूरी नहीं कि हम एक ही राजनीतिक विचारधारा से सहमत हों। किसी कविता की सुंदरता, संगीत की मधुरता या किसी मित्र की संवेदनशीलता का मूल्यांकन उसकी राजनीतिक पसंद के आधार पर नहीं किया जाना चाहिए। यदि हम अपने आसपास के प्रत्येक व्यक्ति को केवल उसके राजनीतिक विचारों से पहचानने लगेंगे तो मनुष्य के व्यक्तित्व की विशाल विविधता को बहुत छोटे दायरे में कैद कर देंगे।
लोकतंत्र उस व्यक्ति के अधिकारों और स्वतंत्रता का सम्मान करना भी है, जो हमसे असहमत है। यदि हम चाहते हैं कि हमारे विचारों को सुना जाए, तो हमें दूसरों के विचार सुनने का धैर्य भी विकसित करना होगा। इसका अर्थ यह नहीं कि हर मतभेद पर चुप रहा जाए या हर विचार को बिना जांचे स्वीकार कर लिया जाए। कुछ प्रश्न इतने महत्वपूर्ण होते हैं कि उन पर स्पष्ट और दृढ़ पक्ष लेना जरूरी होता है। अन्याय, हिंसा, भेदभाव और नागरिक अधिकारों के उल्लंघन पर मौन रहना विवेकशीलता नहीं है, लेकिन किसी विचार का विरोध करने और उस विचार को रखने वाले प्रत्येक व्यक्ति से घृणा करने के बीच अंतर है। हमें अपने तर्क को मजबूत बनाना चाहिए, अपनी भाषा को अधिक संयमित और अपने व्यवहार को अधिक मानवीय। असहमति में दृढ़ता और संबंधों में आत्मीयता एक साथ संभव है।
राजनीति को हमारे जीवन में जगह मिलनी चाहिए, लेकिन इतनी नहीं कि वह जीवन की दूसरी सारी जगहों पर कब्जा कर ले। किसी राजनीतिक विचार का उद्देश्य हमारे जीवन को बेहतर बनाने में योगदान देना होना चाहिए। यदि उस विचार पर बने दल के प्रति हमारी निष्ठा ही हमारे जीवन को कटु, संकीर्ण और संबंधों को तोड़ने वाला बना दे, तो हमें अपनी निष्ठा के स्वरूप पर विचार करना चाहिए। राजनीति महत्वपूर्ण है, लेकिन उससे भी महत्वपूर्ण है वह मनुष्य, जिसके जीवन को बेहतर बनाने के लिए राजनीति की जरूरत पड़ती है। राजनीति हमारे जीवन का हिस्सा है, पूरा जीवन नहीं। इस छोटे-से अंतर को समझ लेना शायद हमारे लोकतंत्र और हमारे आपसी संबंधों, दोनों के लिए एक बड़ी उपलब्धि होगी।
(वरिष्ठ लेखक और स्तंभकार हैं।)