महंगाई पर नियंत्रण और आर्थिक विकास की चुनौती
अर्थव्यवस्था की चर्चा होते ही महंगाई, ब्याज दर, जीडीपी, राजकोषीय घाटा और आर्थिक विकास जैसे शब्द सामने आने लगते हैं;
- अरुण कुमार डनायक
भारत जैसे ऊर्जा आयात पर निर्भर देश में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों और रुपये के मूल्य में उतार-चढ़ाव से आयात लागत तथा महंगाई प्रभावित होती है। इस निर्भरता को कम करने के लिए ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों को बढ़ावा देना और निर्यात क्षमता को मजबूत करना आवश्यक है। आर्थिक नीतियों की प्रभावशीलता के लिए सरकार, रिजर्व बैंक और वाणिज्यिक बैंकों के बीच समन्वय तथा कारोबारियों का विश्वास महत्वपूर्ण है।
अर्थव्यवस्था की चर्चा होते ही महंगाई, ब्याज दर, जीडीपी, राजकोषीय घाटा और आर्थिक विकास जैसे शब्द सामने आने लगते हैं। सरकार और रिज़र्व बैंक अपनी राजकोषीय व मौद्रिक नीतियों के माध्यम से आर्थिक गतिविधियों और महंगाई को प्रभावित करते हैं। इन निर्णयों का आम नागरिक पर क्या प्रभाव पड़ता है? महंगाई बढ़ने पर ब्याज दरें क्यों बढ़ाई जाती हैं और क्या केवल मौद्रिक उपायों से महंगाई नियंत्रित हो सकती है? ये प्रश्न आर्थिक नीतियों के आकलन में सहायक हैं।
अर्थव्यवस्था किसानों, श्रमिकों, उद्यमियों, व्यापारियों और निवेशकों के निर्णयों से संचालित होती है। लोग कितना खर्च, बचत और निवेश करेंगे तथा सरकार किन क्षेत्रों पर व्यय करेगी, इन सबका प्रभाव आर्थिक गतिविधियों पर पड़ता है। सरकार और केंद्रीय बैंक की नीतियों का उद्देश्य महंगाई पर नियंत्रण, निवेश और रोजगार को प्रोत्साहन तथा टिकाऊ विकास सुनिश्चित करना है।
महंगाई का अर्थ वस्तुओं और सेवाओं के सामान्य मूल्य स्तर में लगातार वृद्धि होना है। जब खाद्य सामग्री और रोजमर्रा की वस्तुओं तथा सेवाओं की कीमतें आमदनी की तुलना में तेज़ी से बढ़ती हैं, तो लोगों की वास्तविक क्रयशक्ति घट जाती है। महंगाई की दर में गिरावट का अर्थ कीमतों का कम होना नहीं, बल्कि उनके बढ़ने की गति धीमी पड़ना है; इसलिए इससे आम लोगों को वास्तविक राहत मिलना जरूरी नहीं है।
महंगाई कई कारणों से बढ़ सकती है। कभी बढ़ती मांग कीमतों पर दबाव डालती है, तो कभी पेट्रोलियम, ऊर्जा, परिवहन, मजदूरी और कच्चे माल की बढ़ती लागत उत्पादन को महंगा बना देती है। सूखा, बाढ़, युद्ध और वैश्विक आपूर्ति व्यवधान भी कीमतें बढ़ा सकते हैं। इसलिए महंगाई को किसी एक कारण या केवल सरकारी नीतियों का परिणाम मानना उचित नहीं है।
महंगाई का प्रसार तब चिंता का विषय बनता है, जब मूल्य-वृद्धि कुछ वस्तुओं तक सीमित न रहकर अर्थव्यवस्था के व्यापक हिस्से में फैलने लगती है। महंगाई के प्रभाव को समझने के लिए अर्थशास्त्री उपभोक्ता मूल्य सूचकांक के माध्यम से विभिन्न वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों में होने वाले बदलाव का आकलन करते हैं।
महंगाई को नियंत्रित करने में भारतीय रिजर्व बैंक की केंद्रीय भूमिका होती है। उसका प्रमुख साधन रेपो दर है, जिसके माध्यम से वह बैंकों के लिए धन की लागत को प्रभावित करता है। रेपो दर बढ़ने पर व्यक्तिगत ऋणों की ईएमआई बढ़ सकती है और कारोबार के लिए ऋण महंगा हो सकता है। इससे परिवारों और कंपनियों के खर्च तथा निवेश में कमी आ सकती है, जिससे महंगाई नियंत्रित करने में मदद मिलती है। ब्याज दरों का प्रभाव सभी पर एक समान और तत्काल नहीं पड़ता। ऋण महंगा होने से मांग घट सकती है, जबकि बचत और सावधि जमा पर मिलने वाला प्रतिफल बढ़ सकता है। फिर भी यदि महंगाई का प्रमुख कारण तेल, खाद्यान्न या अन्य वस्तुओं की आपूर्ति में कमी हो, तो केवल ब्याज दरें बढ़ाना पर्याप्त नहीं होता। ऐसी स्थिति में अत्यधिक सख्ती निवेश, रोजगार और आर्थिक विकास को भी प्रभावित कर सकती है।
रेपो दर के अलावा आरबीआई नकद आरक्षित अनुपात के माध्यम से बैंकों की जमा का वह हिस्सा निर्धारित करता है, जिसे नकदी के रूप में रखना अनिवार्य है। वैधानिक तरलता अनुपात के तहत बैंकों को जमा का एक निर्धारित हिस्सा नकदी, सोने और सरकारी प्रतिभूतियों के रूप में रखना होता है। खुले बाजार में सरकारी प्रतिभूतियों की खरीद-बिक्री से भी आरबीआई बैंकिंग प्रणाली में धन और ऋण प्रवाह को प्रभावित करता है। वह विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप कर रुपये की अस्थिरता कम करने का प्रयास भी करता है, हालांकि इससे वैश्विक तेल कीमतों या बाहरी आपूर्ति संकटों को नियंत्रित नहीं किया जा सकता।
मौद्रिक नीति की सफलता इस बात पर भी निर्भर करती है कि लोग और व्यवसाय भविष्य को कैसे देखते हैं। यदि उन्हें लगातार महंगाई बढ़ने की आशंका हो, तो वे अपने खर्च, वेतन और मूल्य निर्धारण संबंधी निर्णय उसी अनुसार लेने लगते हैं, जिससे महंगाई और बढ़ सकती है। इसके विपरीत, स्थिर कीमतों का विश्वास आर्थिक व्यवहार को संतुलित बनाता है। इसलिए रिजर्व बैंक के लिए स्पष्ट संवाद और नीतिगत विश्वसनीयता भी ब्याज दरों जितनी ही महत्वपूर्ण है।
आर्थिक सुस्ती के दौर में सरकार सार्वजनिक व्यय बढ़ाकर रोजगार, आय और मांग को प्रोत्साहन दे सकती है। इसके विपरीत, व्यापक महंगाई की स्थिति में वह करों, सरकारी व्यय और सब्सिडी में बदलाव करके मांग तथा कीमतों के दबाव को संतुलित करने का प्रयास करती है। आयकर में राहत से लोगों की उपलब्ध आय बढ़ सकती है, जबकि जीएसटी में कटौती से वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों में कमी आ सकती है। हालांकि, इन उपायों का वास्तविक लाभ इस बात पर निर्भर करता है कि राहत किस सीमा तक उपभोक्ताओं तक पहुंचती है। साथ ही, करों में कटौती से सरकारी राजस्व घट सकता है, इसलिए सरकार को आम लोगों को राहत देने और राजकोषीय घाटे को नियंत्रित रखने के बीच संतुलन बनाए रखना पड़ता है।
सरकारी खर्च विकास और जनकल्याण को प्रभावित करने वाला महत्वपूर्ण साधन है। बुनियादी ढांचे, कृषि, कौशल विकास और स्वास्थ्य पर निवेश से उत्पादकता, रोजगार और दीर्घकालीन विकास को बढ़ावा मिल सकता है। वहीं, कमजोर तबकों तक सामाजिक सहायता समय पर और पारदर्शी ढंग से पहुंचने से उनकी आर्थिक सुरक्षा मजबूत होती है।
महंगाई से निपटने के लिए सरकार अल्पकाल में आपूर्ति सुधारने हेतु सार्वजनिक भंडार से अनाज जारी करने, आयात सुगम बनाने, जमाखोरी पर रोक लगाने और राज्यों के साथ समन्वय जैसे कदम उठा सकती है। वहीं, दीर्घकाल में सिंचाई, भंडारण, शीतगृह, खाद्य प्रसंस्करण और आपूर्ति शृंखला में निवेश से उत्पादन और उपलब्धता बढ़ाकर मूल्य दबाव को स्थायी रूप से कम किया जा सकता है।
भारत जैसे ऊर्जा आयात पर निर्भर देश में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों और रुपये के मूल्य में उतार-चढ़ाव से आयात लागत तथा महंगाई प्रभावित होती है। इस निर्भरता को कम करने के लिए ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों को बढ़ावा देना और निर्यात क्षमता को मजबूत करना आवश्यक है।
आर्थिक नीतियों की प्रभावशीलता के लिए सरकार, रिजर्व बैंक और वाणिज्यिक बैंकों के बीच समन्वय तथा कारोबारियों का विश्वास महत्वपूर्ण है। वाणिज्यिक बैंक जमा और ऋण नीतियों के माध्यम से आर्थिक गतिविधियों को प्रभावित करते हैं। 'जीएसटी व्यवस्था को सरल बनाने, दंडात्मक प्रावधानों में उचित नरमी बरतने और कर अनुपालन को अधिक पारदर्शी बनाने जैसे कदम कारोबारी गतिविधियों को प्रोत्साहित कर सकते हैं। वर्तमान वैश्विक चुनौतियों के बीच केवल ब्याज दरों में बदलाव या कर राहत पर्याप्त नहीं है। महंगाई पर नियंत्रण, उत्पादक निवेश, रोजगार सृजन और कमजोर वर्गों की सुरक्षा के बीच संतुलन बनाने वाली समन्वित नीति ही व्यापक आर्थिक हितों की पूर्ति कर सकती है। अंतत: आर्थिक नीतियों की सफलता का आकलन आम नागरिक की क्रयशक्ति, रोजगार के अवसरों और जीवन-स्तर में सुधार से किया जाना चाहिए।
( लेखक स्टेट बैंक के सेवानिवृत सहायक महाप्रबंधक हैं)