बदलती विश्व व्यवस्था के बीच बढ़ते परमाणु खतरे
इज़रायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने वाशिंगटन को यह विश्वास दिलाया था कि ईरान कुछ ही दिनों में आत्मसमर्पण कर देगा।;
डॉ. अरुण मित्रा
इज़रायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने वाशिंगटन को यह विश्वास दिलाया था कि ईरान कुछ ही दिनों में आत्मसमर्पण कर देगा। इसी वजह से अमेरिका, ईरान के खिलाफ इज़रायल की आक्रामकता में शामिल हो गया। इससे संघर्ष और तेज़ हो गया। अपनी सैन्य श्रेष्ठता के बावजूद, अमेरिका को वह निर्णायक परिणाम नहीं मिला, जिसकी उसे और इज़रायल को उम्मीद थी।
पश्चिम एशिया में बढ़ता संघर्ष एक व्यापक युद्ध की संभावना को लेकर गंभीर चिंताएं पैदा कर रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने बार-बार ईरान को धमकियां दी हैं, और कई बार तो उसे पूरी तरह नष्ट करने की बात भी कही है। यह देखना बाकी है कि क्या ये बयान केवल दबाव बनाने के लिए हैं या फिर किसी बड़ी सैन्य कार्रवाई की शुरुआत हैं। हाल ही में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में मार्को रुबियो का बयान, जिसमें उन्होंने सीधे तौर पर ईरान को धमकी दी, अमेरिकी प्रशासन के अहंकार को दर्शाता है। ऐसी स्थिति में दुनिया लापरवाह नहीं रह सकती।
विभिन्न स्रोतों से मिल रही जानकारी के अनुसार, ईरान को अमेरिका और इज़रायल की ओर से एक नए हमले की आशंका है। उन्होंने चेतावनी दी है कि अगर इज़रायल परमाणु हथियारों का इस्तेमाल करता है, तो ईरान इज़रायल के परमाणु प्रतिष्ठानों को पूरी तरह नष्ट कर देगा, जो डिमोना शहर के दक्षिण-पूर्व में नेगेव रेगिस्तान में स्थित हैं। ब्राज़ीलियाई पत्रकार एमिलियो 'पेपे' एस्कोबार ने 'ट्रांज़िशन प्रोटोकॉल' नामक डिजिटल चैनल पर ज़ुल्फ़िकार अली के साथ एक साक्षात्कार में बताया कि ईरान ने लगभग 400 ठिकानों को चिह्नित कर लिया है, जिनमें खाड़ी क्षेत्र में स्थित अमेरिकी ठिकानों से लेकर हिंद महासागर तक के ठिकाने शामिल हैं। इस बीच, हेब्रोन के पास गोलीबारी की घटना के बाद इज़रायल द्वारा वेस्ट बैंक में लॉकडाउन लगाने की खबरें और अमेरिकी रक्षा सचिव पीट हेगसेथ की हालिया इज़रायल यात्रा भी गौर करने लायक हैं।
ईरान के प्रतिरोध ने अमेरिकी सैन्य शक्ति की सीमाओं को उजागर कर दिया है। होर्मुज़ जलडमरूमध्य से जहाजों की आवाजाही में रुकावट ने वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को बुरी तरह प्रभावित किया है और आर्थिक दबाव बढ़ा दिया है। डीज़ल सहित ईंधन की आपूर्ति में आ रही दिक्कतों ने वाशिंगटन की नीतियों के आर्थिक परिणामों पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
कहा जाता है कि इज़रायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने वाशिंगटन को यह विश्वास दिलाया था कि ईरान कुछ ही दिनों में आत्मसमर्पण कर देगा। इसी वजह से अमेरिका, ईरान के खिलाफ इज़रायल की आक्रामकता में शामिल हो गया। इससे संघर्ष और तेज़ हो गया। अपनी सैन्य श्रेष्ठता के बावजूद, अमेरिका को वह निर्णायक परिणाम नहीं मिला, जिसकी उसे और इज़रायल को उम्मीद थी।
खाड़ी देशों में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर ईरान के हमलों से भारी नुकसान हुआ है। ट्रम्प द्वारा ईरान के साथ बनी राजनयिक समझ को खत्म कर देने से शांति की संभावनाएं और कमज़ोर हो गई हैं। हूती विद्रोहियों द्वारा सऊदी अरब पर किए गए हमलों ने बाबअल-मंदेब जलडमरूमध्य और लाल सागर से होने वाले समुद्री व्यापार को बाधित किया है, जिसका सऊदी अरब पर गंभीर असर पड़ा है।
ब्रिक्स के उदय और चीन की 'बेल्ट एंड रोड' पहल - जिसमें विभिन्न महाद्वीपों के लगभग 150 देश शामिल हैं- से विश्व व्यवस्था में बदलाव के स्पष्ट संकेत मिल रहे हैं। अमेरिका और पूर्व औपनिवेशिक शक्तियां इस बदलाव को स्वीकार नहीं कर पा रही हैं। अमेरिका, विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के नियमों को दरकिनार करते हुए, अपनी मनमर्जी से विभिन्न देशों पर प्रतिबंध और शुल्क थोपकर दुनिया पर अपनी शर्तें थोपने की कोशिश कर रहा है।
मौजूदा भारतीय सरकार, अमेरिका के साथ बहुत करीबी संबंध रखना चाहती है, भले ही अमेरिका अपनी शर्तें थोपता हो। डोनाल्ड ट्रम्प ने कई बार भारत को यह कहकर अपमानित किया है कि अमेरिका के हस्तक्षेप के बाद ही भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध रुका था। वे उस 'विशेष मित्रताÓ की कोई परवाह नहीं करते, जिसका अक्सर भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जिक्र करते हैं।
इसी व्यापक भू-राजनीतिक संदर्भ में, अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो की भारत यात्रा महत्वपूर्ण हो जाती है। उनकी यात्रा की शुरुआत नई दिल्ली में औपचारिक बातचीत से होने के बजाय, मुंबई और जामनगर से हुई। इससे इस यात्रा के उद्देश्य और इसके आयोजन के तरीके पर सवाल खड़े हो गए हैं।
रिपोर्टों के अनुसार, रुबियो की मेजबानी उद्योगपति मुकेश अंबानी ने की। साथ ही, इस यात्रा के बारे में जानकारी भारतीय सरकार की ओर से कोई सार्वजनिक घोषणा होने के बजाय, अमेरिकी पक्ष से सामने आई। इतने वरिष्ठ अमेरिकी अधिकारी की यात्रा का आयोजन राष्ट्रीय राजधानी से बाहर क्यों किया गया? क्या भारतीय सरकार की प्राथमिकताओं और राजनयिक प्रोटोकॉल का उचित सम्मान किया गया?
ऐसे समय में जब भारत को बड़े विदेशी निवेश की जरूरत है, पेट्रोलियम रिफाइनिंग में निवेश और टेक्सास में एक संभावित प्लांट लगाने को लेकर हुई चर्चाओं की खबरों ने अटकलों को और बढ़ा दिया है। इन दावों की- कि अंबानी टेक्सास और वेनेजुएला में 300 अरब डॉलर का निवेश कर सकते हैं- स्वतंत्र पुष्टि और स्पष्टीकरण की आवश्यकता है। उतनी ही चिंताजनक यह खबर भी है कि अमेरिकी राजदूत सर्जियोगोर ने विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर से रुबियो से मिलने के लिए मुंबई जाने को कहा। यदि यह सच है, तो ये हालात राजनयिक प्रोटोकॉल और आपसी सम्मान को लेकर गंभीर सवाल खड़े करते हैं।
भारत-पाकिस्तान संघर्ष, व्यापार शुल्क और रूस से भारत द्वारा तेल खरीदने के मुद्दों पर राष्ट्रपति ट्रम्प के सार्वजनिक बयानों के बावजूद, मोदी सरकार वाशिंगटन के साथ अपने करीबी संबंध बनाए हुए है। भारत को अमेरिका की रणनीतिक प्राथमिकताओं को क्यों मानना चाहिए, जबकि अमेरिका हमेशा अपने हितों को ही सबसे ऊपर रखता है?
अमेरिका के इस वर्चस्ववादी रवैये ने पूरी दुनिया को अस्थिरता की ओर धकेल दिया है और हर तरफ सैन्य तनाव बढ़ा दिया है। परमाणु टकराव का खतरा इस मौजूदा स्थिति को विशेष रूप से चिंताजनक बनाता है। ईरान ने बार-बार परमाणु हथियार हासिल करने की कोशिश से इन्कार किया है, जबकि अमेरिका और इजरायल उसके परमाणु कार्यक्रम को सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा बताते रहे हैं। ऐसे दावों की जांच विश्वसनीय अंतरराष्ट्रीय सत्यापन और स्थापित अंतरराष्ट्रीय कानूनों के जरिए होनी चाहिए, न कि इनका इस्तेमाल एकतरफा सैन्य कार्रवाई के बहाने के रूप में किया जाना चाहिए।
इराक युद्ध एक गंभीर सबक देता है। 2003 में अमेरिका के नेतृत्व में हुए हमले को सही ठहराने के लिए 'जनसंहार के हथियारोंÓ का हवाला दिया गया था, लेकिन जिन हथियारों के जखीरे का मुख्य आधार के रूप में जिक्र किया गया था, वे कभी मिले ही नहीं। इराक और पूरे क्षेत्र पर पड़े विनाशकारी परिणाम यह दिखाते हैं कि विवादित दावों के आधार पर युद्ध छेड़ने के कितने खतरे हो सकते हैं।
संयुक्त राष्ट्र को स्थिति को और बिगड़ने से रोकने और अंतरराष्ट्रीय कानूनों का पालन सुनिश्चित करने के लिए अपने राजनयिक प्रयासों को तुरंत तेज करना चाहिए। उसे परमाणु हथियार संपन्न सभी देशों पर दबाव डालना चाहिए कि वे यह पक्का वादा करें कि वे चल रहे संघर्षों में परमाणु हथियारों का इस्तेमाल नहीं करेंगे।
परमाणु हथियारों का सीमित इस्तेमाल भी भारी जान-माल का नुकसान, पर्यावरण की तबाही, खाद्य असुरक्षा और स्वास्थ्य पर ऐसे दीर्घकालिक दुष्प्रभाव पैदा कर सकता है, जो इसमें शामिल देशों की सीमाओं से कहीं दूर तक फैल सकते हैं। एक बड़े पैमाने पर होने वाला परमाणु युद्ध तो पूरी मानव सभ्यता के अस्तित्व के लिए ही खतरा बन सकता है।
नेतृत्व की असली परीक्षा किसी दूसरे देश को डराने-धमकाने की क्षमता में नहीं, बल्कि युद्ध को रोकने और मानवता की रक्षा करने के दृढ़संकल्प में होती है। भारत को यह तय करना होगा कि क्या वह स्वतंत्र रूप से नई विश्व व्यवस्था को आकार देने में मदद करेगा या फिर अपनी विदेश नीति को किसी वर्चस्ववादी शक्ति के हिसाब-किताब से तय होने देगा।