तेज़ विकास के दावे के बीच समृद्धि कहां गायब है?

एक उबर ड्राइवर का कहना है कि वह पहले से ज़्यादा घंटे काम करता है फिर भी उसके हाथ में कम पैसे आते हैं;

Update: 2026-10-30 23:06 GMT

परिवारों की क्रय शक्ति (खरीदने की क्षमता) भी इसका एक कारण है। परिवार अपनी आर्थिक स्थिति का अंदाजा खाने-पीने के खर्च, किराए, स्कूल की फीस, स्वास्थ्य सेवाओं और आने-जाने के खर्चों से लगाते हैं। महंगाई दर कम होने का मतलब यह नहीं है कि पहले से बढ़ी हुई कीमतें कम हो गई हैं। अगर कमाई, बढ़ते खर्चों के साथ कदम नहीं मिला पाती तो कम महंगाई के दौर में भी लोगों को कोई खास राहत नहीं मिलती।

एक उबर ड्राइवर का कहना है कि वह पहले से ज़्यादा घंटे काम करता है फिर भी उसके हाथ में कम पैसे आते हैं। ईंधन, गाड़ी के रख-रखाव, लोन की किस्तों और प्लेटफॉर्म की कटौतियों के बाद उसके पास बहुत कम पैसे बचते हैं। उसके अनुभव से यह तय नहीं किया जा सकता कि पूरी अर्थव्यवस्था कैसा प्रदर्शन कर रही है लेकिन वह एक वाजिब सवाल पूछता है- अगर भारत तेज़ी से आगे बढ़ रहा है तो गुज़ारा करना मुश्किल क्यों होता जा रहा है? इससे एर्मा बॉमबेक की किताब का शीर्षक याद आता है : 'इफ़ लाइफ़ इज़ अ बाउल ऑफ़ चेरीज़, वॉट एम आई डूईंग इन द पिट्स?' अगर भारत तेज़ी से आगे बढ़ रहा है तो गुज़ारा करना मुश्किल क्यों होता जा रहा है?

अप्रैल-जून तिमाही में भारत की जीडीपी 7.8 प्रतिशत की दर से बढ़ी जो कि एक शानदार आंकड़ा है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, भारतीय रिज़र्व बैंक और अन्य एजेंसियों ने पूरे साल के लिए विकास के अनुमानों को बढ़ाया है। वैश्विक अनिश्चितता के बीच तेज़ विकास दर को बनाए रखना एक बड़ी उपलब्धि है। यह लेख 7.8 प्रतिशत के आंकड़े को लेकर चल रहे विवाद के बारे में नहीं है। हम इस आंकड़े को सही मान सकते हैं।

तो क्या यह निराशा बहुत ज़्यादा नकारात्मक सोच को दर्शाती है? समृद्धि के साथ उम्मीदें भी बढ़ती हैं। हर बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था में कुछ ऐसे व्यवसाय होते हैं जो संघर्ष कर रहे होते हैं और कुछ ऐसे नौकरी चाहने वाले होते हैं जो निराश होते हैं। कुछ लोगों से हुई बातचीत के आधार पर भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश की स्थिति का सही आकलन नहीं किया जा सकता।

फिर भी, बेचैनी के सबूत सिर्फ कुछ लोगों के अनुभवों तक सीमित नहीं हैं। रिजर्व बैंक के सितंबर महीने के 'शहरी उपभोक्ता विश्वास सर्वेक्षण' में वर्तमान स्थिति सूचकांक दर्ज किया गया। यह मार्च 2023 के बाद का सबसे निचला स्तर है और 100 के तटस्थ (न्यूट्रल) स्तर से भी नीचे है। सर्वेक्षण में शामिल लगभग 54.5 प्रति सैकड़ा लोगों का मानना था कि पिछले एक साल में आर्थिक स्थिति खराब हुई है, जबकि 25.3 फीसदी लोगों को लगा कि इसमें सुधार हुआ है।

ग्रामीण इलाकों से मिले जवाब भी काफी कुछ बताते हैं। केवल 20.6 प्रतिशत लोगों ने बताया कि उनकी आय एक साल पहले की तुलना में बढ़ी है, जबकि 30.5 फीसदी का कहना था कि उनकी आय में गिरावट आई है। इस तरह के नतीजे आम धारणाओं या राजनीतिक टिप्पणियों की तुलना में परिवारों की परेशानी को एक ठोस आधार देते हैं।

हालांकि आरबीआई के सर्वेक्षणों में व्यापक निराशावाद नहीं दिखता। शहरी परिवार आने वाले वर्ष को लेकर आशावादी बने रहे। इस प्रकार वर्तमान असंतोष सुधार की उम्मीदों के साथ-साथ मौजूद है। अर्थव्यवस्था को एक समान रूप से संकटग्रस्त बताना इस प्रमाण की अनदेखी करना होगा।

तेज़ जीडीपी वृद्धि और घरेलू चिंता के बीच कोई आवश्यक विरोधाभास नहीं है। जीडीपी अर्थव्यवस्था में उत्पादन को मापता है। यह स्थापित नहीं करता कि अतिरिक्त आय कितनी व्यापक रूप से वितरित है, क्या रोजगार सुरक्षित है या समान जीवन स्तर बनाए रखने के लिए किसी को कितना अधिक काम करना पड़ता है।

मान लीजिए कि एक करोड़पति एक कमरे में प्रवेश करता है। औसत संपत्ति तुरंत बढ़ जाती है हालांकि वहां पहले से मौजूद कोई भी व्यक्ति अमीर नहीं हो जाता। यहां तक कि प्रति व्यक्ति जीडीपी जो जनसंख्या के अनुसार उत्पादन को समायोजित करता है, यह नहीं बता सकता कि एक सामान्य परिवार पर क्या प्रभाव पड़ा है।

विकास की संरचना मायने रखती है। पूंजी-प्रधान गतिविधियां और विशिष्ट सेवाएं अपेक्षाकृत कम लोगों को प्रत्यक्ष रूप से रोजगार देते हुए भी पर्याप्त उत्पादन और आय उत्पन्न कर सकती हैं। कॉर्पोरेट लाभ मजदूरी की तुलना में कहीं अधिक तेज़ी से बढ़ सकते हैं और ऐसा वास्तव में हुआ है। इन गतिविधियों में केंद्रित विकास, विभिन्न व्यवसायों और कौशल स्तरों में प्रचुर मात्रा में रोजगार सृजित करने वाले विस्तार से अलग महसूस होगा।

भारतीय रिज़र्व बैंक के पूर्व गवर्नर दुव्वुरी सुब्बाराव ने ग्रामीण क्षेत्रों में कम वास्तविक मजदूरी और अच्छे रोजगारों के अपर्याप्त सृजन सहित इन्हीं संरचनात्मक चिंताओं की ओर ध्यान दिलाया है। ये चिंताएं बुनियादी ढांचे, बैंकिंग और डिजिटल भुगतान के क्षेत्र में हासिल की गई उपलब्धियों के साथ-साथ मौजूद हैं।

युवाओं की बेचैनी को इसी पृष्ठभूमि में समझने की जरूरत है। परिवारों ने शिक्षा पर निवेश किया है जिसके लिए अक्सर उन्हें काफी त्याग करना पड़ा है। जब स्थायी रोजगार नहीं मिल पाता तो निराशा होनी स्वाभाविक है। परीक्षाओं में देरी और पेपर लीक जैसी घटनाएं इस निराशा को और बढ़ा देती हैं। ये अनुभव उत्पादन में हो रही वृद्धि और युवाओं के लिए उपलब्ध अवसरों के बीच के अंतर को उजागर करते हैं।

परिवारों की क्रय शक्ति (खरीदने की क्षमता) भी इसका एक कारण है। परिवार अपनी आर्थिक स्थिति का अंदाजा खाने-पीने के खर्च, किराए, स्कूल की फीस, स्वास्थ्य सेवाओं और आने-जाने के खर्चों से लगाते हैं। महंगाई दर कम होने का मतलब यह नहीं है कि पहले से बढ़ी हुई कीमतें कम हो गई हैं। अगर कमाई, बढ़ते खर्चों के साथ कदम नहीं मिला पाती तो कम महंगाई के दौर में भी लोगों को कोई खास राहत नहीं मिलती।

किसानों के लिए स्थानीय हालात राष्ट्रीय विकास के आंकड़ों से कहीं ज्यादा मायने रखते हैं। महाराष्ट्र में सूखा पड़ने से फसल और कमाई पर खतरा मंडराने लगता है जबकि खेती का खर्च और कर्ज चुकाने की जिम्मेदारी बनी रहती है। अन्य क्षेत्रों में हो रही प्रगति, फसल बर्बाद होने की स्थिति में किसानों को तुरंत कोई खास सुरक्षा नहीं दे पाती।

शेयर बाजार का पहलू भी इसमें एक अहम भूमिका निभाता है। पिछले दो सालों से विदेशी निवेशक लगातार अपना पैसा निकाल रहे हैं जबकि घरेलू निवेशक हर महीने 30,000 करोड़ रुपये से ज्यादा का निवेश कर रहे हैं। ऐसी चर्चाएं हैं कि सरकार 'कैपिटल गेन्स टैक्स' में राहत देने पर विचार कर रही है क्योंकि शेयर बाजार सूचकांक (इंडेक्स) ने बहुत खराब रिटर्न दिया है। इस खराब रिटर्न ने वेतन में धीमी वृद्धि की समस्या को और गंभीर बना दिया है। अब चूंकि शेयर बाजार में आम लोगों (रिटेल निवेशकों) की भागीदारी बढ़ी है इसलिए निवेश पर मिलने वाला निराशाजनक रिटर्न मध्यम वर्ग के एक बड़े हिस्से के भरोसे को प्रभावित कर रहा है।

वेतन में ठहराव, बेरोजगारी, बढ़ती महंगाई, परिवारों पर बढ़ता कर्ज और सड़क, स्कूल तथा पीने के पानी जैसी जरूरी सार्वजनिक सेवाओं की बदतर हालत जैसी कई वजहों से निराशा का माहौल और गहरा गया है। अगर सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाएं, शिक्षा और परिवहन व्यवस्था बेहतर हो जाए तो परिवारों को इन पर किया जाने वाला खर्च कम हो जाएगा और उनके जीवन स्तर में सुधार आएगा। अच्छी गुणवत्ता वाली नौकरियों का सृजन बहुत सुस्त है।

भारत के विकास प्रदर्शन पर ध्यान दिया जाना चाहिए। साथ ही, परिवारों के बीच किए गए सर्वेक्षणों में जो बेचैनी दिखी है उस पर भी गौर करना जरूरी है। एक अर्थव्यवस्था कुल मिलाकर मजबूत हो सकती है लेकिन इसके बावजूद बहुत से लोग आर्थिक रूप से असुरक्षित रह सकते हैं। लगातार विकास होने से ऐसे संसाधन जुटते हैं जिनसे इस असुरक्षा को दूर किया जा सके। इसकी सफलता का असर तब व्यापक रूप से महसूस होगा जब राष्ट्रीय उत्पादन के साथ-साथ लोगों की कमाई, उनके लिए उपलब्ध अवसर और रोजमर्रा के जीवन की स्थितियों में भी सुधार आएगा।

(लेखक प्रसिद्ध अर्थशास्त्री हैं। सिंडिकेट: द बिलियन प्रेस)

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