जो तेरा हाल है,वो मेरा हाल है
भारत में कुछ समय पहले जेन ज़ी आंदोलन के कारण बड़ी हलचल मची।;
भारत में कुछ समय पहले जेन ज़ी आंदोलन के कारण बड़ी हलचल मची। इस समय विपक्ष के खड़े किए आंदोलन में जिस तरह जनता का बड़ा जुड़ाव हो रहा है, उसे जेन ज़ी आंदोलन का ही प्रभाव माना जा रहा है। मुद्दे यहां भी अलग नहीं हैं। सरकारी तंत्र में पसरा भ्रष्टाचार, निजी हाथों की बढ़ती ताकत, चुनावों में धांधली, सत्तारुढ़ दल के लिए हो रहे एकतरफा फैसले यही सब सर्बिया में हुआ, यही भारत में हो रहा है।
पिछले दो-तीन दिनों में कुछ ऐसी वैश्विक घटनाएं हुई हैं, जिन्हें विस्तार से पढ़ें तो लगेगा कि केवल स्थान और नाम ही अलग हैं, बाकी घटनाओं के कारण, हालात और जनप्रतिक्रियाएं काफी कुछ जानी-पहचानी लगेंगी, यानी इन्हें पढ़-सुन कर लगेगा कि अपने देश में जो कुछ चल रहा है वही दुनिया के दूसरे हिस्से में भी हो रहा है।
पाठक जानते हैं कि सर्बिया में हुए हालिया संसदीय चुनावों में राष्ट्रपति अलेक्जेंडर वुसिक की सत्ताधारी पार्टी की हार हुई है। आर्गनाइज्ड क्राइम एंड करप्शन रिपोर्टिंग प्रोजेक्ट की रिपोर्ट में बताया गया है कि सत्ता पर बने रहने के लिए वुसिक की सर्बियाई प्रोग्रेसिव पार्टी ने सत्ता के 14 बरसों में देश के मीडिया से लेकर तमाम सरकारी संस्थानों पर कब्जा कर लिया था। सर्बिया की चुनावों पर निगरानी रखने वाली महत्वपूर्ण संस्था द सेंटर फॉर रिसर्च, ट्रांसपरेंसी एंड एकाउंटीबिलीटी के मुताबिक 2023 और 2024 के चुनाव स्वतंत्र और निष्पक्ष नहीं थे। संस्था के मुताबिक चुनाव में लेवल प्ले फील्ड खत्म करना, मतदाता सूची में फर्जी नाम जोड़ना, सरकारी संसाधन अपने करीबियों में बांटना और पार्टी के लोगों की सरकारी संस्थाओं में घुसपैठ जैसे तमाम हथकंडे अपनाए गए। लेकिन इसके बावजूद इस बार वुसिक को हार स्वीकार करनी पड़ी क्योंकि दो साल पहले भ्रष्टाचार के खिलाफ शुरु हुए छात्रों के आंदोलन में जनता का बड़ा वर्ग भी शामिल हो गया और इस जनादेश और जनभावना को उपेक्षित करने का खतरा वुसिक ने मोल नहीं लिया।
भारत में कुछ समय पहले जेन ज़ी आंदोलन के कारण बड़ी हलचल मची। इस समय विपक्ष के खड़े किए आंदोलन में जिस तरह जनता का बड़ा जुड़ाव हो रहा है, उसे जेन ज़ी आंदोलन का ही प्रभाव माना जा रहा है। मुद्दे यहां भी अलग नहीं हैं। सरकारी तंत्र में पसरा भ्रष्टाचार, निजी हाथों की बढ़ती ताकत, चुनावों में धांधली, सत्तारुढ़ दल के लिए हो रहे एकतरफा फैसले यही सब सर्बिया में हुआ, यही भारत में हो रहा है। प्रसंगवश यह भी बता दूं कि कुछ महीने पहले इन्हीं वुसिक महोदय ने भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की शान में कसीदे गढ़े थे। उन्होंने कहा था कि मोदी ने भारत को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया और उसे वैश्विक महाशक्ति बनाया, लेकिन इसके बावजूद उन्हें कमजोर करने और गिराने की कोशिशें की जा रही हैं। मोदी की सत्ता बची रहेगी या नहीं ये फिक्र वुसिक कर रहे थे और इधर उनके देश के युवाओं ने उन्हें सत्ता से हटने पर मजबूर कर दिया। वह भी बाकायदा संवैधानिक तरीके से। बहरहाल वुसिक के हार मानते ही वहां का मीडिया भी पलटने लगा। बहुत से टीवी चैनलों के दफ्तर पर जनता अपनी नाराजगी प्रकट करने पहुंची, ऐसी खबर है। वहीं एक वीडियो सामने आया है, जिसमें सरकारी प्रसारक रेडियो टेलीविज़न ऑफ़ वोज्वोदिना ने अपने दर्शकों से लाइव प्रसारण पर बाकायजा माफी मांगी है। चैनल के एंकर गोरान एरॉर ने प्रसारण की शुरुआत में स्वीकार किया कि चैनल ने वर्षों तक एकतरफा, सत्ता-समर्थक और बिना आलोचना वाली खबरें दिखाईं तथा ज़रूरी सवाल नहीं पूछे। एंकर ने कहा, वर्षों तक, हम अपने कर्तव्य का पालन करने में विफल रहे। हम चुप रहे, आंखें मूंद लीं, एकतरफा खबरें दिखाईं और ज़रूरी सवाल पूछने में असफल रहे। इसके लिए हम अपने दर्शकों से माफी मांगते हैं। इस माफीनामे और राजनीतिक बदलाव के तुरंत बाद, आरटीवी के फर्स्ट प्रोग्राम के कार्यवाहक प्रधान संपादक नेनाद चाचिक ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। उनके स्थान पर ब्लाज़ो पोपोविच को नियुक्त किया गया है। सर्बिया से पेश आए इस उदाहरण को पुराने जमाने में इस्तेमाल किए जाने वाले टेलीग्राम संदेशों की तरह समझा जा सकता है कि थोड़ा लिखा है, ज्यादा समझना।
यूं तो पिछले कुछ दिनों में इटली, फ्रांस जैसे कुछ और देशों में भी छात्रों ने सरकार के खिलाफ बड़े आंदोलन किए, जो हिंसक भी हुए। इन्हीं पर अपनी जर्मनी यात्रा के दौरान देश के वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने प्रवासी भारतीयों की तारीफ करते हुए यूरोपीय देशों के लिए तंज भरे लहजे में कहा कि मेज़बान देशों में भारतीयों का स्वागत किया जाता है क्योंकि वे तोड़-फोड़ या सार्वजनिक जीवन में रुकावट नहीं डालते हैं। पीयूष गोयल की बात बिल्कुल वाजिब है। यूरोप तो फिर भी दूर है, लेकिन भारत के पड़ोसी नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका में ऐसे ही छात्रों और जनता के आंदोलन के बाद तख्तापलट की घटनाएं हुईं, फिर भी भारत के नौजवान गांधी के बताए अहिंसक आंदोलन के रास्ते पर ही चल रहे हैं। संवैधानिक तरीके से ही अपनी मांगें सामने रख रहे हैं और संवैधानिक तरीके से ही अपनी समस्याओं का समाधान भी चाहते हैं। ये और बात है कि उन्हें इस तरीके पर चलने की बड़ी कीमत भी अदा करनी पड़ रही है। कभी व्यक्तिगत हमले आंदोलनकारी लड़कियों पर हो रहे हैं, कभी कानून का डर दिखाया जा रहा है, कभी इंस्टाग्राम, एक्स जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर प्रतिबंध झेलने पड़ रहे हैं।
अभी पिछले हफ्ते नेहा सिंह राठौड़ पर एबीपी चैनल के डिजीटल प्लेटफार्म पर फर्जी खबर चली, जो बाद में खेदप्रकट के बाद हटाई गई। इसी तरह आइसा की अध्यक्ष नेहा बोरा के चरित्र हनन की कोशिशें हुईं। और ऐसा करने वालों को पुरस्कृत भी किया जा रहा है। अभी इफको युवा साहित्य सम्मान बिहार के सर्वेश तिवारी श्रीमुख को दिया गया। उनकी 15 सितंबर की फेसबुक पोस्ट नेहा बोरा के विरोध में है। तब नेहा ने गोरखपुर में ही योगी आदित्यनाथ की काफी आलोचना की थी। उस पर सर्वेश तिवारी ने नेहा को एक दो कौड़ी की वामपंथी नचनिया बताते हुए लिखा कि इस गदहिया को कोई बताए कि गोरखपुर हजार साल पूर्व भी बाबा गोरखनाथ के लिए जाना जाता था। आगे यह भी लिखा कि एक पंक्ति बोलने भर में छह बार मुंह और आठ बार कूल्हा मटका कर राखी सावंत टाइप गाली गलौज करने से बिग बॉस या महेश भट्ट की फिल्म में इमरान हाशमी के अपोजिट रोल तो मिल सकता है, राजनीति में जगह नहीं बन सकती।
वैसे तो सर्वेश तिवारी को उनके उपन्यास पुण्यपथ के लिए साहित्य सम्मान मिला है, लेकिन ऊपर लिखी भाषा कम से कम किसी साहित्यकार की तो नहीं लगती है। बल्कि किसी सभ्य नागरिक की भी नहीं लगती है। क्योंकि नेहा बोरा से असहमति या नापसंदगी अपनी जगह है, लेकिन उसे दर्शाने का तरीका किसी लिहाज से सभ्य नहीं है। लेकिन यही तो नए भारत का कड़वा सच है। जहां भाषा के साथ-साथ विचारों और मूल्यों में भी बड़ी गिरावट आ चुकी है। खैर, वापस वैश्विक घटनाक्रम की तरफ मुड़ते हैं। ब्राजील में वामपंथी नेता लूला डि सिल्वा की दोबारा जीत पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उन्हें अपना मित्र बताते हुए बधाई दी। हालांकि मोदी जिन्हें अपना मित्र बता रहे हैं, ट्रंप उनके शत्रु हैं। अगर लूला की जगह फ्लावियो बोल्सोनारो जीतते तो मोदी उनसे अपना पुराना नाता निकाल लेते। उन्हें अपना मित्र बताते, अपने मित्र का बेटा और अपने मित्र का मित्र भी बताते। लेकिन इस रिश्तेदारी को निकालने का मौका मोदी को नहीं मिला। इस बीच खबर आई कि फ्लावियो बोलसोनारो ब्राजील से भागकर अमेरिका चले गए हैं। ब्राजील की सुप्रीम कोर्ट ने मनी लॉन्ड्रिंग की जांच के सिलसिले में फ्लावियो को अपने पासपोर्ट जमा करने का आदेश दिया था। लेकिन उन पर कार्रवाई होती इससे पहले वे चले गए, हालांकि इस बात की पुष्टि नहीं हुई है कि बोलसोनारो झोला उठा कर गए या खाली हाथ गए हैं।
खैर, इन घटनाओं को देख-सुन कर ताल फिल्म के गीत के बोल याद आते हैं-
जो तेरा हाल है, वो मेरा हाल है।