मजदूरों के बच्चों के लिए अनोखा झूलाघर

हाल ही मैं छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में स्थित जनस्वास्थ्य सहयोग संस्था गया। यह संस्था स्वास्थ्य के क्षेत्र में कार्यरत है;

Update: 2026-10-30 22:34 GMT

इस संस्था के डॉक्टर और कार्यकर्ता बहुत ही समर्पित हैं। संस्था न सिर्फ गनियारी कस्बे में एक अस्पताल चलाती है, बल्कि दूरदराज के गांवों में स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाती हैं। इसके अलावा, संस्था ने बच्चों के लिए फुलवारी कार्यक्रम संचालित किया है। इसके अलावा संस्था, जैविक खेती कार्यक्रम, पशु स्वास्थ्य कार्यक्रम, नर्सिंग स्कूल जैसे कई उल्लेखनीय काम कर रही है। फिलहाल यहां फुलवारी कार्यक्रम तक सीमित रखते हैं।

हाल ही मैं छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में स्थित जनस्वास्थ्य सहयोग संस्था गया। यह संस्था स्वास्थ्य के क्षेत्र में कार्यरत है। छत्तीसगढ़ के साथ संस्था ने मध्यप्रदेश के कुछ जिलों में काम शुरु किया है। इसी कड़ी में अनूपपुर जिले में बच्चों के लिए झूलाघर फुलवारी चलाया जाता है। आज इसी पर बात करना चाहूंगा, जिससे बच्चों के समग्र विकास पर ध्यान दिया जा सके।

फुलवारी का अर्थ फूलों की बगिया होता है। लेकिन यह एक तरह का झूलाघर है, जो तीन साल तक के बच्चों के स्वास्थ्य व पोषण में सुधार का कार्यक्रम है। इसे जन स्वास्थ्य सहयोग संस्था संचालित कर रही है। बच्चों के लिए झूलाघर बिलासपुर जिले में काफी पहले से चल रहा है। मैंने खुद कई फुलवारियों को देखा है और कार्यकर्तोओं से मिला हूं। वर्ष 2018 से यह अनूपपुर जिले के पुष्पराजगढ़ विकासखंड में चल रहा है। कुछ समय पहले इस इलाके में भी मैं गया था।

इस संस्था के डॉक्टर और कार्यकर्ता बहुत ही समर्पित हैं। संस्था न सिर्फ गनियारी कस्बे में एक अस्पताल चलाती है, बल्कि दूरदराज के गांवों में स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाती हैं। इसके अलावा, संस्था ने बच्चों के लिए फुलवारी कार्यक्रम संचालित किया है। इसके अलावा संस्था, जैविक खेती कार्यक्रम, पशु स्वास्थ्य कार्यक्रम, नर्सिंग स्कूल जैसे कई उल्लेखनीय काम कर रही है। फिलहाल यहां फुलवारी कार्यक्रम तक सीमित रखते हैं।

संस्था के डॉक्टर डॉ. पंकज तिवारी ने बतलाया कि अनूपपुर जिला आदिवासी बाहुल्य है। इस जिले का एक विकासखंड पुष्पराजगढ़ है, जो गरीब व पहुंचविहीन है। यहां के आदिवासियों की आजीविका खेती-किसानी और मजदूरी पर निर्भर है। वे रोज कमाने और रोज खाने वाले हैं। ऐसे में बच्चों की उचित देखभाल और आहार के प्रति ध्यान नहीं दे पाते हैं। 3 साल तक के आयु वाले बच्चों को समुचित पोषण की बेहद जरूरत होती है। उन्हें इस अवधि में स्वादिष्ट, गरम, पतला और मुलायम भोजन मिलना चाहिए।

वे आगे बतलाते हैं कि पर गांवों में यह देखा गया है कि अगर बच्चों के माता-पिता दोनों मजदूरी पर या खेत में काम करने के लिए जाते हैं तो छोटे बच्चों का ख्याल रखना मुश्किल हो जाता है। छोटे बच्चों को बुजुर्ग या उनके बड़े भाई-बहन के सहारे छोड़कर उनके मां-बाप को काम पर जाना पड़ता है। इस कारण बड़े भाई-बहन स्कूल नहीं जा पाते। बुजुर्ग भी कई बार उचित देखभाल नहीं कर पाते।

फुलवारी मोहम्मद अनीश बताते हैं कि फुलवारी केन्द्र में 6 माह से 3 साल तक के बच्चों को रखा जाता है। पुष्पराजगढ़ तहसील के 75 फुलवारी चल रही है। एक फुलवारी में 12-13 बच्चे के लिए एक कार्यकर्ता होती है। अगर बच्चे इससे ज्यादा हुए तो दो कार्यकर्ता बच्चों को संभालती हैं।

अनीश बताते हैं कि इस केन्द्र में बच्चों के माता-पिता सुबह 9 बजे उन्हें छोड़कर जाते हैं और शाम को 4.30 बजे घर ले जाते हैं। फुलवारी में बच्चों को हर तरह से स्वस्थ रखने पर जोर दिया जाता है। उसे यहां सुबह का नाश्ता, दोपहर भोजन और शाम को घर वापस जाने से पहले खाना दिया जाता है।

वे आगे बताते हैं कि यहां उन्हें पका पकाया खाना खिलाया जाता है। सत्तू और खिचड़ी दी जाती है। उन्हें खाने में तेल की मात्रा दी जाती है। हफ्ते में तीन दिन अंडे भी दिए जाते हैं। आयरन सीरप भी दिया जाता है। अगर कोई बच्चा कुपोषित है तो उसे हफ्ते में 6 दिन अंडा दिया जाता है। समय-समय पर कार्यकर्ताओं द्वारा घर-घर जाकर बच्चों के स्वास्थ्य की जानकारी ली जाती है। इस दौरान कोई बच्चा बीमार होता है तो उसका इलाज किया जाता है। बच्चों का हर माह वजन लिया जाता है, और दो माह में ऊंचाई नापी जाती है। बच्चों का स्वास्थ्य व पोषण चार्ट बनाया जाता है। अगर कोई बच्चा फुलवारी में नहीं आ रहा है तो उसे लाने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।

अनीश बताते हैं कि कार्यकर्ता चयन की प्रक्रिया गांव की सहमति और उनकी सहभागिता से होती है। इन कार्यकर्ताओं का हर माह प्रशिक्षण होता है। इसमें पोषण, स्वच्छता, बच्चों की देखभाल और बच्चों के समग्र विकास संबंधी प्रशिक्षण दिया जाता है। स्थानीय भाषा में खेल व गीत सिखाए जाते हैं, जिससे गतिविधियों के माध्यम से बच्चे कुछ सीख सकें। शारीरिक गतिविधियां भी करवाई जाती हैं।

वे आगे बताते हैं कि हर माह गांव में बच्चों के अभिभावकों के साथ बैठक होती है। इसमें साफ-सफाई, स्वच्छता और जंगल से मिलने वाले ( गैर खेती भोजन) पौष्टिक फल, फूल, हरी पत्तीदार भाजियां, मशरूम, शहद इत्यादि के बारे में बताया जाता है। जैसे आम, आंवला, बेर, भिलवां इत्यादि जंगल से मिलते हैं, जिनमें पोषक तत्व होते हैं। जो बच्चे फुलवारी नहीं आ पा रहे हैं, और अनुपस्थित हो रहे हैं, उन्हें फुलवारी में लाने के लिए जोर दिया जाता है।

फुलवारी में सब्जी बाड़ी लगाई जाती है। यह पूरी तरह जैविक किचिन गार्डन की तरह है। इसमें मौसमी सब्जियां लगाने के लिए प्रेरित किया जाता है। संस्था द्वारा हाल ही में गोभी, गाजर, मूली, टमाटर, धनिया और लाल भाजी के बीज वितरित किए गए हैं। इसके पहले बारिश में लौकी, करेला, कद्दू, गिलकी आदि लगवाई गई थी।

अक्टूबर से फरवरी तक सब्जी बाड़ी से सब्जियां मिलती हैं। सब्जी बाड़ी में अलग से पानी की जरूरत नहीं होती। फुलवारी में बच्चों को जो हाथ धुलाने के लिए पानी इस्तेमाल होता है, उसी से सब्जी बाड़ी की सब्जियों की सिंचाई हो जाती है। पूर्व में मशरूम की खेती को बढ़ावा दिया गया था। इससे हर साल करीब सौ किसान जुड़े थे। जैविक गार्डन को लम्बे अरसे से हर फुलवारी में विकसित किया जा रहा है। इसमें देसी बीजों की सब्जियों को बढ़ावा दिया जाता है।

कुल मिलाकर, फुलवारी के काम से बच्चों को अच्छा पोषण मिल रहा है। जब मजदूर ( माता-पिता) काम पर चले जाते हैं तो बच्चों को संभालने वाला कोई नहीं होता। फुलवारी के पूर्व घरों में छोटे बच्चों को बड़े बच्चे संभालते थे, अब वे इस काम से मुक्त हो गए हैं और स्कूल जाते हैं। इसी प्रकार, बुजुर्ग जो पहले बच्चों को संभालते थे, वे भी अब इससे मुक्त हो गए हैं। यह छोटे बच्चों के पोषण में बहुत मददगार है, विशेष कर मजदूरों के बच्चों के लिए बहुत उपयोगी है। देसी बीजों की प्राकृतिक सब्जी बाड़ी को बढ़ावा देने से बीजों का संरक्षण व संवर्धन हो रहा है। कुल मिलाकर, यह झूलाघर बहुत ही उपयोगी हैं। यह महिला सशक्तीकरण भी अच्छा उदाहरण है, क्योंकि इससे बड़े पैमाने पर महिलाओं को रोजगार भी मिला है। जो सराहनीय होने के साथ अनुकरणीय भी है। 

Tags:    

Similar News