मुक्तिबोध और परसाई
मैं स्वयं मुक्तिबोध जी को थोड़ा बहुत जानने का दावा रखता हूं तथा परसाई जी को एक लंबी अवधि तक निकट से जानने का सौभाग्य भी मुझे मिला है।;
मैं स्वयं मुक्तिबोध जी को थोड़ा बहुत जानने का दावा रखता हूं तथा परसाई जी को एक लंबी अवधि तक निकट से जानने का सौभाग्य भी मुझे मिला है। मैं ही नहीं, मुझ जैसे अनगिन लोग हैं जिन्होंने मुक्तिबोध और परसाई से विचारों की पूंजी हासिल की है। पाठक चाहे मुक्तिबोध को पढ़ें या परसाई को, पढऩे के बाद वह एक ही बिन्दु पर पहुंचता है। भले ही इसका भान उसे न हो पाता हो। हम पाते हैं कि दोनों के व्यक्तित्व और विचारों में कैसी अभिन्नता है। हम इन दोनों को शायद विचारों के सहोदर कह सकते हैं। इस दृष्टि से 'महागुरु मुक्तिबोध'और 'दर्पण देखे मांज के' इन दोनों पुस्तकों को पढऩा याने एक दुर्लभ नक्शा प्राप्त कर लेना है जो हमें किसी पुराने खजाने तक पहुंचने का रास्ता बताता हो।
(अक्षर पर्व अगस्त 2014 में प्रकाशित)
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