ललित सुरजन की कलम से स्वास्थ्य सेवाओं की दुर्गति-1
'केन्द्र सरकार को एक नीतिगत निर्णय लेकर शहरी क्षेत्र में निजी अस्पताल खोलने के लिए बैंक ऋण देने पर पाबंदी लगा देना चाहिए;
'केन्द्र सरकार को एक नीतिगत निर्णय लेकर शहरी क्षेत्र में निजी अस्पताल खोलने के लिए बैंक ऋण देने पर पाबंदी लगा देना चाहिए; इस निर्णय का दूसरा पहलू यह होगा कि जो डॉक्टर दूरस्थ अंचलों में जाकर अस्पताल स्थापित करना चाहते हैं उन्हें बैंकों से रियायती दर पर कर्ज उपलब्ध कराया जाए। यह संभवत: एक दु:साहसिक निर्णय माना जाएगा।
लेकिन इस कदम से देश के दूरस्थ ग्रामीण अंचलों में स्वास्थ्य सेवाओं की जो बदहाली है उस पर किसी हद तक रोक लग सकेगी। विचार करें तो यह प्रस्ताव पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम की 'पुरा' अवधारणा के काफी करीब है। 'पुरा' याने ग्रामीण क्षेत्रों में शहरी सुविधाओं का विस्तार।
यह सबके सामने है कि ग्रामीण क्षेत्रों में डॉक्टरों का बेहद अभाव है। शहर और गांव के बीच जनसंख्या के अनुपात में डॉक्टरों की उपलब्धता में बहुत बड़ा फर्क है। आए दिन खबरें सुनने मिलती हैं कि अस्पताल है तो डॉक्टर नहीं, डॉक्टर है तो नर्स या अन्य सहायक नहीं, वे हैं तो दवाईयां नहीं।'
(देशबन्धु में 20 जुलाई 2017 को प्रकाशित)
https://lalitsurjan.blogspot.com/2017/07/1.html