व्हीबी-जी राम-जी की पहली परीक्षा : रोजगार आधा क्यों हुआ?

भ्रष्टाचार, फर्जी जॉब कार्ड, भुगतान में देरी और परिसंपत्तियों की गुणवत्ता जैसे सवाल उस पर उठते रहे।;

By :  DB Desk
Update: 2026-08-25 21:34 GMT
  • अरुण डनायक

मनरेगा की अनेक कमियां समय-समय पर सामने आती रही हैं। भ्रष्टाचार, फर्जी जॉब कार्ड, भुगतान में देरी और परिसंपत्तियों की गुणवत्ता जैसे सवाल उस पर उठते रहे। लेकिन उसकी बड़ी उपलब्धि यह थी कि उसने ग्रामीण गरीबों को राज्य से काम मांगने का वैधानिक अधिकार दिया। व्हीबी-जी राम-जी की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह इस अधिकार को कमजोर करने के बजाय कितना अधिक प्रभावी बनाता है।

सरकार ने मनरेगा की जगह व्हीबी-जी राम-जी को उसका नया और बेहतर अवतार बताते हुए लागू किया था और दावा किया था कि यह पुरानी व्यवस्था की कमियों को दूर करते हुए ग्रामीण परिवारों को 100 के बजाय 125 दिनों के रोजगार की गारंटी देगी, रोजगार को ग्रामीण परिसंपत्तियों के निर्माण से जोड़ेगी तथा डिजिटल तकनीक से पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाएगी। लेकिन शुरुआती आंकड़े ही एक असहज सवाल खड़ा कर रहे हैं—जब रोजगार की गारंटी 100 से बढ़ाकर 125 दिन कर दी गई है, तो रोजगार पाने वाले परिवारों और सृजित व्यक्ति-दिवसों में लगभग आधी कमी क्यों आ गई?

नई योजना के तहत प्रत्येक पात्र ग्रामीण परिवार के वयस्क सदस्यों को, जो अकुशल शारीरिक श्रम करने के इच्छुक हों, वर्ष में 125 दिनों के मजदूरी रोजगार की गारंटी दी गई। काम पूरा होने के पश्चात मजदूरी का भुगतान 15 दिनों के भीतर करने का प्रावधान रखा गया। इस प्रकार यह मनरेगा से एक कदम आगे की व्यवस्था दिखती है।

लेकिन रोजगार के वास्तविक आंकड़े अलग कहानी कहते हैं। व्हीबी-जी राम-जी डैशबोर्ड के अनुसार जुलाई 2026 में केवल 7.67 करोड़ व्यक्ति-दिवस रोजगार सृजित हुआ, जो मनरेगा के तहत पिछले वर्ष के 15.33 करोड़ व्यक्ति-दिवस से करीब 50 प्रतिशत कम है। रोजगार पाने वाले परिवार भी 1.42 करोड़ से घटकर 68.94 लाख रह गए, यानी 51.45 प्रतिशत की कमी। यह गिरावट गंभीर है, क्योंकि ग्रामीण गरीब परिवार के लिए रोजगार का हर दिन उसकी आय और घरेलू खर्च से जुड़ा है। इसे महज प्रशासनिक आंकड़ा मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। खास बात यह है कि व्हीबी-जी राम-जी के डैशबोर्ड पर जुलाई में 7.67 करोड़ व्यक्ति-दिवस दर्ज हैं, जबकि ग्रामीण विकास मंत्रालय लगभग नौ करोड़ व्यक्ति-दिवस रोजगार सृजन का दावा कर रहा है। ऐसे में आंकड़ों की एकरूपता और पारदर्शिता का सवाल उठना स्वाभाविक है। रोजगार गारंटी जैसी योजना का आकलन तभी संभव है, जब उसके आंकड़े स्पष्ट, समान आधार पर और नियमित रूप से सार्वजनिक किए जाएं।

ग्रामीण विकास मंत्रालय के अनुसार, व्हीबी-जी राम-जी सुचारु रूप से लागू की गई है और 2026-27 के लिए 95,692 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है, जो किसी ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम के लिए अब तक का सबसे बड़ा बजट है। मंत्रालय के अनुसार, पहले महीने में लगभग नौ करोड़ व्यक्ति-दिवस रोजगार सृजित हुआ। 1.33 करोड़ से अधिक ग्रामीण श्रमिकों को काम की पेशकश की गई और नौ लाख से अधिक कार्यस्थलों पर काम चल रहा था।

लगभग दो दशकों तक योजना का वित्तीय भार मुख्यत: केंद्र उठाता रहा, लेकिन अब सामान्य राज्यों के लिए केंद्र-राज्य खर्च का अनुपात 60:40 कर दिया गया है। पूर्वोत्तर और हिमालयी राज्यों के लिए यह 90:10 तथा बिना विधानसभा वाले केंद्रशासित प्रदेशों के लिए 100 प्रतिशत केंद्रीय हिस्सा है। राज्यों की वित्तीय क्षमता पर इसके संभावित असर के कारण 40 प्रतिशत योगदान राजनीतिक विवाद का मुद्दा बन गया है। हालांकि तमिलनाडु, कर्नाटक, तेलंगाना और झारखंड ने बजट में इसके लिए प्रावधान किया है और तमिलनाडु ने 150 दिन रोजगार देने की घोषणा भी की है। इसका महत्व इसलिए भी है कि रोजगार गारंटी ग्रामीण मजदूरी की एक न्यूनतम सीमा तय करती है। राज्यों पर बढ़ा वित्तीय बोझ योजना के क्रियान्वयन और इसलिए ग्रामीण मजदूरी को प्रभावित कर सकता है।

नई योजना में कृषि मौसम को लेकर भी बदलाव है। राज्य सरकारें बुआई और कटाई के चरम मौसम में कुल 60 दिनों तक रोजगार कार्य रोक लगा सकती हैं। सरकार का तर्क है कि इससे खेती के व्यस्त मौसम में पर्याप्त श्रमिक उपलब्ध रहेंगे। लेकिन ग्रामीण परिवारों के लिए इसका अर्थ यह है कि 125 दिनों का रोजगार पूरे वर्ष समान रूप से उपलब्ध नहीं होगा। इसलिए रोजगार गारंटी का आकलन केवल दिनों की संख्या से नहीं, बल्कि उनकी उपलब्धता और नियमितता से भी होना चाहिए।

योजना का दूसरा घोषित उद्देश्य रोजगार को उत्पादक परिसंपत्तियों के निर्माण से जोड़ना है। जल सुरक्षा, ग्रामीण आधारभूत ढांचा, आजीविका संबंधी संरचनाएं और जलवायु लचीलापन इसके प्राथमिक क्षेत्र बनाए गए हैं। ग्राम पंचायत स्तर पर स्थानिक और भू-स्थानिक तकनीकों की मदद से योजनाएं तैयार करने का भी प्रावधान है। यदि इससे तालाब, सिंचाई व्यवस्था, सड़क, भंडारण, ग्रामीण बाजार और जलवायु-सुरक्षा जैसी टिकाऊ परिसंपत्तियां बनती हैं तो इसका लाभ मजदूरी पाने वाले परिवारों से आगे पूरे ग्रामीण अर्थतंत्र को मिल सकता है। लेकिन सवाल है कि राज्य के ग्रामीण विकास विभाग और ग्राम पंचायतों के पास ऐसी योजनाओं की पहचान और क्रियान्वयन की पर्याप्त क्षमता है? केवल भू-स्थानिक तकनीक से टिकाऊ परिसंपत्तियां नहीं बनेंगी; इसके लिए स्थानीय नियोजन और तकनीकी विशेषज्ञता भी जरूरी है।

तकनीक को नई व्यवस्था की ताकत के रूप में प्रस्तुत किया गया है। बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण, डिजिटल भुगतान, जीआईएस मैपिंग, सामाजिक अंकेक्षण और एनएमएमएस से उपस्थिति दर्ज कराने से भ्रष्टाचार और फर्जीवाड़े पर अंकुश लग सकता है। लेकिन यदि डिजिटल सत्यापन किसी जरूरतमंद श्रमिक को काम पाने से रोकता है, तो यही पारदर्शिता बहिष्कार का कारण बन सकती है। इसलिए तकनीक की सफलता इस बात से मापी जानी चाहिए कि उसने कितने जरूरतमंद परिवारों को समय पर रोजगार और मजदूरी दिलाई, न कि कितनी तकनीकी व्यवस्थाएं लागू की गईं।

जुलाई में रोजगार में गिरावट ऐसे समय आई, जब 1 जून से 3 अगस्त के बीच 741 में से करीब आधे जिलों में सामान्य से कम या बहुत कम बारिश हुई। ऐसे समय रोजगार गारंटी कृषि श्रमिकों के लिए महत्वपूर्ण सहारा बन सकती थी, जबकि खरीफ फसलों का बोया क्षेत्र भी पिछले वर्ष से घटा था।

मनरेगा की अनेक कमियां समय-समय पर सामने आती रही हैं। भ्रष्टाचार, फर्जी जॉब कार्ड, भुगतान में देरी और परिसंपत्तियों की गुणवत्ता जैसे सवाल उस पर उठते रहे। लेकिन उसकी बड़ी उपलब्धि यह थी कि उसने ग्रामीण गरीबों को राज्य से काम मांगने का वैधानिक अधिकार दिया। व्हीबी-जी राम-जी की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह इस अधिकार को कमजोर करने के बजाय कितना अधिक प्रभावी बनाता है।

आखिरकार रोजगार गारंटी योजना की सफलता उसके बजट, डिजिटल तंत्र या कानून में लिखे रोजगार के दिनों से नहीं, बल्कि इस बात से तय होगी कि काम मांगने वाले ग्रामीण परिवार को समय पर काम और मजदूरी मिलती है या नहीं और वह पूरे साल अपनी आय की योजना बना पाता है या नहीं। 125 दिन कागज पर लिखी संख्या है; उसका वास्तविक अर्थ तभी है, जब वे 125 दिन सचमुच काम में बदलें। व्हीबी-जी राम-जी के पहले महीने के आंकड़े इसी कसौटी पर सवाल खड़ा करते हैं। आने वाले महीनों में सरकार को अपने ही आंकड़ों से इसका जवाब देना होगा।

(लेखक एवं सामाजिक कार्यकर्ता)

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