रणनीतिगत अंतरिक्ष क्षमता निजी क्षेत्र को सौंपना खतरनाक

निजी कंपनियां मुनाफ़ा कमाने के लिए ही होती हैं और भारत चाहता है कि वे सफल हों।;

By :  DB Desk
Update: 2026-08-27 21:40 GMT
  • के रवींद्रन

निजी कंपनियां मुनाफ़ा कमाने के लिए ही होती हैं और भारत चाहता है कि वे सफल हों। लेकिन कॉर्पोरेट ज़िम्मेदारियां और राष्ट्रीय रणनीतिक ज़िम्मेदारियां एक जैसी नहीं होतीं। इसरो आखिरकार भारत सरकार को जवाबदेह है। निजीकरण को लोकतांत्रिकरण बताकर इस फ़र्क को खत्म नहीं किया जा सकता। सबसे बड़ा ख़तरा यह नहीं है कि भारत की निजी कंपनियां रॉकेट बनाएंगी। इसका तो स्वागत किया जाना चाहिए।

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के भविष्य पर बहस अब इस जानी-पहचानी बहस से बहुत आगे निकल गई है कि क्या निजी उपक्रमों को भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम में कोई भूमिका मिलनी चाहिए।

अंतरिक्ष में निजी पूंजी लाने में असल में कुछ भी गलत नहीं है। निजी कंपनियां तेज़ी से विनिर्मित कर सकती हैं, पूंजी जुटा सकती हैं, वाणिज्यिक जोखिम ले सकती हैं और ऐसे बाजार में जा सकती हैं, जो किसी वैज्ञानिक संगठन से जरूरी तौर पर उम्मीद नहीं की जा सकती।

हालांकि, यह भारतीय अंतरिक्ष क्षमता को बढ़ाने के लिए एक तर्क है, इसरो को छोटा दिखाने के लिए नहीं। यह अंतर इसलिए और भी ज़रूरी हो गया है क्योंकि सरकार की घोषित नीति कंपनियों को इसरो के साथ काम करने की इजाज़त देने से कहीं ज़्यादा आगे जाती है। भारतीय अंतरिक्ष नीति में इसरो को परिपक्व सक्रिय अंतरिक्ष प्रणाली बनाने से और आगे ले जाने और अतिविकसित अनुसंधान, विकास और नई प्रौद्योगिकी पर ज़्यादा ध्यान देने की सोची गई है। न्यूस्पेस इंडिया लिमिटेड का मकसद सार्वजनिक खर्च से विकसित की गई प्रौद्योगिकी को वाणिज्यिक करना है, जबकि इन-स्पेस निजी गतिविधियों को अनुमोदित और आसान बनाता है। परिपक्व प्रणाली, प्रौद्योगिकी, जांच सुविधा, और तकनीकी समर्धन धीरे-धीरे उद्योग के लिए खोले जा रहे हैं।

यह प्रक्रिया पहले से ही काफी आगे बढ़ चुकी है। इस साल जनवरी तक, 71 इसरो प्रौद्योगिकी उद्योग और स्टार्ट-अप को हस्तांतरित कर दी गई थीं। हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड को स्मॉल सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल टेक्नालॉजी का हस्तांतरण खास तौर पर इसलिए ज़रूरी है क्योंकि इसमें अलग-अलग कंपोनेंट को सब-कॉन्ट्रैक्ट करने से कहीं ज़्यादा गतिविधियां शामिल हैं। इसे आखिरकार उद्योग को व्हीकल को एंड-टू-एंड विनिर्माण और लॉन्च करने की क्षमता देने के लिए तैयार किया गया है। निजी कंपनियों को सैटेलाइट ग्रुप, लॉन्च व्हीकल और ग्राउंड इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने के लिए भी बढ़ावा दिया जा रहा है।

सरकार इसे भारत के अन्तरिक्ष कार्यक्रम को कम करने के बजाय बढ़ाने के तौर पर बता रही है। इस मामले पर बहस होनी चाहिए। इसरो खुद हर उस रॉकेट, सैटेलाइट और वाणिज्यिक उत्पादन का निर्माता नहीं बन सकता जिसकी ज़रूरत एक बड़ी वैश्विक अंतरिक्ष शक्ति बनने की चाह रखने वाली अर्थव्यस्था को होती है।

लेकिन यह बात एक ज़रूरी शर्त पर टिकी है: इसरो को वह वैज्ञानिक गहराई, इंस्टीट्यूशनल मेमोरी और रणनीतिगत क्षमता बनाए रखनी होगी जिससे अगली पीढ़ी की प्रौद्योगिकियां सामने आएंगी। यहीं पर वैज्ञानिकों के इसरो छोड़कर जाने से जुड़े घटनाक्रम परेशान करने वाले हो जाते हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक, बहुत कम समय में 100 से ज़्यादा वैज्ञानिकों और अभियंताओं ने इस्तीफ़ा दे दिया है या स्वैच्छिक अवकाश ग्रहण मांग लिया है, जिनमें ज़रूरी कार्यक्रमों से जुड़े लोग भी शामिल हैं। जुलाई में अंतरिक्ष विभाग ने स्थिति को इतना गंभीर माना कि उसने गगनयान और दूसरे ज़रूरी मिशन पर काम कर रहे ग्रुप ए के वैज्ञानिक और तकनीकी कर्मचारियों के लिए निकासी प्रक्रिया को और सख्त कर दिया, और उन $फैसलों पर ज़्यादा नियंत्रण ले लिया जो पहले अलग-अलग इसरो केन्द्रों के स्तर पर किए जाते थे।

सरकार ने तर्क दिया है कि लोगों का जाना और भर्ती करना एक बड़े वैज्ञानिक संगठन की सामान्य ज़िंदगी का हिस्सा है। लेकिन संख्य वैज्ञानिक नुकसान का सही माप नहीं हैं। प्रोपल्शन सिस्टम की ऐसी जानकारी रखने वाले दस इंजीनियर, संगठन में कहीं और काम करने वाले सैकड़ों कर्मचारियों से ज़्यादा मायने रख सकते हैं। अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी काफी हद तक जमा हुए अनुभव पर निर्भर करती है— यह जानकारी कि पहले का डिज़ाइन क्यों फेल हुआ, मटीरियल अपनी घोषित टॉलरेंस से ज़्यादा कैसे काम करते हैं, एक कॉन्फिग़रेशन वाइब्रेशन से क्यों बच गया और दूसरा नहीं, और अनगिनत इंजीनियरिंग फ़ैसले जो शायद ही कभी पूरी तरह से मैनुअल में होते हैं।

एक बार ऐसे लोग चले जाते हैं, तो विशेषज्ञता बस यूं ही गायब नहीं हो जाती। तेज़ी से बढ़ रहे निजी अंतरिक्ष उद्योग में, जो बेहतर वेतन और वाणिज्यिक मौके दे रहा है, इसका ज़्यादातर हिस्सा सीधे उन कंपनियों में जा सकती हैं जिन्हें सरकार से प्रौद्योगिकी, सुविधाएं और ठेके मिलते हैं।

इससे एक अजीब नीति विरोधाभास पैदा होता है। सरकार एक तरफ तो निजी उद्योग में क्षमता के हस्तांतरण को बढ़ावा देना चाहती है और दूसरी तरफ इसरो से अहम वैज्ञानिक कर्मचारियों के बहुत ज़्यादा बाहर जाने को रोकना चाहती है। इसलिए, इस्तीफ़ों पर जुलाई में लगाई गई पाबंदियां सरकारी भरोसे के बयानों से ज़्यादा सच्चाई बताती हैं।

यह चिंता और भी गहरी हो जाती है क्योंकि अंतरिक्ष अब सिर्फ आम नागरिकों के लिए वैज्ञानिक कोशिश नहीं रह गया है। कम्युनिकेशन सैटेलाइट, नेविगेशन सिस्टम, हाई-रिज़ॉल्यूशन इमेजिंग, लॉन्च टेक्नालॉजी, ट्रैकिंग नेटवर्क, प्रोपल्शन की जानकारी और ऑर्बिटल इंटेलिजेंस का सीधा मिलिटरी इस्तेमाल होता है। पिछले कुछ सालों की लड़ाइयों ने दिखाया है कि निगरानी, लक्ष्य तय करने, संचार और युद्ध के मैदान की जानकारी में अंतरिक्ष सम्पदा कितने गहरे जुड़े हुए हैं। इसलिए, भारत अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के हस्तांतरण को आम औद्योगिक लाइसेंस प्रक्रिया की तरह नहीं देख सकता।

संयुक्त उपक्रम से उस जानकारी का वाणिज्यिक इस्तेमाल बदल सकता है जिसे शुरू में एक रणनीतिक राष्ट्रीय संस्थान में विकसित किया गया था।

इसलिए, राष्ट्रीय सुरक्षा नीति सिर्फ इस शर्त पर खत्म नहीं हो सकती कि भारतीय कंपनी को एक तय हिस्सेदारी बनाए रखनी होगी। भारत को एक ऐसे ऑडिट-योग्य सिस्टम की ज़रूरत है जो प्रौद्योगिकी के आगे के इस्तेमाल, संवेदनशील तकनीकी जानकारी तक विदेशी पहुंच, अहम कर्मचारियों की आवाजाही, साइबर सुरक्षा, एक्सपोर्ट कंट्रोल, सब-कॉन्ट्रैक्टिंग, मालिकाना हक में बदलाव और गोपनीय या दोहरे इस्तेमाल वाली जानकारी को संभालने के तरीकों को नियंत्रित करे।

मुनाफ़ा अपने आप में दुश्मन नहीं है। निजी कंपनियां मुनाफ़ा कमाने के लिए ही होती हैं और भारत चाहता है कि वे सफल हों। लेकिन कॉर्पोरेट ज़िम्मेदारियां और राष्ट्रीय रणनीतिक ज़िम्मेदारियां एक जैसी नहीं होतीं। इसरो आखिरकार भारत सरकार को जवाबदेह है। निजीकरण को लोकतांत्रिकरण बताकर इस फ़र्क को खत्म नहीं किया जा सकता।

सबसे बड़ा ख़तरा यह नहीं है कि भारत की निजी कंपनियां रॉकेट बनाएंगी। इसका तो स्वागत किया जाना चाहिए। असली ख़तरा यह है कि भारत धीरे-धीरे एक ऐसे संगठन को, जिसके पास एंड-टू-एंड क्षमता है, मुख्य रूप से एक अनुसंधान प्रयोगशाला में बदल सकता है, जबकि प्रयोगशाला के डिज़ाइनों को काम करने वाले रणनीतिक प्रणाली में बदलने के लिए ज़रूरी ऑपरेशनल जानकारी, मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम और अनुभवी कर्मचारी कहीं और चले जाएं। एक बार जब ऐसी क्षमता बिखर जाएगी, तो उसे सरकारी दायरे में फिर से बनाना बहुत मुश्किल होगा।

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