ललित सुरजन: जागी हुई जगह से बढ़कर सोने की ताज़गी

ललित जी के लेखन का प्राण तत्व भारतीय संविधान है- स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व और धर्मनिरपेक्षता;

Update: 2026-07-21 21:47 GMT
  • ललित सुरजन (22.7.1946 - 2.12.२०२०)

ललित जी के लेखन का प्राण तत्व भारतीय संविधान है- स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व और धर्मनिरपेक्षता। इन अमृत तत्वों के लिये ललित जी की कलम की स्याही कभी भी फीकी नहीं पड़ी। लोकतंत्र की रक्षा के साथ मानव को सामाजिक बनाना तथा समाज को मानवीय बनाना उनके लेखन का सार तत्व है। यानी एक न्यायपूर्ण समाज की स्थापना।

अक्सर अखबारी लेखों को साहित्यकार व आलोचक निबंधों से कमतर मानते हैं लेकिन देशबन्धु के प्रधान सम्पादक रहे ललित सुरजन के लेख एवं सम्पादकीय निबन्ध की श्रेणी में इसलिये आते हैं क्योंकि उनमें निबंध के सभी आवश्यक गुण-धर्म मौजूद हैं- स्पष्टता, प्रवाह, तार्किकता और सुसंगता यानी अन्विति। निबंधों का एक और महत्वपूर्ण तत्व है आग्रह। नैतिकता और मूल्यों को अपनाने का आग्रह व प्रोत्साहन। साहित्य और पत्रकारिता दोनों में लोकमंगल की भावना होती है। लोकजतन की इसी भावना के चलते 200 साल पहले शुरू हुए 'उदंत मार्तंड' की परम्परा में देश में जो भी अखबार चले उनमें से देशबन्धु एक है। ललित जी ने अपने पत्रकारों को इस तत्व को कभी भूलने नहीं दिया कि लोकरक्षण तथा लोकहित का आग्रह देशबन्धु के सभी पन्नों व कालमों में दिखना चाहिये। इसी के चलते जब देश भर के ज्यादातर प्रकाशन संस्थान आवारा पूंजी को समेटकर मालामाल हो रहे थे, तब भी देशबन्धु अपने रिपोर्टरों को गांव-खेड़ों में गरीबों, शोषितों, वंचितों के साथ खड़ा करता था। देशबन्धु को कई बार मिले 'स्टेट्समैन ग्रामीण पत्रकारिता अवार्ड' इसका प्रमाण हैं।

सामान्यत: सभी कलाएं दो तरह की होती हैं- 'मास' के लिये या फिर 'क्लास' के लिये। देशबन्धु यदि मास के लिये है तो उनमें प्रकाशित होने वाले ललित जी के लेख व सम्पादकीय क्लास के लिये होते हैं। तो क्या ललित जी के लेखों को आम जनता नहीं पढ़ती थी? नहीं, उन्हें पढ़ने के इच्छुकों ने अपनी समझ और चेतना को उस स्तर तक विकसित किया था जिस ऊंचाई पर पहुंचकर वे उन्हें आत्मसात कर पाए। यही लोक प्रशिक्षण कहलाता है। महात्मा गांधी ने सत्य और अहिंसा के बल पर अन्याय के खिलाफ खड़े होने के लिये देश के करोड़ों लोगों को प्रशिक्षित किया।

किसी भी बड़े लेखक, पत्रकार, साहित्यकार, कलाकार, चित्रकार, गायक, संगीतकार, नृत्यकार, नाटककार को समझने कि लिये अपने बौद्धिक स्तर को ऊपर उठाना ज़रूरी होता है। दूसरे, अपनी संवेदना को विकसित करना होता है। ठस बुद्धि और उथला हृदय लेकर न तो पाब्लो पिकासो की 'गुएर्निका' पेंटिंग को समझ सकते हैं और न ही मुक्तिबोध की कविताओं को। न भीमसेन जोशी के गायन को और न ही सैमुएल बैकेट के नाटकों को। अच्छी कृति को जानने-समझने के लिये संवेदनशील हृदय व विवेकवान बुद्धि भी होनी चाहिये। ललित सुरजन भी पाठकों से यह मांग करते हैं।

एक अच्छा लेखक वह होता है पाठक से मेहनत कराए। उनका लिखा पढ़ते वक्त संदर्भों की खोज करनी होती है, पृष्ठभूमि में जाना होता है और भविष्य का अनुमान भी लगाना होता है। ललित जी को पढ़ने, समझने तथा उन्हें आत्मसात करने के लिये अपने स्तर को ऊपर उठाना होता है। ऐसा नहीं कि वे अपात्र पाठकों को अकेले छोड़ देते हैं। वे उनका हाथ पकड़कर अपनी समझ के बराबर आने में मदद करते हैं, प्रेरित और प्रोत्साहित करते हैं। इसलिये ललित सुरजन के लेखों का जो मुरीद होता था वह बाकी अखबारों के सम्पादकीय और लेखों की ओर बहुत आकर्षित नहीं होता था।

ऐसे समय में जब कई अखबारों में सम्पादकीय और लेख या तो प्रकाशित ही नहीं होते, या ऐसे लिखे जाते हैं जिन्हें कोई पढ़ न सके; पढ़ भी ले तो उसे समझ न सके। लोगों को जागरूक करने या प्रबुद्ध लेखों से अब स्वयं अखबारों को एलर्जी है। मैं आप लोगों को यह कोई नयी बात नहीं बता रहा हूं कि अब ज्यादातर समाचारपत्रों के सम्पादकीय व लेख सत्ता की चौखट पर बैठकर लिखे जा रहे हैं। वैसे में देशबन्धु ने अपने संस्थापकों की परम्परा को कायम रखा है- सरकार से जवाब मांगने और लोक पक्षधारिता की परम्परा।

ललित जी की पत्रकारिता को समझना है तो पिछले कुछ सौ वर्षों में हुए वैश्विक बदलावों व घटनाक्रमों का अध्ययन तथा आने वाले समय का अनुमान लगाने की क्षमता होनी चाहिये। इनमें से एक है करीब 230 वर्ष पहले यानी 1789 से 1794 में हुई फ्रांसिसी राज्य क्रांति जिसने दुनिया को तीन शब्द दिये; और हर एक शब्द अपने आप में पूर्ण दर्शन है- लिबेरटे, एग्लिटे और फ्रातेर्निते- यानी लिबर्टी, इक्वेलिटी और फ्रेटर्निटी। ललित जी का पूरा लेखन और पत्रकारिता इन तीन महान दर्शनों से अंतर्गुंफित दिखलाई पड़ेगा। जीन जेक्वस रूसो एवं इम्येनुएल कांट ने जिस मानव स्वतंत्रता, नैतिकता तथा आधुनिक लोकतंत्र की नींव रखी थी, ललित सुरजन की पत्रकारिता की इमारत इसी पर खड़ी दिखेगी।

मध्य युग की यूरोपीय समाज की राजशाही, शोषण, अंधविश्वास, कुरीतियों, पिछड़ेपन के बाद जो प्रकाश फैला वह था 17वीं और 18वीं सदी का 'एरा ऑफ रीज़न' यानी ज्ञान का कालखंड। इस दौरान तर्क तथा वैज्ञानिक सोच ने जगह बनाई। इस दौर में हुए 'उदारवाद के जनक' कहे जाने वाले जॉन लॉक के स्वतंत्रता, जनता की सहमति से चलने वाली सीमित सरकार और प्राकृतिक अधिकारों के दर्शन ने दुनिया भर को प्रभावित किया। इसी दौर के वाल्टेयर के राजनीतिक दर्शन में तर्क, स्वतंत्रता और मानवीयता पर •ाोर दिया गया। ललित जी का वैचारिक ताना-बाना इन्हीं मूल्यों से बना है। सभी स्वतंत्र हैं, सभी समान हैं और समाज में भाई-चारा हो। ललित जी एक कदम आगे थे- वे वैश्विक एकता के समर्थक थे। नेहरू की तरह जिनके बारे में नौनिहाल फिल्म के लिये कैफ़ी आज़मी ने गीत लिखा था- मेरी आवाज़ सुनो। उसकी एक पंक्ति है-

'मेरी दुनिया में न पूरब है न पच्छिम है कोई,

सारे इंसान लिपट आये खुली बांहों में।'

दुनिया में खरे मायनों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण भी विकसित हुआ तो वह है आईसेक न्यूनट के महान आविष्कारों की बदौलत। इसी एरा ऑफ रीज़न के दौरान। यह साइंटिफिक टेम्पर हमें ललित जी के नज़रिये में बड़े पैमाने पर एवं मजबूत तरीके से मौजूद दिखता है। उन्होंने साहित्य-पत्रकारिता के अलावा जितने भी क्षेत्रों में काम किया उन सब का सरोकार इन्हीं राजनीतिक दर्शनों और विज्ञान सम्मत तार्किकता पर आधारित है।

उनके लेखन को समझने के लिये जिन बड़ी वैश्विक घटनाओं की जानकारी होनी ज़रूरी है, उनमें प्रमुख हैं- अमेरिका की स्वतंत्रता, वहां दास प्रथा की समाप्ति, अक्टूबर क्रांति, दोनों महासमर, राष्ट्र संघ व संयुक्त राष्ट्र संघ, शीत युद्ध, दो धु्रवीय दुनिया, गुटनिरपेक्ष आंदोलन, सार्क, सोवियत संघ का विघटन, नयी वैश्विक अर्थप्रणाली, परमाणु अप्रसार संधि, गैट, डब्ल्यूटीओ यानी वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गेनाइज़ेशन, बौद्धिक संपदा अधिकार से सम्बन्धित ट्रिप्स संधि, विश्व बैंक व अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष की नीतियां, कार्य प्रणाली और उसके प्रभाव- खासकर तीसरी दुनिया पर। और भी बहुत कुछ जानना होता है उन्हें जानने के लिये।

भारत के संदर्भ में देखें तो पत्रकारिता व साहित्य का नवजागरण काल, आजादी के दोनों संघर्ष, गांधी दर्शन, नेहरूवियन सोच व उनके नेतृत्व में भारत का नवनिर्माण, 1975 का आपातकाल तथा केन्द्र में मोरारजी देसाई की पहली गैर कांग्रेसी सरकार, उसका गिरना, इंदिरा गांधी की वापसी, राजीव गांधी काल, मनमोहन सिंह सरकार के काम, 2011 का लोकपाल आंदोलन और नरेन्द्र मोदी शासनकाल के 8 साल (यानी उनके निधन तक) ललित जी के आवश्यक संदर्भ बिन्दु हैं।

ललित जी जैसे बहुत कम सम्पादक होंगे जो पाठकों से यह प्रत्याशा रखते हैं कि उन्होंने थोड़ा बहुत कार्ल मार्क्स, चार्ल्स डार्विन, सिगमंड फ्रायड, सिमॉन द बुवा, एडम स्मिथ से लेकर गांधी की जीवनी, जॉन रस्किन के 'अन टू दिस लास्ट' का उनका किया अनुवाद 'सर्वोदय, 'हिंद स्वराज', 'नेहरू की डिस्कवरी ऑफ इंडिया', 'विश्व इतिहास की झलक', 'लैटर्स ऑफ ए फादर टू हिज़ डॉटर', 'मेरी कहानी', ज्योतिबा फुले की 'गुलामगिरी' को पढ़ा हो। मानव गतिविधियों के विभिन्न क्षेत्रों के प्रमुख लोगों, कार्यों और परिघटनाओं का ज्ञान हुए बगैर आप ललित जी के लेखों को पढ़ने की हिमाकत कर ही नहीं सकते।

ललित जी के लेखन का प्राण तत्व भारतीय संविधान है- स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व और धर्मनिरपेक्षता। इन अमृत तत्वों के लिये ललित जी की कलम की स्याही कभी भी फीकी नहीं पड़ी। लोकतंत्र की रक्षा के साथ मानव को सामाजिक बनाना तथा समाज को मानवीय बनाना उनके लेखन का सार तत्व है। यानी एक न्यायपूर्ण समाज की स्थापना। मजेदार बात यह है कि उनका लेखन बौद्धिकता की मांग करने के बावजूद आपको बोझिलता से आतंकित नहीं करता बल्कि आपको उन्हें डिकोड करने की प्रेरणा देते हैं।

मीडिया के लिये सत्ता-समर्थन का रास्ता आसान होता है। कठिन तो विपक्ष का रास्ता होता है- कांटों भरा। इसलिये ज्यादातर अखबारों के लेख सत्ता की हां में हां मिलाने वाले हैं। देशबन्धु उस रास्ते पर चल ही नहीं सकता क्योंकि उस पर ललित जी की विरासत को आगे बढ़ाने की चाहना बची हुई है और नैतिक दबाव बचा हुआ है। 'दो आंखें बारह हाथ' की तरह ललित जी की आंखें हम पर आज भी नज़र बनाये हुए है। भवानी प्रसाद मिश्र जी की कविता है-

कुछ लिखकर सो, कुछ पढ़कर सो,

तू जिस जगह जागा, उस जगह से बढ़कर सो।'

ललित सुरजन का लेखन बढ़ी हुई जगह पर जागने की ताज़गी की अनुभूति और आनंद प्राप्ति का नाम है।

(लेखक देशबन्धु के राजनीतिक संपादक हैं। यह लेख छग प्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन द्वारा रायपुर में स्व. सुरजन की 80वीं जयंती पर आयोजित कार्यक्रम में पढ़े गये उनके भाषण पर आधारित है।)

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