ललित सुरजन की कलम से हिमाचल प्रदेश-2 : आरामकुर्सी पर पसरा जलप्रपात
हम जब धर्मशाला पहुंचे थे तब मौसम खुला हुआ था, लेकिन रात अच्छी-खासी बारिश हुई थी, सुबह भी रिमझिम हो रही थी।;
हम जब धर्मशाला पहुंचे थे तब मौसम खुला हुआ था, लेकिन रात अच्छी-खासी बारिश हुई थी, सुबह भी रिमझिम हो रही थी। हम छाता-बरसाती लेकर घूमने के लिए निकल पड़े। धर्मशाला पार कर बारह-पन्द्रह किलोमीटर दूर मैक्लॉडगंज पहुंचे। वहां तिब्बती दुकानों की गहमागहमी के अलावा कोई विशेष आकर्षण प्रतीत नहीं हुआ तो तंग सड़कों से निकलते हुए दो किलोमीटर आगे भागसू नाग की तरफ बढ़ गए। वहां भी खूब भीड़ और धक्का-मुक्की। एक जगह गाड़ी रोककर पैदल चले। भागसू नाग का मंदिर प्रसिद्ध है, उसके साथ किंवदंतियां जुड़ी हुई है। मंदिर पुराना ही होगा, लेकिन बाहर से एकदम नया। संगमरमर की टाइल्स चारों तरफ, ऊपर जाने के लिए संकरी सीढ़ियां। वहां भीगते हुए जाने का मन नहीं हुआ।
कुछ और आगे चलकर भागसू जलप्रपात पर हम पहुंच गए। वह एक अत्यंत मनोहारी दृश्य था। सामान्य तौर पर जलप्रपात लगभग नब्बे डिग्री के कोण पर उतरते हैं, लेकिन भागसू प्रपात अनुपम था। बहुत ऊपर से जलराशि धीरे-धीरे तिरछे नीचे उतरती है मानो कोई आरामकुर्सी पर पैर पसार कर लेटा हो। इस कोण से उतरने पर जलप्रपात को एक लंबा आकार मिल जाता है। नीचे उतरकर वह बांयी ओर मुड़कर फिर एक खड्ड का स्वरूप ले लेता है। भागसू प्रपात को हम बहुत देर तक मुग्धभाव से निहारते रहे।
(देशबन्धु में 24 अगस्त 2017 को प्रकाशित)
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