ललित सुरजन की कलम से यात्रा वृत्तांत: बूढ़ा पीपल और बूढ़ा पुल
'मैं एक लंबे अरसे बाद दिन के समय ट्रेन से कोलकाता की दिशा में जा रहा था।;
'मैं एक लंबे अरसे बाद दिन के समय ट्रेन से कोलकाता की दिशा में जा रहा था। रायपुर से बाहर निकलते साथ कारखानों का सिलसिला प्रारंभ हो जाता है- मांढर, बैकुंठ, फिर शिवनाथ के पुल के पार; उधर बिलासपुर के आगे दोनों तरफ कारखानों की चारदीवारियाँ और चिमनियाँ। भूपदेवपुर, किरोड़ीमल नगर, रायगढ़, कोतरलिया के आसपास की तस्वीर तो पूरी तरह बदल चुकी है, छत्तीसगढ़ की सीमा पार करने के बाद भी बेलपहाड़, हिमगिर के आगे काफी दूर तक यह सिलसिला जारी रहता है। यहां सिर्फ कारखाने ही स्थापित नहीं हुए हैं, रेल लाइनों का विस्तार कार्य भी चल रहा है। साल के बेशकीमती जंगल धीरे-धीरे कर नष्ट हो रहे हैंं। जहां संयंत्र चालू हैं, वहां धुएं के बादलों के पार कुछ दिखाई नहीं देता।'
'छत्तीसगढ़, ओडिशा, झारखंड का यह इलाका खनिज संपदा का धनी है। जो बेतहाशा माइनिंग हाल के बरसों में हुई है, उससे जंगल तो कटे ही, हाथी व अन्य वन्य प्राणियों की रिहाइशें भी खत्म हो गईं। आज जशपुर से लेकर अंबिकापुर और इधर सिरपुर तक हाथी आ रहे हैं, उसका प्रमुख कारण यही है। विकास की कीमत हम इस तरह चुका रहे हैं और शायद आगे भी चुकाते रहेंगे!! ट्रेन में यही सोचते-सोचते जो नींद आई तो सुबह बिहार के किसी गांव के आसपास खुली। धान के खेतों में पानी लबालब भरा था। अनुमान लगा कि यहां बारिश पर्याप्त हो चुकी है।'
(देशबन्धु में 05 अक्टूबर को प्रकाशित)
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