जनता उठ कर खड़े हो, वर्ना लुटना तय है
सवाल केवल वोट चोरी का ही नहीं है। यह भारत के लोकतंत्र और उसकी संस्थाओं पर मोदी सरकार के कब्जे का है।;
सवाल केवल वोट चोरी का ही नहीं है। यह भारत के लोकतंत्र और उसकी संस्थाओं पर मोदी सरकार के कब्जे का है। गौरतलब है कि पहले बाकी विपक्ष राहुल के साथ नहीं था। लेकिन हरियाणा और महाराष्ट्र के बाद जब भाजपा विरोधी खेमे ने दिल्ली, बिहार, बंगाल सारे राज्यों में मात खाई तो सारे विपक्षी दलों को समझ आया कि राहुल गांधी जो आरोप 2024 के लोकसभा चुनावों से लगाते आए हैं, वो बेबुनियाद नहीं हैं।
चोर जब घर के भीतर तक घुस आएं और घर वाले फिर भी आराम से पड़े हुए यह सोचते रहें कि चोरी रोकने के लिए पुलिस वाले आएंगे, हम उनका काम क्यों करें, तो तय है कि घर का सारा सामान लुट जाएगा। इसके बाद घर वाले पछतावा करें कि हमने किसी और का इंतजार क्यों किया, क्यों अपनी संपत्ति बचाने के लिए हम खुद खड़े नहीं हुए, तो इस पछतावे का कोई मतलब नहीं रह जाएगा। बड़े बुजुर्गों ने इसलिए कहा है कि अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत। देश का मौजूदा माहौल तो ऐसा ही बन चुका है कि लोकतंत्र की लहलहाती फसल को पूरी तरह बर्बाद किया जा चुका है। पूरा खेत लोकतंत्र के दुश्मन टिड्डी दल, गिद्धों, बाजों ने खत्म कर दिया है।
अंग्रेजी अखबार द इंडियन एक्सप्रेस की बुधवार को प्रकाशित खोजी रिपोर्ट इसी बर्बादी की और उन्हीं आरोपों की पुष्टि करती हुई नजर आती है, जो राहुल गांधी एक अरसे से लगा रहे हैं। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि दो चुनाव आयुक्तों चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने '10 महीने में 14 बार चुनाव आयोग के कदमों को लेकर आपत्ति' दर्ज कराई है। इन दोनों चुनाव आयुक्तों ने खुद को अंधेरे में रखने से लेकर नए मतदाताओं को जोड़ने और नाम हटाने को लेकर दर्ज कराईं और 'अनधिकृत, गैरकानूनी' कदमों पर सवाल उठाए। जाहिर है ये सवाल मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर ही उठाए गए हैं।
जून 2025 में बिहार से शुरू हुई एसआईआर प्रक्रिया यानी मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण में अब तक 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की मसौदा मतदाता सूचियों से 13 करोड़ से अधिक नाम हटाए जा चुके हैं। हालांकि जिन लोगों के नाम हटाए गए हैं उन्हें इसके ख़िलाफ़ अपील करके अपना जवाब देने का विकल्प दिया गया है, लेकिन यह किसी भी तरह व्यावहारिक नहीं है। क्योंकि इन अपीलों पर फैसला आने में वक्त लग रहा है और चुनाव में लाखों योग्य मतदाता वोट ही नहीं डाल पा रहे। यह सीधे-सीधे लोकतांत्रिक चुनावी प्रक्रिया को खत्म करने का ही कदम है। 'द इंडियन एक्सप्रेस' की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि इन मुद्दों पर तीन सदस्यीय चुनाव आयोग के भीतर भी बार-बार सवाल उठाए गए थे और आपत्तियां दर्ज की गई थीं। राहुल गांधी कई बार कह चुके हैं कि वोटर लिस्ट से नाम काटना वोट चोरी है और यह देशद्रोह है। राज्यसभा में भी 24 अप्रैल 2026 को 73 विपक्षी राज्यसभा सांसदों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए सेक्रेटरी जनरल को नया नोटिस ऑफ मोशन सौंपा था। लेकिन अब तक संसद का मानसून सत्र ही औपचारिक तौर पर समाप्त नहीं हुआ है। तो सवाल है कि क्या माननीय राज्यसभा सभापति अब उस लंबित नोटिस पर निर्णय लेंगे?
अब सवाल केवल वोट चोरी का ही नहीं है। यह भारत के लोकतंत्र और उसकी संस्थाओं पर मोदी सरकार के कब्जे का है। गौरतलब है कि पहले बाकी विपक्ष राहुल के साथ नहीं था। लेकिन हरियाणा और महाराष्ट्र के बाद जब भाजपा विरोधी खेमे ने दिल्ली, बिहार, बंगाल सारे राज्यों में मात खाई तो सारे विपक्षी दलों को समझ आया कि राहुल गांधी जो आरोप 2024 के लोकसभा चुनावों से लगाते आए हैं, वो बेबुनियाद नहीं हैं। राहुल गांधी के पिछले डेढ़-दो सालों के वीडियो और बयानों को खंगाल लीजिए, संसद से लेकर चुनावी मंच, प्रेस कांफ्रेंस या छात्रों की गूंज जैसे कार्यक्रमों में हर जगह उन्होंने लगातार यही कहा है कि देश में वोट चोरी की जा रही है। देश के सिस्टम पर जिन पांच-छह लोगों ने कब्जा कर रखा है, वो एक गिरोह की तरह देश को लूट रहे हैं। इस लूट में प्राकृ तिक संसाधनों और आम जनता की जमा-पूंजी की लूट ही शामिल नहीं है, इससे बढ़कर संविधान को खत्म करने और लोकतंत्र का हक लूटने का काम भी हो रहा है। सबसे दुख की बात यह है कि इस लूट में कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका यानी लोकतंत्र के तीनों स्तंभों का बराबर का अपराध नजर आ रहा है। अगर सत्ता में बैठे लोग कुर्सी पर बने रहने के लिए लूट की साजिशें बना रहे हैं, तो प्रशासनिक अधिकारी, संवैधानिक संस्थाएं उन्हें रोक सकती हैं। लेकिन पद, पैसा या अन्य किसी दबाव में कई अधिकारी भी इसमें शामिल हो गए। संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता को सत्ता के पैरों में रख दिया गया। हालात फिर भी संभल सकते थे अगर न्यायपालिका इसमें वक्त रहते दखल देती। चुनाव चोरी की तमाम अलग-अलग कोशिशों पर पिछले दो सालों में कई किस्म की याचिकाएं दाखिल हो चुकी हैं। ईवीएम, इलेक्टोरल बॉन्ड्स, राजनैतिक दलों को तोड़ने, विधायकों-सांसदों की खरीद-फरोख्त, एसआईआर जैसी तमाम चुनावी या सियासी गड़बड़ियों पर दर्जनों याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट तक पहुंची। हर सुनवाई के वक्त उम्मीद बंधी कि शायद इस खुली लूट पर अदालत ही कोई रोक लगाए। अगर ऐसा होता तो हालात काफी बेहतर होते। लेकिन एक भी फैसला ऐसा नहीं आया जो लुटेरों के लिए बेड़ियों का काम करता। बल्कि हर सुनवाई के बाद लुटेरों का हौसला और बुलंद होता गया। उन्हें यकीन हो गया कि इस लूट में न्यायपालिका भी साथ देगी।
चंडीगढ़ मेयर चुनाव में पीठासीन अधिकारी अनिल मसीह का वीडियो सुप्रीम कोर्ट समेत पूरे देश ने देखा था। जिसमें भाजपा की जीत के लिए वो मतसूची से कांग्रेस और आप के आठ वोटों को काटते दिखे थे। इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने अनिल मसीह के खिलाफ नोटिस जारी किया। इसे लोकतंत्र की हत्या करार दिया था। लेकिन अब वही अनिल मसीह मनोनीत पार्षद बनाए जा चुके हैं। अब हालात ऐसे बन चुके हैं कि लोकतंत्र का कत्ल केवल चंडीगढ़ में नहीं हुआ, बल्कि पूरे देश में साजिशन इसे मारने की कवायद शुरु हो चुकी है। इस साजिश का नाम एसआईआर है। बिहार में चुनाव से पहले जब सबसे पहले एसआईआर करवाने का काम शुरु हुआ था, तभी सवाल उठे थे कि जब इसी लिस्ट पर लोकसभा चुनाव हो चुके हैं तो फिर विधानसभा चुनाव से पहले इस लिस्ट को फिर से परखने की क्या जरूरत। अगर यह कवायद शुरु करना जरूरी ही है तो किसी ऐसे राज्य से इसे शुरु किया जाए, जहां चुनावों में वक्त है। इसमें अगर किसी को अपने कागजात दुरुस्त करके दिखाने हैं तो उसे वक्त भी मिलेगा। लेकिन ऐसे तर्क तो उसी के सामने काम आएंगे, जिसकी नीयत लोकतंत्र को मजबूत करने की है। जिसका लोकतंत्र को खत्म कर तानाशाही कायम करने का खतरनाक इरादा हो, उसे ऐसे तर्कों से भला क्या काम। लिहाजा बिहार में चुनावों से पहले एसआईआर हुआ, इसमें लाखों लोगों के नाम कट गए। राहुल गांधी और तेजस्वी यादव ने तब वोटर अधिकार यात्रा निकाली थी, जिसमें तमाम विपक्षी दलों के नेता अलग-अलग वक्त में शामिल हुए। माहौल ऐसा बना कि अब भाजपा और चुनाव आयोग पर दबाव बनेगा और इस यात्रा का सार्थक नतीजा निकलेगा। लेकिन ऐसा बिल्कुल भी नहीं हुआ। इस यात्रा में ही विपक्ष के किसी दुश्मन ने नरेन्द्र मोदी की मां पर टिप्पणी की, जिसका वीडियो वायरल करने और मोदी के पक्ष में माहौल बनाने का काम गोदी मीडिया ने किया। फिर सारा विमर्श स्त्री सम्मान पर आ गया। वोट चोरी का मुद्दा दबाया गया। बाद में भाजपा की बड़ी जीत ने सारे सवालों को दबा दिया। हालांकि सुप्रीम कोर्ट में विपक्ष उन जिंदा लोगों को बतौर सबूत ले कर आया, जिन्हें मृत बताकर वोटर लिस्ट से हटा दिया गया था, लेकिन फिर भी कोई सही फैसला नहीं आया, जिससे उम्मीद बंधती कि ऐसी गलत कवायद पर रोक लगेगी।
अब तो खैर पानी सिर के ऊपर से जा चुका है। नरेन्द्र मोदी तो अपने लिए स्थायी सत्ता का इंतजाम करने के लिए सारे नियम-कानूनों को ताक पर रख चुके हैं, संवैधानिक संस्थाओं का किस तरह क्षरण हो गया है, यह भी जाहिर है। छात्र संघ से लेकर पंचायत, नगरीय निकाय समेत हर छोटे-बड़े चुनाव में धांधली, दबाव, लूट-खसोट भाजपा की जीत का औजार बन चुकी है। मीडिया में भी पैसे का ही खेल खेला जा रहा है, करोड़ों के पैकेज पर गुलाम बनाए जा चुके पत्रकारों से निष्पक्ष रिपोर्टिंग की उम्मीद नहीं की जा सकती। तो अब रास्ता एक ही बचता है कि जनता खुद अपना वोट देने का हक बचाने के लिए जागे। राहुल गांधी या विपक्ष का कोई भी नेता केवल राह दिखा सकता है, साथ आने का आह्वान कर सकता है। मगर इससे हालात नहीं बदलेंगे। जनता को ही उठकर खड़े होना होगा। जंतर-मंतर पर देश के युवाओं ने एक राह देश को दिखाई है। तमाम शारीरिक-मानसिक ज्यादतियां झेलकर भी युवा डरे नहीं, डटे रहे। अब यही हौसला जनता दिखाए तो लोकतंत्र का घर बचेगा। वर्ना लुटेरे घर के भीतर आकर लाखों वोटों को लूट ही चुके हैं।