भारतीय कूटनीति का नया क्षितिज : ब्रिक्स सम्मेलन

आज का भारत वैश्विक कूटनीतिक धरातल पर अपनी समभाव की भावना को आगे बढ़ाने में सर्वोपरि रहा है।;

By :  DB Desk
Update: 2026-09-23 21:40 GMT
  • डॉ.नीरज कुमार मिश्र

इस सम्मेलन की सफलता का प्रतिफलन यह है कि व्यापारिक नवोन्मेष और वित्तीय संप्रभुता के साथ आर्थिक और व्यापारिक मोर्चों पर भारत ने व्यापारिक लेन-देन में दूसरे देशों की मुद्रा पर निर्भरता कम करने की बात पर बल दिया है। ब्रिक्स के सदस्य देशों के बीच लोकल करेंसी सेटलमेंट सिस्टम को और मजबूत करने के साथ, देश से बाहर डिजिटल भुगतान प्रणालियों के आपसी जुड़ाव और वैश्विक ऊर्जा एवं आपूर्ति श्रृंखला को सुचारू बनाए रखने जैसे मुद्दों पर आपसी बातचीत से एक ऐतिहासिक सहमति बनती दिख रही है।

यथा शिखा मयूराणां नागानां मणयो यथा'-जिस प्रकार मोरों में कलगी और नागों में मणि का स्थान सर्वोपरि है, ठीक उसी प्रकार समकालीन राजनीति के इस दौर में आज का भारत वैश्विक कूटनीतिक धरातल पर अपनी समभाव की भावना को आगे बढ़ाने में सर्वोपरि रहा है। नई दिल्ली के प्रगति मैदान स्थित भव्य 'भारत मंडपम' में संपन्न हुआ 18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन महज़ अंतरराष्ट्रीय देशों की मेज़बानी करने तक ही सीमित नहीं था,बल्कि यह बदलते राजनैतिक परिदृश्य में भारत की कूटनीतिक दूरदर्शिता और वैचारिक नेतृत्व के एक नए क्षितिज का निर्माण भी कर रहा था। पारस्परिक लचीलापन, सकारात्मक नवाचार,आपसी सहयोग आदि मूलमंत्र के साथ,'नई दिल्ली घोषणापत्र' पर सभी सदस्य देशों की सर्वसम्मति को कूटनीति के क्षेत्र में भारत की एक अद्वितीय और निर्णायक पहल के रूप में देखा जा सकता है। आज के दोहरे वैश्विक संकटों, जिनमें पश्चिम एशिया में अमेरिका-इजरायल के साथ ईरान का युद्ध और पूर्वी यूरोप में रूस-यूक्रेन संघर्ष प्रमुख हैं। ऐसी उम्मीद की जा रही है कि इस शिखर सम्मेलन में इन संकटों के बीच एक साझा आम सहमति बनाने की कोशिश वैश्विक पटल पर शांति के क्षेत्र में नई संजीवनी की तरह काम करेगी। जिससे वैश्विक पटल पर शांति के नए द्वार खोले जा सकते हैं।

इस सम्मेलन समूचे नीतिगत ढांचे के आधार पर यह कहा जा सकता है कि भारत मंडपम केवल वैश्विक देशों के भाषणों का मंच ही नहीं बनकर रह गया,बल्कि वह ब्रिक्स देशों के आपसी संबंधों का नया ताना-बाना तैयार करने के साथ, इन संबंधों को सुधारने और द्विपक्षीय विमर्श को एक नई दिशा-दशा तय करने वाली प्रयोगशाला भी बनाकर उभरा। सीमाई गतिरोधों को दूर करने और पूर्व-स्थापित समझौतों का सम्मान करने की पृष्ठभूमि में भारत और चीन के बीच हुई गंभीर बातचीत ने यह दर्शाया है कि कूटनीतिक परिपक्वता के आलोक में आपसी संबंधों के बीच घिर आए बादलों से उपजे अंधेरे को दूर किया जा सकता है।

आज अमेरिकी प्रतिबंधों से अनेक देश प्रभावित हैं। भारत इससे अछूता नहीं है। ऐसा माना जा रहा है कि इन प्रभावित देशों के साथ भारत का सकारात्मक संवाद आपस के आपसी समन्वय की गति को बढ़ाने वाला साबित होगा। इस संवाद को कूटनीतिक स्वायत्तता की नई मिसाल की तरह देखा जा रहा है। वहीं, ब्रिक्स के नए सदस्य देशों के साथ भारत ने अपने पारंपरिक ऊर्जा संबंधों में सुधार करते हुए एक नए मैत्रीपूर्ण सेतु को तैयार करने का महत्वपूर्ण काम किया है।

इस सम्मेलन की सफलता का प्रतिफलन यह है कि व्यापारिक नवोन्मेष और वित्तीय संप्रभुता के साथ आर्थिक और व्यापारिक मोर्चों पर भारत ने व्यापारिक लेन-देन में दूसरे देशों की मुद्रा पर निर्भरता कम करने की बात पर बल दिया है। ब्रिक्स के सदस्य देशों के बीच लोकल करेंसी सेटलमेंट सिस्टम को और मजबूत करने के साथ, देश से बाहर डिजिटल भुगतान प्रणालियों के आपसी जुड़ाव और वैश्विक ऊर्जा एवं आपूर्ति श्रृंखला को सुचारू बनाए रखने जैसे मुद्दों पर आपसी बातचीत से एक ऐतिहासिक सहमति बनती दिख रही है। इसलिए यह कहा जा सकता है कि यह सम्मेलन सामाजिक,आर्थिक, राजनैतिक,सांस्कृतिक,सामरिक,भौगोलिक और साहित्यिक जैसे अनेक क्षेत्रों के बीच पनप रही चेतना के अद्भुत संगम की तरह हमारे सामने खड़ा अपनी सफलता का जश्न मना रहा है। इसी के फलस्वरूप इस सम्मेलन में मानवीय सरोकारों के स्तर पर,भारत ने खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए 'ब्रिक्स ग्रेन एक्सचेंज' और महामारी से निपटने के लिए एक त्वरित वैक्सीन सहयोग नेटवर्क का प्रस्ताव भी रखकर महत्वपूर्ण पहल की है। ऐसे में हम यदि सांस्कृतिक और साहित्यिक के रूप में इस सम्मेलन की बात करें तो लंबे समय से वैश्विक अकादमिक विमर्श और राजनैतिक-ऐतिहासिक आख्यानों पर पश्चिमी जगत का एकाधिकार रहा है।

भारत ने न केवल इस एकाधिकार के बरक्स सदस्य देशों के विचारकों, इतिहासकारों और साहित्यकारों को एक मंच प्रदान किया,बल्कि खुद भी इस एकाधिकार का हमेशा से विरोध करता चला आ रहा है। इस सम्मेलन का उद्देश्य पूर्व और विकासशील देशों के अपने समृद्ध दर्शन, मत, वैचारिक सरोकार और समकालीन सामाजिक-साहित्यिक परिप्रेक्ष्य को वैश्विक मुख्यधारा में उनका सही व सम्मानजनक स्थान दिलाना था। इस ब्रिक्स सम्मेलन से यह संदेश संप्रेषित हुआ कि से सांस्कृतिक और साहित्यिक रूप से भारत एक मजबूत सहयोगी की तरह सबके साथ खड़ा है। क्योंकि इस सम्मेलन ने केवल वर्तमान की समस्याओं का समाधान नहीं किया,बल्कि भविष्य की नई संभावनाओं की तरफ भी सबका ध्यान खींचा। ब्रिक्स देशों के इस मंच से भविष्य की नई संभावनाओं के साथ एक न्यायसंगत मंच का एकजुटता दिखाते हुए शक्ति की मौलिक संकल्पना के साथ उभरना एक ऐतिहासिक परिवर्तन के रूप में देखा जा रहा है। इस मंच से एक वैकल्पिक वैश्विक शासन का ऐसा ढांचा बनाने में मदद मिली। जिसके फलस्वरूप आपसी सहयोग के मजबूत होने से भविष्य में एक ऐसा लोकतांत्रिक ढांचा तैयार हो रहा है,जो पश्चिमी देशों के एक तरफा प्रतिबंधों और संरक्षणवाद के खिलाफ विकासशील देशों को एक सुरक्षा कवच बनकर उभरेगा साथ ही ब्रिक्स देशों ने इस मंच पर 'मिशन लाइफ' और जलवायु परिवर्तन के सिद्धांतों को अपनाकर भविष्य में हरित ऊर्जा और पर्यावरण-अनुकूलन जैसे नवाचारों के लिए नए निवेश और संयुक्त अनुसंधान के नए द्वार खोलने का महती काम किया है। ब्रिक्स 2026 में अंतरराष्ट्रीय व्यापार को लोकतंत्रीकरण की राह में चलने का आह्वान किया। इसकी सहायता से आने वाले समय में स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ने और वैश्विक व्यापार में किसी एक मुद्रा के वर्चस्व से मुक्त होकर संतुलित और समावेशी रास्ता अपनाने पर जोर दिया।

इस सम्मेलन के समूचे पहलुओं के आधार पर कहा जा सकता है कि भारत आज उस वैश्विक मुकाम पर अवस्थित है, जहां उसकी शांतिप्रियता कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी अटूट आर्थिक-सामरिक शक्ति और कूटनीतिक सामर्थ्य का परिचायक है। ऐसे में राष्ट्रकवि रामधारी सिंह 'दिनकर' की यह प्रसिद्ध पंक्तियां आज के सशक्त,समन्वयक और मध्यस्थ भारत की कूटनीतिक स्थिति पर सटीक बैठती प्रतीत होती हैं-'क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो/ उसका क्या जो दंतहीन विषरहित विनीत सरल हो।'

दो दिन चले इस मंथन में भारत ने अपनी चाणक्य सरीखी नीति के माध्यम से यह सुनिश्चित किया कि ब्रिक्स किसी एक विचारधारा या देश के प्रभुत्व में न आकर,वह वैश्विक कल्याण की भावना,नवीन नवाचार और सतत विकास के लिए एक व्यावहारिक और सहयोगी मंच के रूप में सबके साथ खड़ा रहे। इस सम्मेलन के माध्यम से 'भारत मंडपम' से निकला मैत्री का यह उद्घोष आने वाले दशकों तक अंतरराष्ट्रीय राजनीति, अर्थशास्त्र, सामरिक दृष्टि, संस्कृति और वैश्विक चिंतन की दशा-दिशा तय करने में मील का पत्थर साबित होगा। अदम गोंडवी से माफ़ी मांगते हुए उनके शब्दों में कुछ बदलाव के साथ अपनी बात खत्म करूंगा कि-

जो उलझकर रह गई है फाइलों के जाल में,

भारत की कूटनीति मुस्कुराई मंडपम के हाल में।

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