राजनीतिक दखलंदाजी से खराब होता टाटा गु्रप का नाम

टाटा गु्रप में हुए हाल के घटनाक्रम से कई लोगों को बेचैनी महसूस हो सकती है।;

Update: 2026-09-25 21:40 GMT

चंद्रशेखरन के समर्थक शायद यह तर्क देंगे कि बोर्ड के बहुमत ने अपनी बात कह दी है, ट्रस्ट्स के एक नॉमिनी ने उनका समर्थन किया था और कंपनी की कमान संभालने के दौरान उनका रिकॉर्ड शानदार रहा है। इनमें से कोई भी बात असल सवाल का समाधान नहीं करती। विवाद उनके रिकॉर्ड को लेकर नहीं, बल्कि नियमों को लेकर है। ट्रस्ट्स के नज़रिए से देखें तो ऐसी ही स्थितियों के लिए एओए में जो सुरक्षा उपाय लिखा गया था उसे टाटा संस के बोर्ड ने नज़रअंदाज़ कर दिया है।

टाटा गु्रप में हुए हाल के घटनाक्रम से कई लोगों को बेचैनी महसूस हो सकती है। इस मामले में दो तारीखें, एक अजीब मोड़ और एक साफ़ सवाल अहम हैं- इस साल 12 अगस्त और 17 सितंबर के बीच ऐसा क्या हुआ कि टाटा संस के चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन को अगले पांच साल के कार्यकाल के लिए चेयरमैन बने रहने के फैसले पर अचानक यू-टर्न लेना पड़ा? पहली तारीख को चंद्रशेखरन ने कहा था कि वे मौजूदा कार्यकाल के बाद चेयरमैन पद के लिए दोबारा नियुक्ति की पेशकश नहीं करेंगे क्योंकि उन्हें सभी का समर्थन नहीं मिल रहा था। दूसरी तारीख, एक नए कार्यकाल को सार्वजनिक रूप से स्वीकार करने की घटना है जबकि मुख्य शेयरहोल्डर लगातार और ज़ोरदार विरोध कर रहे थे। उनका विरोध नोएल एन. टाटा कर रहे हैं जो टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन हैं। टाटा ट्रस्ट्स के पास टाटा संस की लगभग 66 प्रतिशत हिस्सेदारी है। आसान शब्दों में कहें तो यह एक प्रोफेशनल चेयरमैन का मामला है जो तब भी पद पर बने रहना चाहते हैं जब बहुमत वाले मालिक उनसे हटने के लिए कह रहे हों। वह मालिक कोई परिवार नहीं बल्कि कई चैरिटेबल ट्रस्ट हैं जिनका मॉडल बहुत मशहूर है और वे मिलने वाले डिविडेंड से अस्पतालों, रिसर्च और राहत कार्यों के लिए फंड देते हैं।

चंद्रशेखरन की नियुक्ति में सत्ता हथियाने की बू आती है और इसके पीछे सबसे ऊंचे स्तरों से पक्षपाती राजनीतिक दल दख़ल का डर भी है। ऐसी घटनाएं किसी भी संस्था के लिए तबाही का संकेत हो सकती हैं, लेकिन जब टाटा कंपनियों की मुख्य निवेश होल्डिंग कंपनी और प्रमोटर जैसी कंपनी 'टाटा संस' में ऐसा होता है तो दांव कहीं ज़्यादा बड़े होते हैं।

टाटा संस के बोर्ड में टाटा ट्रस्ट्स का एक और नॉमिनी है- उद्योगपति वेणु श्रीनिवासन, जो टाटा ट्रस्ट्स के वाइस चेयरमैन भी हैं। उन्होंने चंद्रशेखरन को एक्सटेंशन देने के पक्ष में वोट दिया। लेकिन नोएल टाटा का 'नहीं' कहना अहम है क्योंकि टाटा सन्स के 'आर्टिकल्स ऑफ़ एसोसिएशन' के तहत बोर्ड के किसी भी फ़ैसले को टाटा संस बोर्ड में मौजूद टाटा ट्रस्ट्स के नॉमिनीज़ के बहुमत की मंज़ूरी मिलनी ज़रूरी है। यह जानना जरूरी है कि जब टाटा ट्रस्ट्स के दो नॉमिनी अलग-अलग वोट देते हैं तो क्या होता है? आर्टिकल्स को सीधे तौर पर पढ़ने पर स्पष्ट होता है कि प्रस्ताव गिर जाना चाहिए क्योंकि यदि दो ही वोट हों तो एक वोट बहुमत नहीं होता। लेकिन कहा जा रहा है कि प्रस्ताव पास हो गया है और अभी के लिए तो लागू भी है। इससे बोर्डरूम में एक ऐसी लड़ाई शुरू हो गई है जिसका पूरे ग्रुप पर बुरा असर पड़ेगा।

यह लड़ाई बहुत निष्ठुर तरीके से लड़ी जाएगी। रविवार 20 सितंबर को टाटा ट्रस्ट्स ने एक बयान जारी कर कहा कि चंद्रशेखरन की नियुक्ति शुरू से ही अमान्य थी क्योंकि ऐसे फैसले बोर्ड के सदस्यों की साधारण गिनती से नहीं लिए जा सकते। बयान में कहा गया है कि टाटा संस की रूल बुक के अनुसार 'कोई भी फैसला तब तक नहीं लिया जा सकता जब तक कि उसे टाटा ट्रस्ट्स द्वारा नॉमिनेट किए गए डायरेक्टर्स में से कम से कम बहुमत का समर्थन न मिले।' चंद्रशेखरन के खिलाफ़ ट्रस्ट्स का सार्वजनिक रूप से और इतने साफ शब्दों में बोलना यह दिखाता है कि रिश्ते कितने खराब हो चुके हैं।

चंद्रशेखरन के समर्थक शायद यह तर्क देंगे कि बोर्ड के बहुमत ने अपनी बात कह दी है, ट्रस्ट्स के एक नॉमिनी ने उनका समर्थन किया था और कंपनी की कमान संभालने के दौरान उनका रिकॉर्ड शानदार रहा है। इनमें से कोई भी बात असल सवाल का समाधान नहीं करती। विवाद उनके रिकॉर्ड को लेकर नहीं, बल्कि नियमों को लेकर है। ट्रस्ट्स के नज़रिए से देखें तो ऐसी ही स्थितियों के लिए एओए में जो सुरक्षा उपाय लिखा गया था उसे टाटा संस के बोर्ड ने नज़रअंदाज़ कर दिया है। ऐसे मामले में चेयरमैन का नया कार्यकाल संभालना उस गवर्नेंस को ही कमज़ोर करता है जिसे उन्हें खुद अपनाना और लागू करना चाहिए।

यह विवाद लिस्टिंग से जुड़ा है। रिजर्व बैंक के नियमों के अनुसार, 'अपर लेयर एनबीएफसी' गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी (नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनी) को लिस्ट होना ज़रूरी है और सेंट्रल बैंक ने टाटा संस को इसी कैटेगरी में रखा है जबकि कंपनी ने अपना कज़र् चुका दिया है और इसलिए एनबीएफसी के तौर पर अपना रजिस्ट्रेशन रद्द करने के लिए आवेदन किया है। रजिस्ट्रेशन रद्द करने की मंज़ूरी मिलने का मतलब होगा कि टाटा संस पर लिस्ट होने का कोई दबाव नहीं रहेगा और टाटा ट्रस्ट्स यही चाहते हैं जो टाटा का पुराना नज़रिया भी रहा है। लेकिन रजिस्ट्रेशन रद्द करने के इस आवेदन को रिजर्व बैंक ने दो साल से ज़्यादा समय तक पेंडिंग रहने के बाद और 17 सितंबर की अहम बोर्ड मीटिंग से कुछ दिन पहले इसी सितंबर में रिजेक्ट कर दिया। रिजर्व बैंक ने अदालतों में एक 'केविएट' भी दायर की जिसमें कहा गया कि अगर उसके फ़ैसले को चुनौती दी जाती है तो उसका पक्ष भी सुना जाए। यह एक बहुत ही असामान्य कदम था जिससे यह आशंका पैदा हुई कि शायद नई दिल्ली से कोई इस मामले को कंट्रोल कर रहा है। रेगुलेटर को इस टाइमिंग के बारे में सफ़ाई देनी चाहिए।

लिस्टिंग से माइनॉरिटी शेयरहोल्डर्स- खासकर कज़र् में डूबे शापूरजी पालोनजी (एसपी) गु्रप को अपनी 18.4 प्रश हिस्सेदारी के लिए पूरी मार्केट कीमत पाने में मदद मिलेगी। अपनी हिस्सेदारी के लिए सही कीमत पाना (एसपी) ग्रुप के नज़रिए से एक वाजिब मांग है और उसने लिस्टिंग के बोर्ड के बहुमत वाले फ़ैसले का स्वागत भी किया है पर इस मांग को पूरा करने के दूसरे तरीके भी हैं जैसे कि किसी स्वतंत्र तरीके से तय की गई सही कीमत पर शापूरजी पालोनजी ग्रुप की हिस्सेदारी खरीदना जिससे लिस्टिंग के ख़िलाफ़ टाटा ट्रस्ट्स का रुख भी बना रहे।

यह पहली बार नहीं है जब टाटा ग्रुप किसी संकट का सामना कर रहा है। 2016 में रतन टाटा के ट्रस्ट का जब साइरस मिस्त्री से भरोसा उठ गया तो बोर्ड ने उन्हें चेयरमैन पद से हटा दिया और बाद में सुप्रीम कोर्ट ने भी उस फैसले को सही ठहराया। इस समय पहली बार बोर्ड ने बहुमत वाले शेयरहोल्डर के खिलाफ चेयरमैन का साथ दिया है। क्या बहुमत वाले मालिक के विरोधी पक्ष को समर्थन देने वाले राजनीतिक हलकों की सहमति के बिना ऐसा हो सकता था? सरकार को यहां किसी एक पक्ष का साथ देने से बचना चाहिए। इसके बजाय उसे आपसी समझ बनाने की कोशिश करनी चाहिए।

टाटा ग्रुप एक राष्ट्रीय पहचान है जो एंटरप्राइज़, ग्रोथ और सेवा का ऐसा मॉडल है जो दुनिया में कहीं और शायद ही देखने को मिलेगा। इसमें एक बड़े एंटरप्राइज़ का ज़्यादातर मुनाफ़ा जनहित के लिए चैरिटेबल ट्रस्ट को जाता है। बिना किसी साफ़ और स्पष्ट कारण के रेगुलेटरी दखलंदाजी से इसे खत्म नहीं किया जाना चाहिए। न ही इसका भविष्य चेयरमैन द्वारा नियमों की ऐसी व्याख्या पर निर्भर होना चाहिए जिसे मुख्य शेयरहोल्डर न मानता हो। 12 अगस्त को चंद्रशेखरन ने कहा था कि वे सर्वसम्मति से समर्थन के बिना काम जारी नहीं रखेंगे। उन्हें अपनी बात पर कायम रहना चाहिए और रिजर्व बैंक को अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। सिंडिकेट: द बिलियन प्रेस)

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