ललित सुरजन की कलम से न्यायमूर्ति दवे के उद्गार
श्री दवे पहली कक्षा से ही बच्चों को गीता और रामायण पढ़ा देना चाहते हैं।;
श्री दवे पहली कक्षा से ही बच्चों को गीता और रामायण पढ़ा देना चाहते हैं। यह विचार भी कुछ अटपटा लगता है। मात्र पांच-छह वर्ष की आयु में किसी बालक या बालिका को क्या पढऩा चाहिए, इस गंभीर बिन्दु पर शायद उन्होंने विचार नहीं किया। गो कि शिक्षा के बारे में इतने ऊपरी ढंग से सोचने वाले वे पहले न्यायवेत्ता नहीं हैं। हमारे नीति-निर्माता एवं निर्णयकर्ता समाज की सारी विसंगतियों का दोष शिक्षा व्यवस्था पर मढ़कर खुद को अपराधमुक्त कर लेते हैं। वे नहीं सोचते कि यह शिक्षा व्यवस्था भी उनके द्वारा बनाई गई नीतियों का ही परिणाम है। वे बेहद शुष्क और मशीनी तरीके से नौनिहालों के मस्तिष्क में वेद-पुराण से लेकर पर्यावरण, सड़क सुरक्षा, लैगिंक समानता जैसे तमाम विषय ठूंस देना चाहते हैं। उन्हें इस बात का ख्याल नहीं होता कि इन नन्हे-मुन्ने बच्चों को पढ़ाना एक अलग तरह का अनुशासन है जो सिर्फ प्रशिक्षित अध्यापक ही समझ सकते हैं। दुर्भाग्य से भारत के कुलीनतंत्र में शिक्षकों का जो अपमान हो रहा है श्री दवे उससे अनभिज्ञ नज़र आते हैं।
(देशबन्धु में 07 अगस्त 2014 को प्रकाशित)
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