वोट चोरी तो सब चोरी, जनता समझ गई
राहुल का यह कहना बहुत मायने रखता है कि एंटी इन्कम्बेन्सी हर सरकार के खिलाफ काम करती है।;
विचार सबसे बड़ी चीज है। उसे जिन्दा रखो। संविधान को कोई खत्म होने देना नहीं चाहता। इसलिए राहुल संविधान हमेशा दिखाते रहते हैं। देश को आगाह करते रहते हैं कि ये संविधान खत्म करने वाले लोग हैं। तो खुद के अस्तित्व को बचाने के लिए और गुलामी के बीच अपनी मर्जी से एक सांस लेने के लिए एक अख़बार ने हिम्मत दिखा दी और बस यहीं से पासा पलट गया।
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ लोगों में गुस्सा बढ़ता जा रहा है। करीब एक साल पहले जब नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने बिहार में एसआईआर का मुद्दा उठाया था तब लोग मोदी सरकार के इस वोट चोरी के खेल को नहीं समझे थे। राहुल ने जनजागरण किया। कई दिनों तक बिहार में यात्रा निकाली और उसके बाद से चुनाव आयोग द्वारा मोदी को सूट नहीं करने वाले वोटों को काटना और नकली वोटों को जोड़ने के खिलाफ प्रेस कान्फ्रेंस करके कई सबूत दिए।
जनता में और सभी जगह मैसेज जाना शुरु हो गया कि कुछ गड़बड़ है। राहुल का यह कहना बहुत मायने रखता है कि एंटी इन्कम्बेन्सी हर सरकार के खिलाफ काम करती है। इन्दिरा गांधी के खिलाफ भी किया, वाजपेयी के खिलाफ भी। मगर यह बीस साल तक पच्चीस साल तक रहने की बात करते हैं जबकि देश में हर जगह दिखता है कि जनता कितनी परेशान है तो यह सरकार से नाराजगी (एंटी इन्कम्बेन्सी) इन पर असर क्यों नहीं करती?
राहुल ने खुद ही अपने सवाल का जवाब दिया कि वोट चोरी से। 13 करोड़ से ज्यादा वोट देश भर में काट दिए गए हैं। बंगाल में ऐसी बहुत सी सीटें हैं जहां जितने वोट काट गए उससे कम वोटों से बीजेपी का प्रत्याशी वहां जीता है। मिसाल के तौर पर सौ वोट काटे गए तो पचास वोट से। मतलब अगर वे सौ वोट जो वास्तविक थे। वे रहते तो जीतने की संभावना नहीं थी। यह बात खुद सुप्रीम कोर्ट ने कही। और यहां तक कि क्या दोबारा चुनाव करवाए जा सकते हैं?
यह तथ्य आने के बाद माहौल में बदलाव शुरू हुआ। और फिर इंडियन एक्सप्रेस की खबर के बाद कि कैसे मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने सारे बड़े फैसले बाकी दो चुनाव आयुक्तों की मर्जी के खिलाफ किए। मीडिया आज भी सबसे बड़ी ताकत है। इसलिए प्रधानमंत्री मोदी ने सबसे ज्यादा उसको अपने कब्जे में रखा है। मगर मीडिया को भी अपनी कुछ तो विश्वसनीयता चाहिए। अगर वह पूरी तरह भौंपू बन गई तो वह ही खत्म हो जाएगी। यह सरवाइवल (कुछ जान बची रहने का) का सवाल है।
दूसरा गुलामी में रहने का। 80 साल से गुलामी में रहने की आदत छूट गई। कांग्रेस के नेतृत्व में जो आजादी पाई थी उसका सबसे बड़ा पहलू यह था कि सबको समान अधिकार। किसी का किसी पर कोई वर्चस्व नहीं। एक व्यक्ति एक वोट। इसी मूल भावना पर चोट पड़ी। मीडिया हो या न्यायपालिका या राष्ट्रपति सब के मन में जब भी आजादी की भावना जाग जाती है वे उस के अनुरूप कुछ कर देते हंै।
इसीलिए कहते हैं कि विचार सबसे बड़ी चीज है। उसे जिन्दा रखो। संविधान को कोई खत्म होने देना नहीं चाहता। इसलिए राहुल संविधान हमेशा दिखाते रहते हैं। देश को आगाह करते रहते हैं कि ये संविधान खत्म करने वाले लोग हैं। तो खुद के अस्तित्व को बचाने के लिए और गुलामी के बीच अपनी मर्जी से एक सांस लेने के लिए एक अख़बार ने हिम्मत दिखा दी और बस यहीं से पासा पलट गया।
पेपर लीक की वजह से छात्रों और युवाओं में गुस्सा पहले से था। उनकी शिक्षा, उच्च, प्रोफेशनल शिक्षा के अवसर छीने जा रहे थे। और फिर उनका वोट छीने जाने का भी उन्हें पता चल गया। फर्स्ट टाइम वोटरों को सबसे ज्यादा काटा जा रहा था।
युवा छात्रों के आक्रोश का पता चलने के बाद उनके वोटों पर तलवार चला दी गई। कहां चुनाव आयोग के आदमी घर-घर आकर पूछते थे कि कोई 18 साल का होने वाला तो नहीं? और खुद उसका नाम वोटर लिस्ट में जुड़वा देते थे। अब उल्टा हो रहा है। पहली बार वोटर बनने के फार्म को बदल दिया। फार्म 6 जो नए वोटर के लिए है। बहुत आसान होता था। होना भी चाहिए। मगर उसे जटिल करके इसमें उसके परिवार का माता-पिता, दादा-दादी का 2000 या उसके आसपास की वोटर लिस्ट में नाम और सारी डिटेल मांगी जा रही थी। लड़का-लड़की 18 साल का है और उससे रिकार्ड मांगा जा रहा है उसके जन्म से 8 साल पहले का!
चुनाव आयोग की धांधलियां एकदम से सतह पर आ गईं और सबसे बड़ी बात उसकी विश्वसनीयता ही खत्म हो गई। इसी के खिलाफ इंडिया गठबंधन ने आवाज उठाई। जो विपक्ष का काम है। एसआईआर की पूरी वापसी। ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा। 30 सितम्बर को हुई इस बैठक के बाद ही आंदोलन का बिगुल बज गया। 6 अक्टूबर का कॉल बहुत बड़ा साबित हुआ। विपक्ष ने ऐलान किया था कि इस दिन चुनाव आयोग जाकर चुनाव आयुक्तों को वोट चोरी के खिलाफ ज्ञापन देंगे।
मगर मोदी सरकार जैसे 12 साल में विपक्ष द्वारा उठाई गई किसी मांग को नहीं सुनती यह भी नहीं सुनी। लेकिन इस बार उनका यह आत्मविश्वास महंगा पड़ गया। विपक्ष तो राहुल गांधी के नेतृत्व में संसद से चुनाव आयोग के लिए निकला। मगर सरकार ने उसे चुनाव आयोग पहुंचने से पहले ही रोक दिया। राहुल को हिरासत में ले लिया। राहुल का सिम्पल कहना था कि एक हफ्ते पहले हमने चुनाव आयोग जाने की बात कही थी। शांतिपूर्ण। और वह जा भी रहे थे। फिर गिरफ्तारी क्यों?
वे बस से उतरकर सामने आकाशवाणी भवन में घुस गए। वहीं से जो यह आन्दोलन आज तक चल रहा है नए मोड़ पर आ गया।
ज्ञानेश कुमार के साथ मोदी और अमित शाह को भी जाना होगा- के नारे लगने लगे। और जैसे-जैसे आन्दोलन तेज होता गया दमन भी होता गया। सिर्फ पुलिस का ही नहीं प्राइवेट गुंडे बुलाकर उनसे भी लड़कियों के कपड़े खिंचवाए गए। गालियां, मारपीट तो अलग। देश के इतिहास में कभी सरकार और पुलिस ने इस तरह गुंडे बुलाकर युवा लड़के-लड़कियों को नहीं पिटवाया गया। अंग्रेजों ने भी कभी आन्दोलन कुचलने के लिए गुंडे नहीं बुलाए। गुंडे बुलाना सरकार की कमजोरी की निशानी होता है। मोदी सरकार कमजोर हो रही है।
पिछली बार शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान को बचाने के लिए दिल्ली में पेलेटगन, बिहार में एके-47 चलाई थी। इस बार लड़कियों पर यौन हमला किया गया। राहुल ने इन लड़कियों से मुलाकात की। जो लड़कियों ने सुनाया है कि पुलिस थाने के अंदर सीनियर पुलिस अधिकारियों से लेकर नीचे सिपाही और महिला सिपाही द्वारा उनके साथ कैसा बर्बरतापूर्ण व्यवहार किया गया। बाहर गुंडों द्वारा अंदर पुलिस द्वारा। महिला सुरक्षा के नाम पर मोदी सरकार आई थी
-बहुत हुआ नारी पर वार अबकि बार मोदी सरकार।
और अब खूब करो नारी पर वार, देंगे इसका हम पुरस्कार!
लेकिन सरकार चाहे जितना जुल्म ढहा ले अब छात्र युवा, विपक्ष आम जनता पीछे हटने वाले नहीं हैं। अब सब जान गए हैं कि उनके वोट को निरर्थक बना दिया गया है।
राहुल का कहना वोट चोरी एक सत्य है। मोदी हमारे वोट से नहीं हमारा वोट चुरा कर जीत रहे हैं। दिल्ली में एक नवंबर रविवार को इंडिया गठबंधन की बड़ी जनसभा हो रही है। मालूम पड़ जाएगा कि जनता वोट चोरी को कितनी गंभीरता से ले रही है। विपक्ष ने अपना काम कर दिया। जनता जिसका वोट ही चला जाएगा तो फिर कुछ नहीं बचेगा। इसे बचाने के लिए कितना आगे आती है।
आजादी के बाद नेहरू ने सबको वोट का अधिकार बिना मांगे, बिना संघर्ष के दिया था। फिर राजीव गांधी ने इसे 21 से घटाकर 18 साल के युवाओं को दे दिया था। अब इसको चुराया जा रहा है। देखते हैं एक नवंबर को इसे बचाने के लिए कितने लोग कहां-कहां से रामलीला मैदान पहुंचते हैं।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार है)