ललित सुरजन की कलम से - धर्म: पुल या खाई - 2
विश्व इतिहास की यदि थोड़ी भी समझ हम विकसित कर लें तो समझ सकते हैं कि पूंजीवादी लुटेरों के गिरोह किस तरह संगठित धर्म का सहारा लेकर समाज को तोड़ते रहे हैं।;
विश्व इतिहास की यदि थोड़ी भी समझ हम विकसित कर लें तो समझ सकते हैं कि पूंजीवादी लुटेरों के गिरोह किस तरह संगठित धर्म का सहारा लेकर समाज को तोड़ते रहे हैं। अंग्रेजों की 'फूट डालो और राज करो' की कुटिल नीति का परिणाम भारत ने जिस तरह भुगता है वह कौन नहीं जानता। साम्राज्यवादी शक्तियों का तो मंसूबा था कि पाकिस्तान बनने के अलावा देशी रियासतें भी अपना-अपना सार्वभौम देश बना लें।
दक्षिण अफ्रीका के नक्शे पर नज़र डालकर देखिए वहां एक देश के भीतर दो अन्य स्वतंत्र देश देखने मिल जाएंगे- लेसोथो और स्वाज़ीलैंड। भारत के बारे में भी उनका कुछ वैसा ही इरादा था। कश्मीर को स्वतंत्र देश बनाने का षडय़ंत्र तो 1942-43 में ही रच लिया गया था, जिसका खुलासा राजदूत नरेन्द्र सिंह सरीला ने अपनी पुस्तक 'द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ इंडियन पार्टीशन' (भारत विभाजन की अनकही कहानी) में किया है। (प्रसंगवश यह बताना उचित होगा कि उस समय माउंटबेटन के भारत आने की दूर-दूर तक कोई संभावना नहीं थी।)
(देशबन्धु में 2 अक्टूबर 2014 को प्रकाशित)
https://lalitsurjan.blogspot.com/2014/10/2.html