ललित सुरजन की कलम से मेरा चुनावी घोषणापत्र
इसका प्रमाण हमें वर्तमान में चल रहे विधानसभा चुनावों के दौर में बखूबी मिल रहा है।;
'घोषणापत्र मुझ जैसों को आश्वस्त करता है कि जिसकी सरकार बनेगी वह अपने किए वायदों पर अमल करेगी और अगर नहीं करेगी तो उस पर वादाखिलाफी का अपराध सिद्ध किया जा सकेगा। लेकिन हाल के दिनों में यह विश्वास टूटने लगा है।
इसका प्रमाण हमें वर्तमान में चल रहे विधानसभा चुनावों के दौर में बखूबी मिल रहा है। दोनों प्रमुख दल कांग्रेस और भाजपा के नेता लगातार आरोप-प्रत्यारोप में उलझे हुए हैं। बड़े-बड़े नेता आते हैं, भाषण देकर चले जाते हैं। भाषण सुनने के लिए भीड़ जुटाई जाती है, लेकिन कुल मिलाकर क्या होता है? एक-दूसरे पर छींटाकशी, व्यक्तिगत लांछन, सच्चे-झूठे आरोप, अभद्र भाषा का प्रयोग, गाली-गलौज तक की नौबत इसी में सारी मेहनत लग रही है। पत्रवार्ताएं होती हैं तो उनमें भी बुनियादी मुद्दों पर सवाल नहीं पूछे जाते।'
'फिर भी मन है कि मानता नहीं। पत्रकार होने के नाते दूरदराज से जनता की आशा-आकांक्षा की तस्वीरें देखने मिलती हैं। उन्हें देखकर मन में विचार उठता है कि अगर मैं राजनीति में होता तो जनता के लिए क्या करता। दोनों पार्टियों के घोषणापत्रों में बहुत अच्छी-अच्छी बातें अवश्य होंगी जो बहुत जल्दी जुमलों में बदल जाएंगी, लेकिन आम जनता को अपने तईं भी सोचने की आवश्यकता है कि सुखी भविष्य के लिए उसकी प्राथमिकताएं क्या हैं?'
( देशबन्धु में 01 नवंबर 2018 को प्रकाशित)
https://lalitsurjan.blogspot.com/2018/10/blog-post_31.html