चुनाव आयोग की विश्वसनीयता कैसे बहाल होगी?

अब तक विपक्षी दल राज्यों में अपने हितों के हिसाब से अलग-अलग संघर्ष करते रहे हैं।;

By :  DB Desk
Update: 2026-10-15 21:30 GMT
  • राजेश पांडेय

अब तक विपक्षी दल राज्यों में अपने हितों के हिसाब से अलग-अलग संघर्ष करते रहे हैं। चुनावों के समय स्थानीय स्तर पर गठबंधन हो जाते हैं। कई बार संसद में कुछ मुद्दों पर एकता नजर आती है। लेकिन इस मर्तबा चुनावों में धांधली के मुद्दे ने विपक्षी नेताओं को अपने मतभेद, महत्वाकांक्षा और अहंकार से परे हटकर साथ आने के लिए मजबूर किया है।

लम्बे समय बाद भारत में विपक्षी दलों को किसी एक मुद्दे पर एकजुट होते देखा गया है। 12 अक्टूबर को दिल्ली में कांग्रेेस की अगुआई में विपक्षी दलों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने, एसआईआर को रद्द करने की मांग के लिए सुप्रीम कोर्ट तक कूच किया। इसके बाद कूच में शामिल वरिष्ठ विपक्षी नेताओं ने देश की शीर्ष अदालत में दाखिल संयुक्त याचिका में ये मुद्दे उठाए। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने कहा, मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ सभी विरोध प्रदर्शन सिर्फ एक ही प्रोटेस्ट का हिस्सा हैं। यह अप्रत्यक्ष रूप से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार के एक देश, एक चुनाव के मुद्दे का जवाब है। 2014 के बाद पहली बार विपक्ष को किसी एक मुद्दे पर पूरी ताकत से एक साथ आवाज उठाते देखा गया है।

अब तक विपक्षी दल राज्यों में अपने हितों के हिसाब से अलग-अलग संघर्ष करते रहे हैं। चुनावों के समय स्थानीय स्तर पर गठबंधन हो जाते हैं। कई बार संसद में कुछ मुद्दों पर एकता नजर आती है। लेकिन इस मर्तबा चुनावों में धांधली के मुद्दे ने विपक्षी नेताओं को अपने मतभेद, महत्वाकांक्षा और अहंकार से परे हटकर साथ आने के लिए मजबूर किया है। विपक्ष को अहसास हो गया है कि यदि चुनाव आयोग के खिलाफ मिलकर अभियान नहीं चलाया गया तो उसका अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा। इसलिए उसने मैदानी संघर्ष और कानूनी लड़ाई में साथ रहने का रणनीतिक फैसला लिया है। चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर संकट के बीच यह घटनाक्रम अच्छा संकेत है।

चुनाव आयोग करोड़ों वोटरों का हक छीन रहा है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने निर्णायक हस्तक्षेप करने की जरूरत नहीं समझी थी। उसने बिहार में एसआईआर को चुनौती देने वाली याचिकाओं को खारिज करते हुए कहा था कि पूरी प्रक्रिया कानून की दृष्टि से जायज है। एसआईआर कानूनन जायज तो है लेकिन उसका तरीका गलत है। सुप्रीम कोर्ट ने नहीं देखा कि जो काम एक-दो साल में होना चाहिए वह चुनाव से कुछ माह पहले जल्दबाजी में क्यों किया जा रहा है। अब यह मुद्दे जनता के दिल-दिमाग पर दस्तक देने लगे हैं। कॉकरोच जनता पार्टी की मुहिम बताती है कि युवाओं का एक वर्ग भी चुनावों में धांधली के मुद्दे पर आंदोलित है। राजनीतिक दलों ने इसे और अधिक स्पष्ट और पैना बना दिया है।

एसआईआर में धांधली के बारे में एक और खुलासा सामने आया है। चुनाव विश्लेषक प्रणव राय ने मई 2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजों पर एसआईआर के प्रभाव का विश्लेषण किया है। उसके अनुसार जिन 25 क्षेत्रों में सबसे ज्यादा मतदाता हटाए गए हैं, उनमें ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ वोट स्विंग 10.5 प्रतिशत हुआ है। जिन क्षेत्रों में सबसे कम वोटर बाहर हुए हैं, वहां तृणमूल के खिलाफ केवल 5.3 प्रतिशत वोट स्विंग रहा। पिछले चुनाव नतीजे बताते हैं कि तृणमूल को महिला और मुस्लिम मतदाताओं का अच्छा समर्थन मिलता रहा है। तृणमूल को महिलाओं के वोट भाजपा से 13 प्रतिशत ज्यादा मिले हैं। बंगाल में पुरुष और महिला वोटरों की संख्या लगभग बराबर है। लेकिन एसआईआर में महिलाओं के 62 प्रतिशत और पुरुषों के केवल 38 प्रतिशत वोट कम हुए हैं। राज्य में पिछले चुनावों में तृणमूल को मुसलमानों के 75प्रतिशत और भाजपा को 7-8प्रतिशत वोट मिले हैं। एसआईआर में गैर-मुसलमानों के मुकाबले मुसलमानों के 52प्रतिशत वोटर ज्यादा बाहर हुए हैं। यह विश्लेषण पूरी प्रक्रिया को संदेह के दायरे में खड़ा करता है। लगता है, जानबूझकर महिला और मुस्लिम वोटरों को बाहर किया गया है।

दो चुनाव आयुक्तों द्वारा मुख्य चुनाव आयुक्त की मनमानी से पर्दा हटाने के बाद आयोग ने कुछ सुधार किए हैं। दोनों आयुक्तों ने नए वोटरों को शामिल करने के फार्म 6 में अतिरिक्त घोषणा को गैरकानूनी बताया था। इसे पिछले दरवाजे से नागरिकता साबित करने की कार्रवाई मानी जा रही है। फार्म 7 के जरिये थोक में वोटरों को हटाने के मामले भी सामने आ रहे हैं। यह फार्म किसी वोटर का नाम हटाने या किसी वोटर का नाम मतदाता सूची में शामिल करने पर आपत्ति जताने से संबंधित है। कई राज्यों में फार्म 7 के दुरुपयोग की शिकायतें आई हैं। उसके खिलाफ आंदोलन हुए हैं। 9 अक्टूबर को आयोग ने स्वीकार किया कि थोक में फार्म 7 दाखिल किए जाने से वोटरों को असुविधा हुई है। अब आयोग ने प्रति व्यक्ति यह फार्म जमा करने की संख्या दस तक सीमित कर दी है।

एसआईआर शुरू होने के बाद कर्नाटक, उत्तराखंड, तेलंगाना और उड़ीसा में राजनीतिक दलों ने अपने प्रतिद्वंद्वियों पर थोक में फार्म 7 जमा करने के आरोप लगाए थे। सितंबर में बीजू जनता दल ने उड़ीसा के मुख्य चुनाव अधिकारी के सामने मामला उठाया था। बूथ लेवल के कुछ अधिकारियों ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी कि उनकी जानकारी के बिना उनके नाम से फार्म 7 दाखिल किए गए हैं। इसके बाद चुनाव आयोग ने एक अधिकारी को हटाया था।

चुनाव आयोग की अनियमितताओं का सिलसिला अनंत है। उसने चुनाव आचार संहिता उल्लंघन के मामले में सत्ताधारी दल और विपक्ष के प्रति पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाया है। 2019 और 2024 के लोकसभा चुनाव में ऐसे मामले हो चुके हैं। ज्ञानेश कुमार से पहले राजीव कुमार इन कारणों से विपक्ष के निशाने पर थे। राजीव कुमार अब देश के सबसे बड़े प्राइवेट बैंक एचडीएफसी के चेयरमैन हैं। उनके कार्यकाल में सत्ता पक्ष के साथ नरमी बरतने के आरोप लगे थे।

चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता के अभाव की शिकायतों के कई सबूत सामने आ चुके हैं। उसके सामने अपनी साख को बनाए रखने का संकट है। सरकार कहती है कि चुनाव आयोग स्वायत्त और स्वतंत्र है। वह बिना किसी हस्तक्षेप के काम करता है। लेकिन वह उसके बचाव में हमेशा आगे रहती है। इस बार चुनाव आयुक्त के इस्तीफे सहित अन्य मांगों पर उठे स्वरों को कुचलने में सरकार ने बहुत ज्यादा सख्ती बरती है। दिल्ली में प्रदर्शनकारी राजनीतिक कार्यकर्ताओं, वकीलों, पत्रकारों को हर जगह रोका गया। केंद्र सरकार ने राजधानी को ठप कर दिया था। सरकार ने और आगे बढ़ते हुए सत्तातंत्र के नजदीक स्थित जंतर-मंतर के स्थान पर विरोध प्रदर्शनों के लिए तीन नए स्थान तय कर दिए। इनमें बुराड़ी और शाहदरा बहुत दूर हैं। यहां दिल्ली के लोगों के लिए पहुंचना आसान नहीं है। बाहर के लोगों की तो बात छोड़िए। वैसे, तीसरी जगह रामलीला मैदान ठीक है।

असंतोष की अभिव्यक्ति के मामले में रामलीला मैदान का लंबा इतिहास है। 1975 में जयप्रकाश नारायण ने यहां से इंदिरा गांधी की सरकार के खिलाफ आंदोलन का बिगुल फूंका था। उस वक्त जेपी की जनसभा से निकला नारा- सिंहासन खाली करो कि जनता आती है, जमकर चर्चित हुआ था। यह रामधारी सिंह दिनकर की कविता 'जनतंत्र का जन्मÓ का हिस्सा है। दिनकर ने कविता 1950 में भारत के पहले गणतंत्र दिवस के अवसर पर लिखी थी। बहरहाल, अखबारों में प्रकाशित खबरों के अनुसार रामलीला मैदान की हालत अच्छी नहीं है। अक्टूबर से दिसंबर महीनों के बीच वहां लगातार कार्यक्रम होते हैं।

लोकतंत्र में जनअसंतोष की अभिव्यक्ति सेफ्टी वाल्व साबित हो सकती है। लेकिन सरकारों से विरोध की आवाज को उठाने के लिए असरदार मंच उपलब्ध कराने की उम्मीद कम ही रहती है। अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस जैसे पश्चिमी लोकतांत्रिक देशों में प्रदर्शन स्थल सत्तातंत्र के काफी नजदीक बनाए गए हैं। हमारे यहां तो जनभावनाओं को रोकने की हर मुमकिन कोशिश होती है। एसआईआर में गड़बड़ी के माध्यम से भी ऐसा किया जा रहा है। करोड़ों वोटर अपनी मर्जी से सरकार नहीं चुन पाएंगे। भला इससे अधिक गंभीर स्थिति क्या हो सकती है। लगातार सामने आ रहे सबूतों के बीच भी यदि किसी की जवाबदेही तय नहीं होती है तो यह त्रासद स्थिति होगी। लोकतंत्र में जनभावनाओं को अंजाम तक पहुंचाने में विपक्ष की भूमिका निर्णायक है। विपक्षी दलों के लगातार दबाव से ही जनता के वोट देने के अधिकार की रक्षा हो सकेगी।

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