देसी सब्जियों का जवाब नहीं

छत्तीसगढ़ की एक पहचान की यहां की विविधता भी है। यहां न केवल कई धान की प्रजातियां हैं, बल्कि कई प्रकार की हरी पत्तेदार सब्जियां भी हैं;

Update: 2026-10-17 01:34 GMT

सब्जी बाड़ी की सोच ग्रामीण परिवारों के लिए भी प्रासंगिक है, यह उनकी आजीविका का अच्छा स्रोत है। वास्तव में, यह सोच शहरी परिवारों के लिए भी बहुत उपयोगी है, जो छोटे किचिन गार्डन से भी अपनी पौष्टिक और ताज़ी जैविक सब्जियों की जरूरत को कुछ हद तक पूरा कर सकते हैं। ग्रामीण बस्तियों की तुलना में शहरी बस्तियों में स्थान की कमी एक बड़ी बाधा है, लेकिन जैसा कि कहा जाता है, जहां चाह होती है, वहां राह होती है। कभी-कभी ज़मीन के छोटे-छोटे टुकड़ों या छतों का भी बहुत ही उत्पादक और रचनात्मक उपयोग किया जा सकता है।

छत्तीसगढ़ की एक पहचान की यहां की विविधता भी है। यहां न केवल कई धान की प्रजातियां हैं, बल्कि कई प्रकार की हरी पत्तेदार सब्जियां भी हैं। यहां के लोगों को सब्जी बाजारों में इन ताज़ी सब्जियों को खरीदते देखा जा सकता है। छोटे गांवों, कस्बों से लेकर शहरों के यह सब्जी बाजार दैंनंदिन दिनचर्या का हिस्सा हैं। आज इस कॉलम में इस पर ही बात करना चाहूंगा, जिससे इस रचनात्मक काम की ओर ध्यान दिया जा सके।

छत्तीसगढ़ राज्य सांस्कृतिक रूप से काफी समृद्ध है। यहां की पारंपरिक खान-पान की संस्कृति भी अनूठी है। इन दिनों सब्जी बाजार में खट्टा भाजी ( अमाड़ी भाजी), बांस करिल, करमत्ता भाजी और कई तरह के मशरूम बाजारों में आ रहे हैं। इसके अलावा, ऐसी भी कई हरी पत्तीदार भाजियां हैं, जो कुदरती तौर पर होती हैं, जैसे चुनचुनिया भाजी। यह सभी स्वाद में बेजोड़ हैं, और इनकी सब्जियां बनाने का तरीका भी अलग-अलग होता है।

हाल ही हमने बांस की करिल की सब्जी खाई। यह बांस की कोंपल की भाजी होती है, जिसे बांस से काट कर, धोकर और छोटे छोटे टुकड़े कर पकाया जाता है। इसकी कड़वाहट दूर करने के लिए उबाल लिया जाता है और लहसुन-प्याज और मसालों के साथ सब्जी बनाई जाती है। इसी प्रकार, यहां की खट्टा भाजी को भी काफी पसंद किया जाता है। इसकी सब्जी तो बनती ही है, गर्मी के दिनों में इसके फूल सुखाकर शरबत भी बनता है। जिसें मैंने महाराष्ट्र के वर्धा में एक बीज प्रदर्शनी के दौरान चखा था।

इन हरी पत्तीदार भाजियों व सब्जियों को धूप में सुखाकर भी रखते हैं, इसे सुखड़ी कहते हैं। यानी जब हरी पत्तीदार भाजियों का मौसम नहीं होता है, तब इसे पकाकर खाते हैं। सुखड़ी में चरौंटा, चेंच भाजी, तिवड़ा, (लाखड़ी) आदि की सुखड़ी होती हैं। इसी प्रकार, यहां रखिया (भुरा कुम्हड़ा) की बड़ी और बिजौरी भी बनाई जाती है। यह बहुत ही स्वादिष्ट होती है।

यहां कई किस्म के फुटू (जंगली मशरूम) हैं। बहुत ही स्वादिष्ट और पौष्टिक होते हैं। यह भी इन दिनों बाज़ार में आ रहे हैं। हाल ही हमने फुटू की सब्जी खाई। एक बार मुझे ग्रामीणों ने बताया था कि बोड़ा या फुटू (मशरूम) की सब्जी भी जंगल से मिलती है। दो प्रकार का होता है, जात बोड़ा (मशरूम) पहली बारिश में निकलता है, जबकि लाकड़ी बोड़ा ज्यादा बारिश होने पर निकलता है।

इसी प्रकार, यहां के कई पारंपरिक व्यंजन हैं। बिलासपुर जिले में कार्यरत जन स्वास्थ्य सहयोग संस्था जेवनार मेला आयोजित करती है। जिसमें गांवों से अलग-अलग तरह की भोजन सामग्री लाती हैं, और पारंपरिक व्यंजन बनाती हैं। मेले में आए लोगों को इसका स्वाद चखने को मिलता है। इससे देसी पारंपरिक व्यंजनों को बढ़ावा मिलता है। साथ देसी अनाजों व सब्जियों को उगाने को प्रोत्साहन मिलता है। खाद्य विविधता, खाद्य सुरक्षा और स्वास्थ्य जागरूकता भी होती है। जन स्वास्थ्य सहयोग ने देसी अनाजों को बढ़ावा देने के लिए भी कृषि कार्यक्रम चलाया है। जिसमें वे पौष्टिक अनाज और देसी धान को उगाने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।

यहां धान के साथ पौष्टिक अनाज भी उगाए जाते हैं। जैसे यहां मडिया की खेती भी होती है। इसे रागी, नाचनी और मड़ुआ नाम से भी जाना जाता है। इसे हाथ की चक्की में दर कर खिचड़ी या भात बनाया जा सकता है। इसके आटे की रोटी भी बनाई जा सकती हैं। खुरमी या लड्डू भी बना सकते हैं। इसमें चूना (कैल्शियम) भरपूर मात्रा में होता है और कुछ मात्रा में लौह तत्व भी पाए जाते हैं। यहां इसके बिस्कुट भी बनाए जा रहे हैं।

इसके अलावा, छत्तीसगढ़ में कई स्वयं सहायता समूह, सरकार व संस्थाएं सब्जी बाड़ी ( किचिन गार्डन) को बढ़ावा देती है। जिसमें लौकी, कुम्हड़ा, मखना ( कद्दू), बरबटी, सेमी, भिंडी, ग्वारफली, करेला, टमाटर, डोड़का (चिकनी तोरई), खट्टा भाजी, चेंच भाजी, झुरगा आदि लगाते हैं। फलदार पेड़ों में सीताफल, जाम, जामुन, मुनगा, नींबू, पपीता, करौंदा आदि का रोपण करवाते हैं। सब्जी बाड़ी से 6 से 8 महीने बाड़ी से हरी ताजी तरकारी मिलती हैं और इन्हें कुछ बेचकर आमदनी भी होती है।

एक संस्था के कार्यकर्ता ने मुझे बताया था कि सब्जी बाड़ी में अगर कीट प्रकोप होता है तो स्थानीय स्तर पर जैव कीटनाशक तैयार किए जाते हैं। तम्बाकू काढ़ा, नीमतेल घोल, नीला थोथा सुहागा और पंचपर्णी (ऐसे पौधों के पत्ते जिन्हें जानवर नहीं खाते- जैसे नीम,करंज, धतूरा, सीताफल आदि) जैव कीटनाशक बनाए जाते हैं। ये सभी कीटनाशक ग्रामीण खुद तैयार करते हैं। उनका छिड़काव करते हैं। ये बाजार के कीटनाशकों की तुलना में काफी सस्ते हैं और आसानी से बनाए जा सकते हैं। जैव खाद तैयार कर मिट्टी को उपजाऊ बनाया जाता है जिससे अच्छी उपज आ सके।

सब्जी बाड़ियों में सब्जियों की खेती गांवों में पारंपरिक तरीके से होती रही है। लोग अपने घर के पीछे बगीचे में व खेत में सब्जी उगाते रहे हैं। विशेषकर महिला किसानों की इसमें प्रमुख भूमिका होती है। उनमें इसे करने का स्वाभाविक कौशल भी है। बल्कि वे जहां भी रिश्तेदारी में जाती हैं, वहां से बीज लाकर लगाती हैं। बीजों का आदान-प्रदान होता रहता है। लेकिन समय के साथ इसमें कई कारणों से कमी आ रही है।

सब्जी बाड़ी की सोच ग्रामीण परिवारों के लिए भी प्रासंगिक है, यह उनकी आजीविका का अच्छा स्रोत है। वास्तव में, यह सोच शहरी परिवारों के लिए भी बहुत उपयोगी है, जो छोटे किचिन गार्डन से भी अपनी पौष्टिक और ताज़ी जैविक सब्जियों की जरूरत को कुछ हद तक पूरा कर सकते हैं। ग्रामीण बस्तियों की तुलना में शहरी बस्तियों में स्थान की कमी एक बड़ी बाधा है, लेकिन जैसा कि कहा जाता है, जहां चाह होती है, वहां राह होती है। कभी-कभी ज़मीन के छोटे-छोटे टुकड़ों या छतों का भी बहुत ही उत्पादक और रचनात्मक उपयोग किया जा सकता है।

कुल मिलाकर, छोटे-छोटे खाली स्थानों में किचन गार्डन बनाने का पूरा काम इतना रचनात्मक है और इससे इतनी खुशी और आनंद मिल सकता है कि यह अपने आप में पूरे देश में इसे बढ़ावा देने के लिए एक अच्छा कारण हो सकता है, लेकिन इसके अलावा पोषण और स्वास्थ्य में इसका योगदान भी महत्वपूर्ण स्तर पर हो सकता है। छत्तीसगढ़ में सब्जी बाड़ी की परंपरा रही है, और इसमें विविधता के साथ पौष्टिक और स्वादिष्ट भोजन भी मिलता है। यह हाथ से उत्पादन, श्रम आधारित जीवनशैली का बहुत ही अच्छा उदाहरण है। 

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