भारी वर्षा और धराशायी होती हरियाली
भारतीय मानसून केवल ऋतु परिवर्तन का संकेत नहीं है; यह जीवन और विनाश, दोनों का एक साथ आगमन है।;
- अरुण कुमार डनायक
वृक्ष केवल पर्यावरणीय संपदा नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक धरोहर भी हैं। बरगद, पीपल, आंवला और नीम भारतीय आस्था एवं परंपरा के प्रतीक रहे हैं। इनके संरक्षण से सांस्कृतिक विरासत सुरक्षित रहती है, वहीं ये कार्बन अवशोषण, तापमान नियंत्रण, वायु शुद्धिकरण और शहरी जैव विविधता के संवर्धन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
भारतीय मानसून केवल ऋतु परिवर्तन का संकेत नहीं है; यह जीवन और विनाश, दोनों का एक साथ आगमन है। वर्षा की रिमझिम फुहारें उमस से राहत देती हैं, खेतों में नई आशा जगाती हैं और और धरती को हरीतिमा की मनोहारी चादर पहना देती हैं। किंतु यही वर्षा जब अतिवृष्टि में बदल जाती है, तो जलभराव, बाढ़, भूस्खलन और वृक्षों के धराशायी होने जैसी घटनाएं जनजीवन को अस्त-व्यस्त कर देती हैं। पिछले कुछ वर्षों में एक चिंताजनक प्रवृत्ति विशेष रूप से सामने आई है—महानगरों और नगरों में भारी वर्षा तथा तेज़ हवाओं के साथ बड़ी संख्या में वृक्षों का गिरना।
दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, हैदराबाद और अन्य शहरों में मानसून के दौरान सड़कों पर गिरे बरगद, पीपल, नीम, अर्जुन, गुलमोहर और यूकेलिप्टस के वृक्ष अब सामान्य दृश्य बन गए हैं। फुटपाथों और सड़क किनारे खड़े ये विशाल वृक्ष कभी छाया, स्वच्छ वायु और जैव विविधता के प्रतीक थे; आज वही यातायात अवरोध, बिजली आपूर्ति बाधित होने और कभी-कभी जान-माल की हानि का कारण बन रहे हैं। यह समस्या केवल नगरों तक सीमित नहीं है। राजमार्गों पर भी वर्षों पुराने आम, इमली और जामुन के वृक्ष तेज़ वर्षा में गिरकर यातायात रोक देते हैं। आश्चर्य की बात यह है कि वन क्षेत्रों के वृक्ष अपेक्षाकृत कम गिरते हैं। इससे स्पष्ट है कि समस्या वर्षा नहीं, बल्कि शहरी परिस्थितियां हैं।
वृक्षों का असमय गिरना केवल बादलों या तेज़ हवाओं का दोष नहीं है। इसके पीछे पारिस्थितिक और प्रशासनिक दोनों प्रकार की विफलताएं छिपी हैं। शहरों में वृक्षों की जड़ों के चारों ओर सीमेंट और कांक्रीट बिछा दी जाती है, जिससे उन्हें फैलने और पर्याप्त ऑक्सीजन प्राप्त करने का अवसर नहीं मिलता। वर्षा का जल भी भूमि में समाने के बजाय नालियों में बह जाता है, परिणामस्वरूप जड़ों का प्राकृतिक पोषण बाधित हो जाता है। बहुमंजिला इमारतों, बेसमेंट, सीवेज लाइन, जल पाइपलाइन और भूमिगत केबलों के निर्माण के दौरान की जाने वाली अनियोजित खुदाई तथा ड्रिलिंग से जड़ें कट जाती हैं और वृक्ष भीतर ही भीतर कमजोर हो जाते हैं। अनेक पुराने वृक्ष दीमक और फफूंद के संक्रमण से खोखले भी हो चुके होते हैं। ऐसे वृक्ष जब तेज़ हवा और मूसलाधार वर्षा का संयुक्त दबाव झेलते हैं, तो उनका गिरना लगभग निश्चित हो जाता है।
एक अन्य महत्वपूर्ण कारण अवैज्ञानिक छंटाई है। अनेक नगरों में वृक्षों की नियमित वैज्ञानिक छंटाई नहीं होती, जबकि कहीं-कहीं अत्यधिक छंटाई कर दी जाती है। कई बार मुख्य तना काट दिए जाने से वृक्ष सीधे ऊपर बढ़ने के बजाय एक ओर फैलने लगते हैं। ऊपर का भार बढ़ता जाता है, जबकि कांक्रीट में जकड़ी जड़ें उसे संभालने में असमर्थ रहती हैं। परिणामत: तेज़ हवाओं में वृक्ष संतुलन खो बैठते हैं।
वृक्ष गिरने के बाद नगर निगमों की चुनौतियां भी कम नहीं हैं। सीमित जनशक्ति और पुराने उपकरणों के कारण कई स्थानों पर आज भी कुल्हाड़ी और आरी से वृक्ष काटकर हटाए जाते हैं। परिणामस्वरूप सड़कें कई घंटों या कई दिनों तक बाधित रहती हैं। आधुनिक हाइड्रोलिक ट्री-कटर, क्रेन और मोबाइल वुड-चिपर जैसी मशीनों का उपयोग अभी भी अधिकांश भारतीय नगर निकायों में सामान्य नहीं हो पाया है।
समस्या का एक कानूनी पक्ष भी है। दिल्ली सरकार ने जून 2025 में एक अधिसूचना जारी कर मृत, रोगग्रस्त अथवा जन-सुरक्षा के लिए खतरा बन चुके वृक्षों को हटाने की प्रक्रिया को सरल बनाने का प्रयास किया था। इसके अतिरिक्त कुछ अवसंरचना परियोजनाओं के लिए पूर्व अनुमति के बिना वृक्षों की कटाई, छंटाई अथवा प्रत्यारोपण की सीमित छूट का भी प्रावधान किया गया था। किंतु दिल्ली उच्च न्यायालय ने इस अधिसूचना पर रोक लगाते हुए कहा कि विकास कार्यों के नाम पर वृक्षों को काटने या उनकी छंटाई के लिए सामान्य छूट नहीं दी जा सकती। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि केवल वास्तविक और प्रमाणित खतरे की स्थिति में ही ऐसे निर्णय लिए जाने चाहिए तथा प्रत्येक मामले में पर्यावरणीय संतुलन और जनहित का समुचित परीक्षण आवश्यक है। पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि से यह रुख उचित है, किंतु इसके साथ ही जोखिमग्रस्त वृक्षों की पहचान और उनके वैज्ञानिक प्रबंधन के लिए त्वरित एवं पारदर्शी व्यवस्था विकसित करना भी उतना ही आवश्यक है।
विश्व के अनेक देशों ने इस दिशा में उल्लेखनीय प्रगति की है। अमेरिका, कनाडा और यूरोप में शहरी वृक्ष प्रबंधन को नगर नियोजन का अभिन्न अंग माना जाता है। वृक्षों की नियमित स्वास्थ्य जांच, वैज्ञानिक छंटाई तथा सेंसर एवं डिजिटल मानचित्रण के माध्यम से उनकी सतत निगरानी की जाती है। जड़ों के लिए पर्याप्त जल, वायु और खुला स्थान सुनिश्चित किया जाता है तथा जहां संभव हो, बड़े वृक्षों को मुख्य यातायात मार्गों से कुछ दूरी पर हरित पट्टियों और पार्कों में लगाया जाता है। अमेरिका की अनेक आवासीय कम्युनिटीज़ में घर के सामने लगे वृक्षों और हरित क्षेत्र की देखभाल भवन स्वामी का दायित्व होता है। इसकी उपेक्षा करने पर आर्थिक दंड का भी प्रावधान है, जिससे नागरिक सहभागिता स्वाभाविक रूप से सुनिश्चित होती है।
भारत में भी समस्या का समाधान केवल अधिक वृक्ष लगाने से नहीं होगा; उतना ही महत्वपूर्ण है पहले से मौजूद वृक्षों का वैज्ञानिक संरक्षण। प्रत्येक नगर में वृक्षों की डिजिटल गणना तैयार की जाए और पुराने तथा जोखिमग्रस्त वृक्षों का समय-समय पर स्वास्थ्य परीक्षण अनिवार्य बनाया जाए। नगर निगमों में प्रशिक्षित वृक्ष विशेषज्ञ नियुक्त किए जाएं तथा आधुनिक उपकरण उपलब्ध कराए जाएं। नई कॉलोनियों, सड़कों और सार्वजनिक परियोजनाओं में हरित पट्टियों तथा वृक्ष संरक्षण क्षेत्रों का अनिवार्य प्रावधान किया जाए, ताकि वृक्षों की जड़ों के चारों ओर पर्याप्त खुला क्षेत्र बना रहे। भूमिगत पाइपलाइन और केबल बिछाने के दौरान जड़ों की सुरक्षा के लिए मानक संचालन प्रक्रिया का कठोरता से पालन किया जाए।
वृक्ष केवल पर्यावरणीय संपदा नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक धरोहर भी हैं। बरगद, पीपल, आंवला और नीम भारतीय आस्था एवं परंपरा के प्रतीक रहे हैं। इनके संरक्षण से सांस्कृतिक विरासत सुरक्षित रहती है, वहीं ये कार्बन अवशोषण, तापमान नियंत्रण, वायु शुद्धिकरण और शहरी जैव विविधता के संवर्धन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
हर मानसून हमें यह याद दिलाता है कि प्रकृति का संतुलन कितना नाजुक है। यदि शहरों में वृक्ष लगातार गिर रहे हैं, तो इसका अर्थ यह नहीं कि वर्षा अधिक शक्तिशाली हो गई है; इसका अर्थ यह है कि हमने अपने वृक्षों को कमजोर बना दिया है। आवश्यकता वर्षा को दोष देने की नहीं, बल्कि शहरी नियोजन, वैज्ञानिक वृक्ष प्रबंधन और नागरिक उत्तरदायित्व को नई दृष्टि से देखने की है। यदि ऐसा नहीं किया गया, तो हर मानसून हमारे शहरों की हरियाली को थोड़ा और धराशायी करता रहेगा।
(लेखक एवं समाजसेवी हैं। )